मालेगांव केस में बरी कर्नल पुरोहित को ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति, सेवा दो साल और बढ़ी

मालेगांव विस्फोट मामले में बरी हुए कर्नल प्रसाद पुरोहित को


ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति मिली है. सशस्त्र बल न्यायाधिकरण द्वारा रिटायरमेंट पर रोक के बाद अब वे दो साल और सेवा में रहेंगे. मालेगांव मामले में पुरोहित पर ‘अभिनव भारत’ नामक दक्षिणपंथी समूह के माध्यम से आरडीएक्स खरीदने का आरोप लगा था.
नई दिल्ली: वर्ष 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में पिछले साल बरी किए गए सेना अधिकारी कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित को अब ब्रिगेडियर पद पर पदोन्नति की मंजूरी मिल गई है. इसके साथ ही वे भारतीय सेना में कम से कम दो वर्ष और सेवा में बने रहेंगे.

यह निर्णय ऐसे समय आया है जब कुछ ही सप्ताह पहले सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी) ने उनकी 31 मार्च 2026 को प्रस्तावित सेवानिवृत्ति पर रोक लगा दी थी. पुरोहित ने एएफटी में याचिका दायर कर कहा था कि 17 वर्षों तक चले मुकदमे ने उनके करिअर की स्वाभाविक प्रगति को प्रभावित किया.

जानकारी के मुताबिक, पुरोहित नियमित प्रक्रिया में कर्नल पद पर पदोन्नति से वंचित रह गए थे. वे लेफ्टिनेंट कर्नल से टाइम-स्केल के आधार पर कर्नल बने थे और 54 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने वाले थे. लेकिन अब ब्रिगेडियर बनने के बाद उनकी सेवानिवृत्ति की आयु 56 वर्ष हो गई है.

द प्रिंट ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि इस पदोन्नति के बाद उन्हें अन्य ब्रिगेडियर अधिकारियों की तरह ही करिअर में आगे बढ़ने के अवसर मिलेंगे और भविष्य में अगली रैंक के लिए भी विचार किया जा सकता है.

पुरोहित जुलाई 2025 में मालेगांव विस्फोट मामले में बरी हुए थे. पुरोहित, उन सात आरोपियों में से एक थे जिन पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ आतंकी विस्फोट में उनकी भूमिका के लिए मुकदमा चलाया गया था. अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में मामला साबित न कर पाने के बाद उन्हें बरी कर दिया गया.

पुरोहित ने अपने सैन्य करिअर के दौरान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद-रोधी अभियानों में हिस्सा लिया था और वे सैन्य खुफिया इकाई से भी जुड़े रहे हैं.

गिरफ्तारी के बाद उन्होंने लगभग नौ वर्ष न्यायिक हिरासत में बिताए. 2017 में उन्हें जमानत मिली और उन्होंने दोबारा सेवा जॉइन की, लेकिन जुलाई 2020 तक वे निलंबित रहे. इसके बाद भी उनके खिलाफ अनुशासन और सतर्कता (डीवी) प्रतिबंध लागू रहा, जिसके चलते फरवरी 2021 में कर्नल पद के लिए विचार होने के बावजूद उनके प्रमोशन पर फैसला रोक दिया गया था.

बरी होने के बाद उन्हें बताया गया कि कर्नल पद के लिए उन्हें उपयुक्त नहीं पाया गया. इस पर उन्होंने सेना की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा कि अगर वे अयोग्य थे, तो उनके परिणाम को ‘सीलबंद कवर’ में रखना उचित नहीं था. उनके वकील एसएस पांडेय का तर्क था कि इस प्रक्रिया ने उन्हें पदोन्नति के दो और अवसरों से वंचित कर दिया और फैसले को कानूनी रूप से चुनौती देने के अधिकार को भी प्रभावित किया.

मालेगांव विस्फोट और कर्नल पुरोहित

29 सितंबर, 2008 को मालेगांव के भिक्कू चौक पर एक बम विस्फोट हुआ था. यह चौक कभी अपने पावरलूम उद्योग के लिए जाना जाता था. घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस में प्राथमिकी दर्ज की गई थी. शुरुआती जांच महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने की थी, 2011 में मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया था.

इस मामले में भाजपा नेता और पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर और लेफ़्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित सबसे चर्चित आरोपी रहे. इन दोनों के अलावा मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी के खिलाफ गैर क़ानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
एटीएस के अनुसार, पुरोहित ने 2006 में अभिनव भारत संगठन की स्थापना की, जिसके माध्यम से कथित तौर पर धन एकत्र किया गया और साजिश रची गई. एटीएस ने दावा किया कि इस संगठन के माध्यम से पुरोहित का लक्ष्य एक ‘हिंदू राष्ट्र’ स्थापित करना था, जिसका अपना संविधान, झंडा और ‘निर्वासित सरकार’ (गवर्नमेंट इन एग्ज़ाइल) हो, जिसका संचालन इज़रायल या थाईलैंड से किया जाए.

तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जो 26 नवंबर, 2008 को एक अन्य मुंबई आतंकवादी हमले में मारे गए थे, ने शुरुआत में जांच का नेतृत्व किया था. करकरे के नेतृत्व वाले एटीएस की जांच में पाया गया था कि साध्वी प्रज्ञा की एलएमएल फ्रीडम बाइक का इस्तेमाल विस्फोटक रखने के लिए किया गया था. वहीं, लेफ़्टिनेंट कर्नल पुरोहित पर अभिनव भारत नामक दक्षिणपंथी समूह के माध्यम से आरडीएक्स ख़रीदने का आरोप लगाया गया था.

हालांकि, जब एनआईए ने मामले की जांच अपने हाथ में ली, तो कई आरोप वापस लिए गए. एनआईए के मुताबिक़, एटीएस जांच में कई ख़ामियां थीं. मई 2016 में, जब एनआईए ने एक पूरक आरोपपत्र दाखिल किया, तो उसने ठाकुर सहित छह नामों को हटा दिया.

जुलाई 2025 में सभी आरोपियों को बरी करते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के विशेष न्यायाधीश एके लाहोटी ने कहा था कि यह एक गंभीर अपराध था, लेकिन अदालत को फैसला सुनाने के लिए ठोस और निर्विवाद प्रमाण की आवश्यकता होती है. और इसलिए सभी अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए निर्दोष घोषित किया जाता है.

अदालत में सरकारी पक्ष बम विस्फोट साबित करने में सफल रहा, लेकिन यह साबित नहीं कर पाया कि बम मोटरसाइकिल पर ही लगाया गया था. इसके अलावा कर्नल पुरोहित कश्मीर से आरडीएक्स लेकर आए थे, इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला. यह भी साबित नहीं हो सका कि पुरोहित ने अपने घर पर बम तैयार किया था.

दावों के अनुसार ऐसा कहा गया था कि इंदौर, उज्जैन और नासिक जैसे स्थानों पर इस हमले की साज़िश रचने के लिए बैठकें हुई थीं, लेकिन ऐसी बैठकों का कोई विश्वसनीय प्रमाण अदालत में पेश नहीं किया जा सका.

अभिनव भारत मामले में पुरोहित, राहिरकर और उपाध्याय के बीच कुछ वित्तीय लेनदेन के प्रमाण तो मिले, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि उस धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों में किया गया था. अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को साबित करने के लिए विश्वसनीय और ठोस सबूत पेश नहीं कर सका.

सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि अभियुक्तों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं हैं.