छत्तीसगढ़: नसबंदी अभियान में पंद्रह महिलाओं की मौत के 12 साल बाद डॉक्टर को दो साल की सज़ा

यह त्रासदी नवंबर 2014 में बिलासपुर ज़िले के नेमिचंद जैन अस्पताल (सकरी), गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में आयोजित सरकारी सामूहिक नसबंदी शिविरों के दौरान हुई थी. ज़िला अदालत ने आरोपी सर्जन को ग़ैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया और दो साल की क़ैद, 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया. साथ ही पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया.

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ज़िले में वर्ष 2014 के बहुचर्चित नसबंदी त्रासदी मामले में एक अदालत ने सर्जन डॉक्टर को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाया.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) शैलेश कुमार की अदालत ने सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया.

इस भयावह घटना के 12 साल बाद – जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था, अदालत ने डॉक्टर को दो साल की कैद और 25,000 रुपये का जुर्माना सुनाया. जहां डॉ. गुप्ता को दोषी ठहराया गया, वहीं पर्याप्त सबूतों के अभाव में अन्य पांच आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया.

अतिरिक्त लोक अभियोजक देवेंद्र राव ने बुधवार को बताया कि अदालत ने 12 महिलाओं में से प्रत्येक की मौत के लिए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है.

अदालत ने माना कि इस त्रासदी का मुख्य कारण घोर लापरवाही और बेहद कम समय में अत्यधिक संख्या में सर्जरी करना था. मुख्य सजा के अलावा, अदालत ने धारा 337 (जीवन को खतरे में डालने वाले कार्य से चोट पहुंचाना) के तहत 6 महीने की कैद और 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया.

ज्ञात हो कि यह त्रासदी नवंबर 2014 में बिलासपुर जिले के नेमिचंद जैन अस्पताल (सकरी), गौरेला, पेंड्रा और मरवाही में सरकारी सामूहिक नसबंदी शिविर के दौरान हुई थी.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कुल 137 ऑपरेशन किए गए. ऑपरेशन के तुरंत बाद कई महिलाओं ने उल्टी, दर्द और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत की. बाद में 100 से अधिक महिलाओं को गंभीर हालत में सिम्स (छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान), जिला अस्पताल और विभिन्न निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया. चिकित्सा प्रयासों के बावजूद 15 महिलाओं की मौत हो गई.

इस घटना के बाद व्यापक आक्रोश फैल गया और लक्ष्य-आधारित जनसंख्या नियंत्रण उपायों की कड़वी सच्चाई उजागर हुई थी.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की जांच करने वाले एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने इन मौतों का कारण घोर चिकित्सकीय लापरवाही, घटिया और ज़हरीली दवाओं का इस्तेमाल, और तय दिशानिर्देशों का उल्लंघन बताया था.

अभियोजन पक्ष ने कहा कि ये मौतें सर्जरी के दौरान कथित लापरवाही से जुड़ी थीं, जिसके कारण सेप्टीसीमिया (रक्त संक्रमण) हो गया, साथ ही सर्जरी के बाद दी गई दूषित दवाओं को लेकर भी चिंताएं थीं. घटना के बाद ऑपरेशन में लापरवाही के साथ-साथ दवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए थे, जांच में जिंक फास्फाइड जैसे जहरीले तत्व मिलने की आशंका जताई गई थी.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले में दवा सप्लाई से जुड़े महावर फार्मा और कविता फार्मास्यूटिकल्स के संचालकों सहित पांच आरोपियों रमेश महावर, सुमित महावर, राकेश खरे, राजेश खरे और मनीष खरे को अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बरी कर दिया.