सुनवाई शुरू हुए बिना आरोपी को जेल में रखना सज़ा के समान: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने जबरन वसूली और हत्या की कोशिश के एक आरोपी को ज़मानत देते हुए कहा कि मुक़दमे की सुनवाई शुरू किए बिना ही आरोपी को जेल में रखना सज़ा के समान है. अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही में देरी से लंबी क़ैद को उचित नहीं ठहराया जा सकता.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले के दौरान अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मुकदमे की सुनवाई शुरू किए बिना ही आरोपी को जेल में रखना सज़ा के समान है. इसके साथ ही अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही में देरी से लंबी कैद को उचित नहीं ठहराया जा सकता.

हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, पंजाब के एक व्यक्ति को जबरन वसूली और हत्या की कोशिश संबधित मामले में ज़मानत देते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी को लगभग दो साल बीत चुके हैं और ट्रायल अभी तक शुरू नहीं हुआ है. ऐसे में इसके जल्द निष्कर्ष तक पहुंचने की कोई संभावना नहीं है.

इस संबंध में मंगलवार (24 मार्च) को जारी अदालत के 13 मार्च के आदेश में पीठ ने कहा है, ‘अपीलकर्ता की गिरफ्तारी को लगभग दो साल बीत चुके हैं, जबकि मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ है और इसलिए इसके निष्कर्ष का कोई आसार नजर नहीं आ रहा है. बिना ट्रायल के कारावास सज़ा के समान है.’

उल्लेखनीय है कि यह फैसला प्रदीप कुमार उर्फ ​​बानू द्वारा दायर अपील पर आया है, जिसमें उन्होंने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी ,जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था. उन्हें अप्रैल 2024 में भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या के प्रयास और जबरन वसूली सहित कई अपराधों और आर्म्स एक्ट के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के इस बयान पर ध्यान दिया कि इस मामले में 23 गवाहों से पूछताछ करने का प्रस्ताव रखा गया था, जबकि अभी तक एक भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई है. कोर्ट ने कहा कि इससे संकेत मिलता है कि मुकदमे को पूरा होने में काफी समय लगेगा. ऐसी परिस्थितियों में पीठ ने माना कि निरंतर हिरासत अनुचित है.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, ‘ इस मामले का पूरा अवलोकन करते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मुकदमे की सुनवाई तक अपीलकर्ता को और हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है.’

इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने उच्च न्यायालय द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने निर्देश दिया कि अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाए, जिसमें गवाहों को प्रभावित करने से बचाव और कार्यवाही में नियमित रूप से उपस्थित होना शामिल है.

गौरतलब है कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा त्वरित सुनवाई की संवैधानिक अनिवार्यता और लंबी अवधि की प्री-ट्रायल हिरासत को सामान्य बनाने के खतरों को उजागर करने वाले कड़े निर्णयों की श्रृंखला में नवीनतम है.

कुछ ही दिन पहले अदालत ने जम्मू और कश्मीर प्रशासन को सात साल तक एक विचाराधीन कैदी को जेल में रखने और केवल सात गवाहों से पूछताछ करने के लिए कड़ी फटकार लगाई थी – इसे अनुच्छेद 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ‘मजाक’ बताया था.

ऐसे ही एक अन्य मामले में इस महीने की शुरुआत में अदालत ने सार्वजनिक धारणा या पूर्वाग्रह से प्रेरित अति उत्साही जांचों के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा था कि गलत कारावास के बाद भले ही आरोपी बाद में बरी हो जाए, व्यक्तियों और परिवारों पर स्थायी छाप छोड़ता है.

अदालत ने कहा था, ‘गिरफ्तारी, जेल और मुकदमे का आघात हमेशा के लिए निशान छोड़ जाता है.’ इस दौरान अदालत ने दोषपूर्ण अभियोजन और न्याय में देरी के चलते मानवीय कीमत का भी ज़िक्र किया था.