‘ममता ने भाजपा का रास्ता खोला’: राहुल गांधी के बयान में कांग्रेस की पराजय कथा

राहुल का तर्क यह है कि यदि ममता ने अच्छी सरकार चलाई होती तो भाजपा के लिए रास्ता नहीं खुलता. अब इसी तर्क को बिना किसी छूट और बिना किसी नेहरू-गांधी भावुकता के 2014 पर लगाकर देखिए. अगर कांग्रेस नेता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी ने साफ़-सुथरी सरकार चलाई होती तो क्या नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता इतना आसानी से खुला होता?

बीते दिनों नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बंगाल में जो कहा, वह पहली नज़र में एक सामान्य चुनावी हमला लगता है. उन्होंने कहा, ममता बनर्जी ने साफ़-सुथरी सरकार नहीं चलाई. बंगाल को ध्रुवीकरण से नहीं बचाया. इसलिए भाजपा के लिए रास्ता खुला.

लेकिन राजनीति में कुछ वाक्य बंदूक की गोली नहीं, बूमरैंग होते हैं. वे जिस दिशा में छोड़े जाते हैं, उससे कहीं अधिक क्रूरता से लौटकर छोड़ने वाले की ही कनपटी पर लगते हैं. राहुल का यह बयान वैसा ही बूमरैंग है. बंगाल में ममता पर छोड़ा गया, लेकिन दिल्ली, जयपुर और 2014 की पराजित कांग्रेस की पसलियों में धंस गया.

समस्या यह नहीं कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी पर हमला क्यों किया गया. ममता सरकार दूध से धुली नहीं है. बंगाल में कट-मनी, शिक्षक भर्ती घोटाले, राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक अहंकार, मुस्लिम वोट-बैंक की अति-संवेदनशीलता और विपक्ष को जमीन पर जगह न देने की प्रवृत्ति- इन सब पर गंभीर सवाल रहे हैं. कांग्रेस को टीएमसी की आलोचना करने का अधिकार है, अपितु बंगाल में अपनी बची-खुची राजनीतिक सांस बचाने के लिए यह उसका कर्तव्य भी है. लेकिन राहुल गांधी ने आलोचना नहीं की; उन्होंने कारण-शास्त्र लिख दिया. और वही कारण-शास्त्र कांग्रेस पर अभियोग-पत्र बन गया.

राहुल का तर्क यह है कि यदि ममता ने अच्छी सरकार चलाई होती तो भाजपा के लिए रास्ता नहीं खुलता. ठीक है. अब इसी तर्क को बिना किसी छूट, बिना किसी करुणा और बिना किसी नेहरू-गांधी भावुकता के 2014 पर लगाकर देखिए.

अगर कांग्रेस नेता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने साफ़-सुथरी सरकार चलाई होती, अगर कांग्रेस ने घोटालों, नीतिगत लोचों, महंगाई, नेतृत्वहीनता और सत्ता के दोहरे केंद्रों से देश को ऊबा न दिया होता, अगर राहुल गांधी ने राजनीति को आधा-अधूरा प्रयोगशाला-प्रोजेक्ट न बनाया होता, अगर सोनिया गांधी का नैतिक आभामंडल सत्ता की धूल से इतना धुंधला न हुआ होता तो क्या नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता इतना आसानी से खुला होता?

यही राहुल के बयान का निर्मम सच है. यह ममता पर आरोप लगाते-लगाते कांग्रेस की आत्मकथा बन जाता है.

राहुल कहते हैं कि बंगाल का चुनाव विचारधारा का चुनाव है. यह वाक्य अलग से ठीक है. लेकिन फिर वे कहते हैं कि भाजपा का रास्ता ममता ने खोला. यहां तर्क फिसल जाता है. अगर चुनाव विचारधारा का है तो भाजपा का उभार केवल ममता की प्रशासनिक विफलता से कैसे समझाया जा सकता है? और यदि भाजपा का उभार केवल शासन-विरोधी गुस्से का परिणाम है तो फिर राहुल की अपनी आरएसएस-भाजपा विरोधी विचारधारात्मक लड़ाई का क्या हुआ? तो वे पूरे देश में कांग्रेस के प्रति ‘तू मान न मान, मैं तेरा हर हाल में सहयोगी’ बने दीवाने लेफ़्ट पर यह हृदयहीन हमला क्यों कि ये तो भाजपा के सहयोगी हैं.

