झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के प्रमुख कोयला खदानों और कारखानों के निरीक्षण का विवरण और निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुपालन का मूल्यांकन संबंधी रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि काग़ज़ों पर बताए गए सुरक्षा मानकों और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच काफ़ी बड़ा अंतर है.

नई दिल्ली: कोयला खदानों में बिगड़ती सुरक्षा और स्वास्थ्य स्थितियों पर स्वतः संज्ञान लेकर दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने सोमवार (27 अप्रैल) को राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई और मुख्य कारखाना निरीक्षक (Chief Inspector of Factories) को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की पीठ ने खनन श्रमिकों के जीवन के अधिकार को प्राथमिकता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद इस मामले में कार्यवाही शुरू की.
सोमवार को राज्य सरकार ने एक समीक्षा रिपोर्ट भी पेश की, जिसमें प्रमुख कोयला खदानों और कारखानों के निरीक्षण का विवरण और निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुपालन का मूल्यांकन शामिल था.
हालांकि, अदालत ने रिपोर्ट के निष्कर्षों पर कड़ी असंतुष्टि जताई. अदालत ने कहा कि कागजों पर बताई गई सुरक्षा मानकों और ज़मीनी हकीकत के बीच काफी बड़ा अंतर है. इसके चलते अदालत ने प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कहा कि खतरनाक कार्यों के दौरान श्रमिकों की सुरक्षा और उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ठोस कदम क्या उठाए गए हैं.
अदालत ने संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण और न्यूनतम वेतन मानकों के लागू करने के लिए एक विस्तृत रोडमैप भी मांगा है. साथ ही चेतावनी दी कि अब मुख्य कारखाना निरीक्षक को राज्य के खनन श्रमिकों की सुरक्षा में प्रगति की कमी को व्यक्तिगत रूप से स्पष्ट करना होगा.
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वकील मनीष तिवारी ने कहा, ‘अदालत राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत कोयला खदानों के सुरक्षा मानकों पर रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं थी, इसलिए मुख्य कारखाना निरीक्षक को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है.’
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया और सुनवाई शुरू की.