हाल ही में केंद्रीय क़ानून मंत्रालय ने संसद में बताया था कि सीजेआई के दफ्तर को 2016 से 2025 के बीच मौजूदा जजों के ख़िलाफ़ 8,630 शिकायतें मिली थीं. यह डेटा खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही उपलब्ध कराया था. पर अदालत ने अब दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि वह न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार या दुराचार से जुड़ी शिकायतों के बारे में अलग-अलग रिकॉर्ड नहीं रखता.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि वह न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार या दुराचार से जुड़ी शिकायतों के बारे में अलग-अलग रिकॉर्ड नहीं रखता.
यह बात सुप्रीम कोर्ट के लोक सूचना अधिकारी की ओर से पेश वकील रुक्मिणी बोबडे ने जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव के समक्ष कही.
उन्होंने आरटीआई आवेदन को ‘एक तरह की छानबीन और बेवजह की पूछताछ’ बताया. उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री ऐसी जानकारी इकट्ठा करने में अपने संसाधन नहीं लगा सकती.
यह मामला सौरव दास बनाम सीपीआईओ, सुप्रीम कोर्ट है. पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता सौरव दास ने अप्रैल 2023 में एक आवेदन दाखिल कर पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी. राजा (मद्रास हाईकोर्ट) के संबंध में तीन सवाल पूछे थे
– क्या उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या अनुचित आचरण की कोई शिकायत मिली थी?
– कितनी शिकायतें मिली थीं?
– और उन पर क्या कार्रवाई की गई?
सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने यह कहते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया कि यह जानकारी ‘उस तरह से नहीं रखी जाती, जिस तरह से मांगी गई है.’
पहली अपीलीय अथॉरिटी ने भी इस इनकार को सही ठहराया. इसके बाद केंद्रीय सूचना आयोग ने इस मामले को वापस भेज दिया, लेकिन सीपीआईओ ने फिर उसी आधार पर जवाब देने से इनकार कर दिया. इसके बाद दास ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ज़रिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
हालांकि, 1 अप्रैल की सुनवाई में एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आया. जस्टिस कौरव ने कहा कि इस मामले के संस्था पर ‘दूरगामी नतीजे’ हो सकते हैं. उन्होंने दोनों पक्षों को एक ऐसा तरीका सुझाने का निर्देश दिया, जिससे दो मकसद पूरे हो सकें. ईमानदार जजों की प्रतिष्ठा की रक्षा होनी चाहिए. साथ ही, लोगों को इस बात की जानकारी भी मिलनी चाहिए कि शिकायतों पर किस तरह कार्रवाई की जाती है.
इस मामले की अगली सुनवाई 7 मई को होगी.
8,630 शिकायतों का विरोधाभास
सुप्रीम कोर्ट का यह दावा कि वह किसी खास जज से जुड़ी शिकायतों का कोई डेटा नहीं रखता, संसद में हाल ही में दी गई एक जानकारी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
फरवरी 2026 में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने लोकसभा को बताया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर को 2016 से 2025 के बीच मौजूदा जजों के खिलाफ 8,630 शिकायतें मिली थीं. यह डेटा खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही उपलब्ध कराया था. 2016 में शिकायतें 729 से बढ़कर 2025 में 1,102 हो गईं – यानी 51% की बढ़ोतरी.
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस विरोधाभास को उठाया. उनका कहना था कि जब सुप्रीम कोर्ट संसद को साल-दर-साल कुल आंकड़े दे सकता है, तो वह यह कैसे कह सकता है कि आरटीआई में मांगे गए प्रारूप में जानकारी उपलब्ध नहीं है? कम से कम 8,630 शिकायतों को दर्ज करने के लिए संबंधित न्यायाधीश की पहचान दर्ज करनी ही पड़ती होगी – वरना उस बुनियादी जानकारी के बिना कुल आंकड़ा अर्थहीन हो जाता है.
बोबडे ने जवाब दिया कि संसद को दिया गया डेटा केवल सभी मौजूदा जजों के ख़िलाफ़ कुल शिकायतों का है, न कि किसी खास जज के बारे में अलग-अलग जानकारी.
लेकिन सुनवाई के बाद दास ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर इसे ‘काफी अजीब’ बताया.
उनका तर्क था कि शिकायत दर्ज करते समय न्यायाधीश का नाम जैसे मूलभूत डेटा को दर्ज करना जरूरी होता है – वरना 8,630 का आंकड़ा कैसे तैयार हुआ?
