सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए और एनडीपीएस मामलों में लंबे समय तक चलने वाले मुक़दमों और आरोपियों के लंबे समय तक विचाराधीन क़ैद में रहने पर चिंता जताई और इन मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनाने का सुझाव दिया है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुझाव दिया कि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट (एनडीपीएस) से जुड़े मामलों में हो रही देरी को देखते हुए इनके लिए अलग से विशेष अदालतें गठन करना बेहद जरूरी है.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष अदालत ने इन मामलों में लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों और आरोपियों के लंबे समय तक विचाराधीन कैद में रहने पर चिंता जताई. इसी कारण अदालत ने यूएपीए और एनडीपीएस मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनाने का सुझाव दिया.
अनुच्छेद 21 के तहत देरी को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि आरोप भले ही गंभीर हों, लेकिन ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं और ये मुद्दे हमारे सामने आते हैं.’
अदालत के अनुसार, उसे यह सुझाव देने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि उसे बताया गया कि कई आरोपी धीमी सुनवाई के कारण वर्षों से जेल में बंद हैं. अदालत को लगा कि विशेष अदालतें न होने के कारण काम में बिखराव आता है, क्योंकि अदालतें कई श्रेणियों के मामलों को देखती हैं, जिससे कार्यवाही धीमी हो जाती है.
यह पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एनडीपीएस, यूएपीए और इसी तरह के मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाने की मांग की गई थी, जहां सुनवाई लंबी चलती है और आरोपी लंबे समय तक जेल में रहते हैं.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, शीर्ष अदालत इस बात पर भी चिंता जताई कि विशेष अदलातों के न्यायाधीशों पर विशेष कानूनों के मामलों के साथ-साथ सामान्य मामलों का भी बोझ है. इसी कारण विशेष अदालत प्रणाली मज़ाक बन गई है.
मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले किसी अदालत को अनुसूचित जाति-जनजाति कानून के मामलों के लिए बनाया जाता है, फिर उसी अदालत को राष्ट्रीय जांच एजेंसी के मामलों के लिए भी उपयोग किया जाता है, और बाद में वही अदालत पारिवारिक मामलों की भी सुनवाई करने लगती है – इस तरह विशेष अदालत का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है.
पीठ ने इन अदालतों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया.
अदालत ने एक रूपरेखा को अंतिम रूप देने में सहायता के लिए सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं (एडवोकेट जनरल) की उपस्थिति का अनुरोध किया.
अदालत ने सभी राज्यों से लंबित मामलों की संख्या और आवश्यक विशेष अदालतों की जानकारी मांगी, ताकि यह तय किया जा सके कि समयबद्ध तरीके से मामलों के निपटारे के लिए कितनी अदालतों की जरूरत है.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हर 10–15 मामलों के लिए एक विशेष अदालत की आवश्यकता हो सकती है, खासकर जब मामलों में सैकड़ों गवाह शामिल हों.
अखबार के अनुसार, अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि यदि उसकी फंडिंग योजना यूएपीए मामलों को भी शामिल करती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, चाहे अभियोजन एनआईए करे या राज्य सरकार.
अदालत ने यह भी कहा कि विशेष अदालतें केवल ऐसे ही मामलों की सुनवाई करें. अदालत ने कहा, ‘कैसे सुनिश्चित किया जाए कि ये अदालतें केवल विशेष मामलों को ही लें?…एक बार सत्र न्यायालय में सुनवाई शुरू हो जाए, तो वह रोज़ाना आधार पर चले और समाप्त होने तक जारी रहे.’
अदालत ने सुझाव दिया कि इन अदालतों को एक ही न्यायिक परिसर में स्थापित किया जाए, ताकि पहुंच आसान हो. बुनियादी ढांचे के संदर्भ में अदालत ने केंद्र की उस योजना का जिक्र किया, जिसमें प्रति अदालत 1 करोड़ रुपये का एकमुश्त और 1 करोड़ रुपये का वार्षिक खर्च (स्टाफ सहित) दिया जाता है.
पीठ ने अनुभवी न्यायिक अधिकारियों और समर्पित अभियोजकों की नियुक्ति के महत्व पर भी जोर दिया. मामले की अगली सुनवाई 11 मई 2026 को तय की गई है.