एक ही बयान में राहुल गांधी भाजपा को वैचारिक ख़तरा भी बताते हैं और टीएमसी की ख़राब गवर्नेंस का उप-उत्पाद भी. यह विश्लेषण नहीं, सुविधा के अनुसार बदलती हुई राजनीतिक ज्यामिति है.

दरअसल राहुल गांधी की यह दिक्कत पुरानी है. वे बड़े नैतिक वाक्य बोलते हैं, पर उनके भीतर की राजनीतिक यांत्रिकी हमेशा पूरी तरह फिट नहीं बैठती. वे सत्ता को नैतिक बीमारी बताते हैं, लेकिन अपनी पार्टी की सत्ता संबंधी बीमारी पर वैसी ज़रूरी शल्य-क्रिया नहीं करते. वे भाजपा को लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताते हैं, लेकिन विपक्षी राजनीति में प्रतिद्वंद्वी दलों को काटते समय यह भूल जाते हैं कि भाजपा इसी दरार में अपना झंडा गाड़ती है. वे ममता को दोष देते हैं कि उन्होंने बंगाल में भाजपा के लिए रास्ता खोला, लेकिन यह नहीं बताते कि बंगाल में कांग्रेस ने अपने लिए रास्ता क्यों बंद कर लिया?
कांग्रेस की बंगाल में हालत यह नहीं है कि वह दरवाजे पर खड़ी है और ममता ने उसे अंदर नहीं आने दिया. सच यह है कि कांग्रेस अपनी ही ऐतिहासिक हवेली की टूटी हुई खिड़की से झांक रही है. कभी बंगाल में कांग्रेस सत्ता का नाम थी; फिर वाम ने उसे उदरस्थ किया; फिर ममता ने वाम को निगल लिया; और अब भाजपा ममता-विरोधी भूख को अपनी थाली में परोसने की कोशिश कर रही है.

इस पूरी कथा में कांग्रेस केवल टिप्पणीकार बनकर रह गई है. राहुल गांधी का बयान इसी चुनावी उद्वेग असहायता का दस्तावेज है. यानी जिस दल की ज़मीन खिसक गई हो, वह अक्सर दूसरों की ज़मीन पर दरारें गिनने लगता है.

और फिर राजस्थान का प्रसंग राहुल के तर्क को और आत्मघाती साबित कर देता है. अगर राहुल गांधी का सिद्धांत है कि जिस राज्य में भाजपा आती है, वहां सत्ताधारी दल की विफलता ने रास्ता खोला तो 2023 में राजस्थान में भाजपा के लौटने का दोष किस पर जाएगा? क्या यह कहा जाएगा कि अशोक गहलोत ने इतनी शानदार सरकार चलाई कि जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठा दिया? क्या यह माना जाएगा कि योजनाएं महान थीं, पर जनता अयोग्य निकली?

या फिर वही राहुल-तर्क यहां भी लागू होगा- अगर गहलोत सरकार ने राजनीतिक, संगठनात्मक और धारणा-प्रबंधन के स्तर पर बेहतर काम किया होता, तो भाजपा का रास्ता इतना सहज न होता? और अगर कोई मुख्यमंत्री तीन बार लगातार ऐसा करता है तो कांग्रेस उस बारे में क्या विचार रखती है?

और यदि राहुल गांधी का यह सिद्धांत सार्वभौमिक है कि जहां भाजपा या कोई विरोधी दल सत्ता में आता है, वहां पुरानी सरकार की विफलता ने ही उसका रास्ता खोला तो फिर कांग्रेस को अपने पूरे 2014-बाद के नक्शे पर लाल स्याही से नोट लिखना पड़ेगा.