हाईकोर्ट ने भी बार-बार सवाल उठाया कि ऐसा कैसे संभव है कि इस तरह का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता. अदालत ने यह भी चिंता जताई कि बिना यह बताए कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, केवल बड़े कुल आंकड़े सार्वजनिक करने से यह संदेश जाता है कि कोई कार्रवाई नहीं हो रही – जो न्यायपालिका की छवि के लिए हानिकारक है.
‘प्रारूप’ का बचाव और धारा 4(1)
दास ने किसी खास प्रारूप में जानकारी नहीं मांगी थी. उन्होंने सीधा सवाल पूछा था – क्या जस्टिस टी. राजा के ख़िलाफ़ कोई शिकायत मिली? इसका जवाब केवल ‘हां’ या ‘नहीं’ में दिया जा सकता है.
प्रशांत भूषण ने बताया कि दास ने यह भी कहा था कि यदि जरूरी हो तो वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा बताए गए प्रारूप में नया आरटीआई आवेदन दे सकते हैं. इस पर जस्टिस कौरव ने कहा कि कोई आवेदक अलग-अलग प्रारूप में सौ आवेदन भी दे सकता है – यह मुद्दा नहीं है. रजिस्ट्री तकनीकी आधार पर जानकारी देने से इनकार नहीं कर सकती.
‘जिस तरह से जानकारी मांगी गई है, उस तरह से रखी नहीं गई है’ – यह एक ऐसा बहाना है जिसका सामना आरटीआई से जुड़े लोगों को उच्च न्यायपालिका में बार-बार करना पड़ता है. यह इस बात पर ध्यान नहीं देता कि जानकारी मौजूद है या नहीं. यह सवाल को घुमाकर एक ऐसी प्रक्रियात्मक उलझन में डाल देता है, जिसका कोई हल नहीं निकलता.
यह स्थिति आरटीआई अधिनियम की धारा 4(1) के भी ख़िलाफ़ है, जो हर सार्वजनिक प्राधिकरण पर यह जिम्मेदारी डालती है कि रिकॉर्ड को व्यवस्थित और सूचीबद्ध (catalogued and indexed) रखा जाए ताकि सूचना के अधिकार का पालन हो सके. जो रिकॉर्ड डिजिटाइज हो सकते हैं, उन्हें उचित समय में कंप्यूटर में डालना ज़रूरी है. यह वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य है.
अगर सुप्रीम कोर्ट को एक दशक में 8,630 शिकायतें मिलीं और वह उन्हें जज के हिसाब से नहीं निकाल पा रहा है, तो यह उसकी इस कानूनी ज़िम्मेदारी का उल्लंघन है.
एससीओआई बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
बोबडे ने जानकारी देने से बचने के लिए एससीओआई बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल मामले में 2019 के पांच जजों वाली संविधान पीठ के फ़ैसले का हवाला दिया.
इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गई थी कि आरटीआई अधिनियम भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय पर भी लागू होता है. इसके बाद इस बात पर चर्चा की गई कि यह क़ानून किस हद तक लागू होता है. फ़ैसले में कहा गया कि जजों की नियुक्ति और तबादले की प्रक्रिया के दौरान कॉलेजियम के सदस्यों के बीच जो जानकारी आपस में साझा की जाती है, उसे ‘फ़िड्यूशियरी’ (विश्वास-आधारित) रिश्ते के तहत सुरक्षित रखा जाता है.
लेकिन फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि कॉलेजियम की आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया और जनहित से जुड़ी जानकारी अलग-अलग हैं. आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत केवल वही व्यक्तिगत जानकारी अपवाद (exempt) है जिसका सार्वजनिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं है. जो जानकारी सार्वजनिक गतिविधि से जुड़ी है, वह अपवाद में नहीं आती.
दास का सवाल कॉलेजियम की विचार-विमर्श प्रक्रिया से संबंधित नहीं है. उन्होंने शिकायतों की सामग्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) का आकलन, या नियुक्ति संबंधी निर्णयों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री नहीं मांगी है.
उन्होंने सिर्फ यह पूछा है कि क्या शिकायतें मौजूद हैं और उन पर क्या कार्रवाई हुई? यह पूरी तरह से जनहित के दायरे में आता है. किसी मौजूदा न्यायाधीश के आचरण से जुड़ी शिकायतें संप्रभु न्यायिक शक्ति के प्रयोग से संबंधित होती हैं, इसलिए उन्हें केवल ‘निजी’ नहीं कहा जा सकता.
