केरल यौन उत्पीड़न मामलाः चर्च में कन्फेशन सवालों के घेरे में

केरल की एक चर्च के चार पुजारियों पर एक विवाहित महिला ने सालों से कथित यौन उत्पीड़न और ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया है. इसने भारतीय चर्च में कन्फेशन (अपनी ग़लतियों को कबूल करने) की पवित्रता के दुरुपयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

कन्फेशन, जैसा कि जाना जाता है, ईसाई धर्म में एक पवित्र संस्कार है. एक पादरी के सामने अपने पापों का प्रायश्चित करना भगवान के सामने अपने गुप्त बातें बताने जैसी हैं. अब तक, धर्मविदों और चर्च के मामलों पर नज़र रखने वानों ने केवल प्रायश्चितों के कथित दुरुपयोग की बात सुनी थी लेकिन केरल के मामले ने चर्चों के बीच पूरी बहस को एक नया आयाम दे दिया है.

16 साल से शादी होने तक करता रहा यौन शोषण

केरल मामले की शुरुआत तब हुई जब एक महिला ने पादरी के सामने कन्फेशन के दौरान कहा कि 16 साल की उम्र से शादी होने तक एक पादरी उसका यौन उत्पीड़न करता रहा था.

रेप

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को उसकी शिकायत का हवाला देते हुए बताया, “उसने यह कन्फेशन शादी के बाद चर्च में की. यह पादरी उसे सेक्स के लिए ब्लैकमेल करता रहा.”

अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, “और जब उसने एक अन्य पादरी को ये बताया, जिसने उसके साथ कॉलेज में पढ़ाई की थी, तो फिर उसका यौन शोषण किया गया. पूरी तरह से निराश यह महिला जब पादरी-काउंसलर के पास गई, जो दिल्ली से कोच्चि आया था तो वहां भी दुर्व्यवहार हुआ.”

कैसे मामला सामने आया?

यह मामला कुछ महीने पहले तब सामने आया जब उसके पति को महिला के इमेल में एक पांच सितारा होटल का बिल मिला. अधिकारी ने कहा, “वो सोने के गहने बेचकर होटल के बिल चुका रही थी.”

रेप

अब तक पुलिस महिला के बयान के आधार पर इसे रेप का मामला मानकर जांच कर रही है. अधिकारी ने कहा, “ब्लैकमेल के जरिए सेक्स के लिए मिली सहमित रेप है. उसे मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान देने के लिए अदालत में भी ले जाया जाएगा.”

महिला के पति ने मलंकारा ऑर्थोडक्स सीरियाई चर्च में भी शिकायत की थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

सिस्टर अभया हत्या मामले से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा, “यह घटना फरवरी में हुई थी और चार महीने तक कोई जांच नहीं हुई, भले ही एक जांच का आदेश दिया गया था. चर्च की जांच समिति ने अभी तक पति या पत्नी के बयान भी नहीं लिए हैं.”

लेकिन, गैर-कैथोलिक और कैथोलिक चर्च में यौन शोषण का यह मुद्दा महिला धर्मविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच बहस का विषय है, जिन्होंने चर्च के भीतर अभियान छेड़ रखा है.

रेप

नारीवादी धर्मशास्त्री कोचुरानी अब्राहम ने बीबीसी से कहा, “भारत में यौनाचार एक टैबू है, खास कर केरल में. चर्च में यौन दुर्व्यवहार से जुड़ा कोई डेटा उपलब्ध नहीं है क्योंकि कोई इस पर बात नहीं करता, हालांकि यह सब को पता है कि यह होता है.”

…तो कन्फेशन से उठ जाएगा विश्वास

लेकिन ईसाई समुदाय से जुड़े मुद्दों के समीक्षक और मैटर्स इंडिया पोर्टल के एडिटर जोस कवि को इस मामले के ईसाई समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित हैं, खास कर उनमें जो कन्फेशन में विश्वास करते हैं.”

जोस कवि कहते हैं, “यह मैंने पहली बार सुना है कि एक पादरी कन्फेशन की बात को उजागर कर रहा है. यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि इससे लोगों के कन्फेशन से विश्वास हिल जाएगा.”

कोचुरानी ने कहा, “कन्फेशन का सीधा मतलब इंसान के आध्यात्मिक विकास से जुड़ा है. इसका दुरुपयोग एक ख़तरनाक लक्षण है. तो, लोग कहेंगे कि अगर मैं किसी चीज़ को लेकर पश्चाताप कर रहा हूं तो सीधा भगवान के सामने ही ऐसा क्यों न करूं या पादरी के पास जाने के बजाय किसी दोस्त से क्यूं न बोलूं.”

‘बहुत से युवा आज चर्च नहीं जाते’

वो सहमत हैं कि ऐसे मामलों की वजह से लोग यौन दुर्व्यवहार के डर से चर्च में कन्फेशन करने जाने से पहले दो बार सोचेंगे. लेकिन, सामाजिक कार्यकर्ता और कैथोलिक बिशप काउंसिल ऑफ़ इंडिया (सीबीसीआई) में पूर्व आयुक्त वर्जिनिया सालदान्हा कहती हैं कि युवा पहले से चर्च नहीं जा रहे हैं.