हरियाणा और महाराष्ट्र 2014 में हाथ से गए; असम में लंबा कांग्रेस युग 2016 में खत्म हुआ; अरुणाचल में सरकार टूटी; केरल में यूडीएफ हारा; गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सत्ता नहीं बना सकी; हिमाचल और उत्तराखंड 2017 में गए; मेघालय और मिजोरम 2018 में छूटे; मध्य प्रदेश में 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रकरण ने कमलनाथ सरकार को गिरा दिया; पुडुचेरी 2021 में गया; फिर 2023 में राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी कांग्रेस से निकल गए.

सच तो यह है कि 2021 तक मोदी काल में कांग्रेस छह सरकारें भाजपा के हाथों खो चुकी थी; उसके बाद राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों की हार ने इस सिकुड़न को और निर्मम बना दिया. और तो और क्या दिल्ली में शीला दीक्षित ने इतनी बुरी सरकार चलाई थी कि वहाँ एक अनाम दल ही सत्तासीन हो जाए? तो क्या इन सब जगहों पर भी राहुल गांधी यही कहेंगे कि कांग्रेस ने साफ़-सुथरा, भरोसेमंद और राजनीतिक रूप से चतुर शासन नहीं दिया, इसलिए भाजपा या उसके सहयोगियों के लिए रास्ता खुला?

अगर बंगाल में ममता दोषी हैं तो हरियाणा में हुड्डा, महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी, असम में तरुण गोगोई की विरासत, राजस्थान में गहलोत, छत्तीसगढ़ में बघेल, मध्य प्रदेश में कमलनाथ और दिल्ली में 2014 की कांग्रेस तक सबको उसी कसौटी पर खड़ा करना पड़ेगा. यही राहुल के बयान की असली उलटी चाल है. वह ममता को कठघरे में खड़ा करता है, लेकिन पीछे से कांग्रेस की पूरी पराजय-गाथा को भी उसी कठघरे में धकेल देता है.

आज कांग्रेस की सीधी सरकारें कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल जैसे सीमित राज्यों तक सिमटी हैं. कर्नाटक में सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बने रहने और तेलंगाना में कांग्रेस सरकार की नियुक्तियों पर ताजा रिपोर्टें भी यही वर्तमान स्थिति दिखाती हैं. इसलिए राहुल का तर्क यदि बंगाल में सही है तो वह कांग्रेस के लिए सबसे बेरहम आत्मस्वीकारोक्ति भी है: भाजपा केवल ममता की भूलों से नहीं बढ़ी; वह कांग्रेस की ऐतिहासिक थकान, संगठनात्मक क्षय, शासन-विरोधी स्मृतियों और सत्ता खोने की लंबी अक्षमता से भी बढ़ी.

यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी बौद्धिक बेईमानी भी पकड़ में आती है. जब भाजपा दूसरे राज्य में बढ़ती है तो स्थानीय गैर-भाजपा सरकार दोषी. जब भाजपा कांग्रेस से राज्य छीनती है तो दोष ईवीएम, ध्रुवीकरण, मोदी-मशीन, संगठन की कमी, मीडिया, धनबल, जातीय समीकरण और अंत में जनता की भूल. यानी दूसरों की हार में नैतिक विश्लेषण, अपनी हार में परिस्थितियों का रोना. यह राजनीति नहीं, आत्म-क्षमा का बहुत दयनीय और भ्रांतिमान उद्योग है.