सुनवाई में मौजूद सौरव दास ने एक्स पर लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के वकील ने जानकारी न देने के समर्थन में फैसले के कुछ हिस्से पढ़कर सुनाए. इस पर जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने तीखी टिप्पणी की- क्या शीर्ष अदालत अपने ही मामले के ख़िलाफ़ दलील दे रहा है?
रुक्मिणी बोबडे ने आरटीआई अधिनियम की धारा 7(9) का भी हवाला दिया, जिसके तहत तब जानकारी देने से मना किया जा सकता है जब इससे संसाधन ‘गलत तरीके से इधर-उधर’ (disproportionate diversion) हो सकते हैं. लेकिन ‘अनुपात’ का सिद्धांत दोनों तरफ लागू होता है. सुप्रीम कोर्ट संसद के लिए सालाना कुल आंकड़े तैयार कर सकता है, तो किसी विशेष न्यायाधीश के खिलाफ शिकायतों को ढूंढना उससे कम मेहनत वाला काम होना चाहिए, ज़्यादा मुश्किल नहीं.
अस्पष्टता का जाल
सुप्रीम कोर्ट के रुख के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह गरिमा को गोपनीयता के साथ मिला देता है. मूल तर्क यह है कि शिकायतों की जानकारी सार्वजनिक करने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान होगा. लेकिन वास्तव में यही अस्पष्टता जनता के भरोसे को कमजोर कर रही है.
संसद में दिए गए आंकड़ों में 8,630 शिकायतों का जिक्र था, लेकिन आगे क्या हुआ – इस पर कोई जानकारी नहीं दी गई.
लगभग उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 8 की एनसीईआरटी की एक किताब के उस अध्याय पर स्वतःसंज्ञान लिया, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का उल्लेख था. अदालत ने उस किताब पर रोक लगा दी और उसके तीनों लेखकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया.
यह स्थिति बेहद विरोधाभासी दिखी. न्यायपालिका के अपने आंकड़े बता रहे थे कि हजारों शिकायतें दर्ज हो रही हैं. संसद के रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि उनके निपटारे की कोई जानकारी नहीं है. और इसके जवाब में न्यायपालिका ने एक स्कूल की किताब पर रोक लगा दी.
सौरव दास ने अपने एक्स पोस्ट में इस विरोधाभास को जोड़ा. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को साल-दर-साल डेटा दिया, लेकिन हाईकोर्ट में कहा कि उनके पास मांगे गए प्रारूप में कोई रिकॉर्ड नहीं है. दास ने पूछा, ‘क्या रजिस्ट्री दिल्ली हाईकोर्ट के सामने कसम खाकर झूठ बोल रही थीं.’
इन-हाउस प्रक्रिया और जवाबदेही की कमी
1999 में पूर्ण पीठ (Full Court) के प्रस्ताव से अपनाई गई शिकायतों की आंतरिक प्रक्रिया (in-house procedure) बिना किसी बाहरी ऑडिट के चलती है. मुख्य न्यायाधीश शिकायत प्राप्त करते हैं, तय करते हैं कि कार्रवाई करनी है या नहीं और जरूरत पड़ने पर तीन सदस्यीय जांच समिति बना सकते हैं.
लेकिन इसमें कोई अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था नहीं है. शिकायतकर्ता को यह भी पता नहीं चलता कि उसकी शिकायत स्वीकार की गई या नहीं. कितनी जांच शुरू हुई और उनका क्या परिणाम रहा – इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है.
जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ा मामला इसका उदाहरण है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया. केवल कुल आंकड़े देना, बिना निपटारे की जानकारी के, जवाबदेही को नहीं बल्कि उसकी कमी को दिखाता है.
सुनवाई में अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने यही तर्क रखा कि न्यायिक शिकायतों पर पारदर्शिता न होने से संदेह बढ़ता है. जस्टिस कौरव इससे सहमत नजर आए.
ईमानदार जज की समस्या और उसका समाधान
जस्टिस कौरव ने एक महत्वपूर्ण चिंता जताई – अगर पारदर्शिता बढ़ाई गई तो असंतुष्ट पक्षकार किसी न्यायाधीश के खिलाफ झूठी शिकायतें कर सकते हैं और फिर आरटीआई के जरिए उनकी संख्या दिखाकर उनकी छवि खराब कर सकते हैं.