सालदान्हा कहती हैं, “पढ़े लिखे लोगों में कम से कम 50 फ़ीसदी ने यह फ़ैसला किया है कि वो भगवान में अलग तरीके से विश्वास करेंगे, पादरी के माध्यम से नहीं. इसलिए, आप आज कम लोगों को चर्च जाते देखते हैं, वो धर्मार्थ की अन्य गतिविधियों में शामिल होते हैं.”

एक नन के साथ भी हुआ था यौन शोषण?

लेकिन कुछ अन्य चीज़े भी हैं जिसने धर्मविदों को परेशान कर रखा है.

1999 में केरल में एक पादरी से गर्भवती होने वाली नाबालिग का मामला उठाने वाले प्रोफेसर सेबेस्टियन वत्तमत्तम कहते हैं, “पादरी का यौन उत्पीड़न करना एक तथ्य है लेकिन चर्च उसे ढकने के लिए जिस रास्ते पर चल निकला है वो अधिक गंभीर मुद्दा है.”

प्रोफेसर सेबेस्टियन और कोचुरानी उस वाक्ये को याद करते हैं कि कैसे एक नाबालिग से रेप या एक नन का यौन शोषण किया गया था. नन ने एक बिशप के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत की थी, और कैसे चर्च प्रशासन ने इसकी सूचना क़ानून को अमल में लाने वाली एजेंसियों को नहीं दी थी.

जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ शिकायत की शुरुआती जांच के बाद नन के बयान को कोट्यम ज़िले के चंगानासरी में मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया. नन ने बिशप पर 2014 से 2016 के बीच उसके साथ बार बार रेप और अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया. लेकिन चर्चने कहा कि उसे नन की तरफ से कोई शिकायत नहीं मिली है.

उस पादरी के साथ क्या किया गया?

कोचुरानी कहती हैं, “2014 के मामले में नन को बस चुप रहने को कहा गया था और पुरुष पादरी को उच्च शिक्षा के लिए रोम भेज दिया गया था.”

हाल के वर्षों में, पोप ने कैथोलिक चर्च को निर्देश दिया है कि जब भी महिलाओं और बच्चों के यौन शोषण की शिकायतें मिलें तो तुरंत क़ानून को अमल में लाने वाली एजेंसियों को सूचित करें. लेकिन, मलंकारा ऑर्थोडक्स सीरियाई चर्च की ऐसे मामलों में एक अलग ही प्रक्रिया है.

केरल के इस नए मामले में मलंकारा ऑर्थोडक्स सीरियाई चर्च के प्रवक्ता प्रोफेसर पीसी एलियास ने बीबीसी हिंदी को बताया, “एक आंतरिक जांच चल रही है. एक बार यह पूरा हो जाए तो फिर पुलिस को सूचित किया जाएगा.”

शिकायत में पुलिस जांच शुरू होने के तुरंत बाद, चर्च ने अपने चार पुजारियों को उनके काम से हटा दिया था. हालांकि, यह बदलाव भी पूर्व मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन के राज्य पुलिस प्रमुख से बातचीत के बाद हुआ.

तो आख़िर क्या करना चाहिए?

भारतीय महिला धर्मशास्त्र मंच की संस्थापक सदस्य एस्ट्रिड लोबो गजिवला कहती हैं, “हमें पाप और अपने काम की नैतिकता के बीच अंतर समझने की ज़रूरत है. और अपराध को क़ानून के तहत ही देखा जाना चाहिए.”

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उन्होंने इस पूरे मुद्दे कहा, “यह विडंबना है कि भारत में हम कन्फेशन के टूटने की बात कर रहे हैं. पश्चिम के देशों में पादरी का किसी के अपराध के कन्फेशन की जानकारी पुलिस को दिए जाने पर बहुत चर्चा होती है.”

पिछले हफ्ते, ऑस्ट्रेलिया से आई एक मीडिया रिपोर्ट में एक आर्कबिशप के पद के पादरी को नज़रबंद कर दिया गया था क्योंकि वो एक बच्चे के कन्फेशन को उजागर नहीं किया था जो उसने एक पीडोफाइल (बच्चे का यौन शोषण) पादरी के बारे में किया था.

लेकिन, केरल के मामले से सवाल यह उठता है कि क्या पीड़ित को काउंसलर के पास जाने से बचाया नहीं जा सकता?

कोचुरानी कहती हैं, “एक आम महिला के लिए यह मुश्किल है. महिलाओं को बचपन से इसका यक़ीन दिलाया जाता है और किसी भी धर्म में पादरी का बहुत महत्व है. यह मौजूदा पुरुष प्रधान समाज की समस्या है.”

कोचुरानी कहती हैं, “यहां तक कि यह तथ्य कि उस नन ने जालंधर के बिशप के ख़िलाफ़ बात करने की हिम्मत दिखाई, यही बड़ी उपलब्धि है. यह एक ऐसा सिस्टम है जो आपके दिमाग को अपने वश में कर लेती हैं और पादरी की पूजा महिलाओं को कमजोर बनाती हैं.