राहुल गांधी और अशोक गहलोत जैसे नेताओं को यह समझना चाहिए कि राजनीति में तर्कों की भी स्मृति होती है. आज आप ममता से कहते हैं कि आपने भाजपा को रास्ता दिया; कल वही वाक्य कांग्रेस के गले में घंटी बनकर लटकता है. आपने 2014 में मोदी को रास्ता दिया, आपने राजस्थान में भाजपा को रास्ता दिया, आपने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, असम, उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन को क्यों गंवाया? क्या हर जगह कोई ममता थी? या कांग्रेस स्वयं धीरे-धीरे अपने ही घर की सीढ़ियां उखाड़ती गई?
भाजपा की राजनीति को केवल प्रतिद्वंद्वी की विफलता से समझना ख़तरनाक सरलीकरण है. भाजपा वहां आती है, जहां असंतोष होता है, पर वह असंतोष अपने आप कमल नहीं बन जाता. उसे संगठन चाहिए, वैचारिक अनुशासन चाहिए, बूथ की मशीनरी चाहिए, प्रतीकों की हिंसक चमक चाहिए, मीडिया-प्रबंधन चाहिए, स्थानीय क्रोध को राष्ट्रीय आख्यान में बदलने की कला और बुरे को अच्छा और अच्छे को बुरा साबित करने की बाजीगरी चाहिए. बंगाल में ममता की गलतियों ने दरवाजा खुला छोड़ा होगा, पर उस दरवाजे तक चलकर कौन गया? किसने दस्तक दी? किसने भीतर घुसने की रणनीति बनाई? किसने ‘भ्रष्टाचार’ को ‘हिंदू अपमान’ में, ‘स्थानीय नाराजगी’ को ‘सांस्कृतिक युद्ध’ में बदला?

राहुल इस जटिलता को एक वाक्य में काट देते हैं: ममता जिम्मेदार हैं. यह टीवी-डिबेट का वाक्य है, रणनीतिक मस्तिष्क का नहीं.

और सबसे बड़ी बात यह है कि यदि कांग्रेस सचमुच भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रीय वैचारिक लड़ाई लड़ रही है तो उसे अपने विरोधियों और सहयोगियों में फ़र्क़ करना सीखना होगा. उसे भारतीय लोकमानस की इस उक्ति को हृदय में धारण करना होगा कि लात खाय पुचकारिये दुधारु धेनु! अगर घर में दूध देने वाली गाय है और वह लात भी मारे तो पुचकार लीजिए. यह मत करिए कि वह लाते मारे तो उसे मारने लगो और उसके दूध की फ़िक्र ही मत करो. यह भारत के उन लोगों की कहावत है, जिन्हें कथित सुशिक्षित लोग अनपढ़ शब्द से पुकारते हैं.

बेशक़ ममता बनर्जी कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी हैं, पर वे भाजपा नहीं हैं. बंगाल में टीएमसी और केरल में लेफ़्ट पर हमला कीजिए, लेकिन ऐसा हमला मत कीजिए जिसे भाजपा अपने पोस्टर पर चिपका सके. राहुल का वीडियो यही गलती करता है.

भाजपा को राहुल का बयान इसीलिए पसंद आया; क्योंकि उसमें कांग्रेस की रणनीतिक नासमझी और भाजपा की प्रचार-सुविधा, दोनों एक साथ मौजूद थे.

बहुत बेलाग निष्कर्ष तो यह है कि राहुल गांधी का बयान सत्य का एक टुकड़ा तो रखता है, लेकिन राजनीतिक बुद्धिमत्ता का पूरा ढांचा नहीं. ममता बनर्जी की विफलताओं ने भाजपा को जगह दी, यह बात कही जा सकती है. लेकिन ‘ममता ने भाजपा का रास्ता खोला’ कहने से पहले राहुल को आईना देखना चाहिए था. उस आईने में 2014 खड़ा था. उस आईने में कांग्रेस की 44 सीटें खड़ी थीं. उस आईने में राजस्थान 2023, 2013 और 2003 खड़ा था. उस आईने में वे सारे राज्य खड़े थे, जहां कांग्रेस अपनी ऐतिहासिक उपस्थिति को धीरे-धीरे शोकसभा में बदलती गई.

राहुल ने बंगाल में ममता को घेरा, पर असल में उन्होंने भारतीय राजनीति का एक सार्वभौमिक नियम बोल दिया कि सत्ता की विफलता प्रतिद्वंद्वी को जन्म देती है. दुर्भाग्य यह है कि इस नियम की सबसे बड़ी प्रयोगशाला खुद कांग्रेस रही है. इसलिए यह बयान ममता पर आरोप कम, कांग्रेस पर आत्मस्वीकृति अधिक है. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि राहुल गांधी ने इसे बंगाल के नाम से पोस्ट किया; इतिहास इसे कांग्रेस के नाम से पढ़ेगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)