यह चिंता वास्तविक है. हर साल सैकड़ों शिकायतों में कई शिकायतें फैसलों से नाराजगी के कारण भी हो सकती हैं. लेकिन इसका समाधान पारदर्शिता कम करना नहीं, बल्कि और बढ़ाना है.
यदि शिकायतों के साथ उनके परिणाम या क्या निपटारा किया गया, यह भी बताए जाएं, तो जिस न्यायाधीश के खिलाफ 15 शिकायतें आईं और सभी निराधार पाई गईं – उसकी छवि मजबूत होती है.
इसके विपरीत, अस्पष्टता अफवाहों को जन्म देती है. एक ऐसा सिस्टम जो यह बताता है कि शिकायतें निराधार थीं, ईमानदार न्यायाधीश की रक्षा करता है. लेकिन जो कुछ भी न बताए, वह कोई सुरक्षा नहीं देता.
सौरव दास और प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि झूठी शिकायतों के जोखिम को इस तरह कम किया जा सकता है कि की गई कार्रवाई भी सार्वजनिक किए जाएं. खासकर जहां शिकायतें बेबुनियाद पाई गईं.
समाधान का सवाल
जस्टिस कौरव ने मामले को 7 मई तक स्थगित करते हुए दोनों पक्षों से ऐसा तंत्र (mechanism) सुझाने को कहा, जो ईमानदार न्यायाधीशों की सुरक्षा और शिकायतों से जुड़ी जानकारी तक जनता की पहुंच – दोनों में संतुलन बनाए.
यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के ‘पूरी तरह से जानकारी न देने’ वाले रुख को अस्वीकार करता है और एक मध्य मार्ग की संभावना खोलता है.
संभावित समाधान क्या हो सकते हैं? कम से कम सुप्रीम बिना नाम बताए कुल आंकड़े जारी कर सकता है – जैसे कितनी शिकायतें मिलीं, कितनी प्रारंभिक स्तर पर खारिज हुईं, कितनी जांच में गईं और उनका परिणाम क्या रहा.
अधिक मजबूत व्यवस्था में किसी विशेष न्यायाधीश के खिलाफ शिकायतों की संख्या और उनके निपटारे की जानकारी, अनुरोध पर दी जा सकती है – बिना शिकायत की सामग्री उजागर किए. यह धारा 8(1)(j) के तहत ‘जनहित’ के अपवाद के दायरे में आएगा. इससे धारा 4(1) के तहत रिकॉर्ड रखने के आदेश का भी पालन होगा.
भूषण ने एक और विकल्प सुझाया: आवेदक को उचित सुरक्षा उपायों के तहत प्राथमिक रिकॉर्ड का निरीक्षण करने की अनुमति देना. आरटीआई अधिनियम की धारा 2(j) निरीक्षण को सूचना तक पहुंच के एक रूप के रूप में मान्यता देती है. इससे जानकारी इकट्ठा करने का बोझ आवेदक पर आ जाएगा, जिससे धारा 7(9) की आपत्ति का समाधान हो जाएगा.
सौरव दास का मामला ऐसे समय आया है जब कई मुद्दे एक साथ सामने हैं – एनसीईआरटी पुस्तक पर रोक, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की जांच, संसद में दिए गए आंकड़े, कॉलेजियम की अपारदर्शिता और इन-हाउस प्रक्रिया की बंद प्रकृति – ये सभी एक ही ढांचागत समस्या के अलग-अलग पहलू हैं.
यह संस्था एक तरफ तो जनता के भरोसे की मांग करती है, लेकिन दूसरी तरफ वह उस जानकारी को उपलब्ध कराने से साफ़ इनकार कर देती है, जिस पर यह भरोसा टिका हुआ है.
दिल्ली हाईकोर्ट अब एक ऐसे आरटीआई विवाद पर सुनवाई कर रहा है जो देखने में तो छोटा सा लगता है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या न्यायिक आत्म-नियमन (self-regulation) का मतलब खुद को पूरी तरह छिपाने का अधिकार भी है?
सुप्रीम कोर्ट संसद के लिए तो शिकायतों की गिनती कर सकता है, लेकिन किसी आम नागरिक के लिए उन्हें ढूंढ नहीं पाता. यह स्थिति न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक अपारदर्शिता के बीच स्पष्ट अंतर नहीं दिखाती. अब यह देखना अहम होगा कि जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव इस मामले में क्या दिशा तय करते हैं – क्योंकि उसी से तय हो सकता है कि यह अंतर भविष्य में स्पष्ट हो पाता है या नहीं.