राम रहीम की आरोपमुक्ति से मोदी डिग्री मामले तक: कौन हैं सुप्रीम कोर्ट के पांच नए जज

देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट के पांच नए न्यायाधीशों को शपथ दिलाई है. इनमें चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं. नियुक्तियों के साथ उनके कुछ चर्चित फैसले भी चर्चा में हैं, जिनमें राम रहीम की आरोपमुक्ति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री और वैवाहिक क्रूरता से जुड़े मामले शामिल हैं.

नई दिल्ली: देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंगलवार (2 जून, 2026) को सुप्रीम कोर्ट के पांच नए न्यायाधीशों को शपथ दिलाई. इनमें चार हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीश (जस्टिस शील नागू, जस्टिस श्री चंद्रशेखर, जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस अरुण पल्ली) के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता वी. मोहना शामिल हैं. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर इन नियुक्ति को मंजूरी दी थी.

इन नियुक्तियों के साथ सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ी है, लेकिन नए न्यायाधीशों के चयन ने उनके कुछ चर्चित और विवादित फैसलों को भी फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है.

जस्टिस शील नागू

सबसे अधिक चर्चा जस्टिस शील नागू के नाम को लेकर हुई. मार्च 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की एक विशेष पीठ, जिसकी अध्यक्षता वे कर रहे थे, ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में बरी कर दिया था.

निचली अदालत ने 2019 में राम रहीम को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष साजिश के आरोप को संदेह से परे साबित नहीं कर सका. यह फैसला व्यापक सार्वजनिक और कानूनी बहस का विषय बना था.
जस्टिस नागू एक अन्य फैसले को लेकर भी चर्चा में रहे थे. 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एक पीठ ने कहा था कि यदि पत्नी बिना उचित कारण पति के साथ वैवाहिक संबंध बनाने से लगातार इनकार करती है, तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है और यह तलाक का आधार हो सकता है. इस निर्णय ने महिलाओं के अधिकारों और वैवाहिक संबंधों में सहमति की अवधारणा पर बहस छेड़ दी थी.

जस्टिस शील नागू का जन्म 1 जनवरी 1965 को हुआ था. उन्होंने 1987 में मध्य प्रदेश बार काउंसिल में नामांकन कराया और लंबे समय तक मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में दीवानी तथा संवैधानिक मामलों की वकालत की. मई 2011 में उन्हें अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया और मई 2013 में वे स्थायी न्यायाधीश बने. बाद में वे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश भी रहे. इसके बाद उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. उनकी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब वे 31 दिसंबर 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं.

जस्टिस संजीव सचदेवा

नए सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों में जस्टिस संजीव सचदेवा का नाम भी एक चर्चित फैसले से जुड़ा रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिल्ली विश्वविद्यालय की डिग्री से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करने के केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के आदेश को रद्द कर दिया था.

अदालत ने माना था कि ऐसे रिकॉर्ड निजी सूचना की श्रेणी में आते हैं और उन्हें स्वतः सार्वजनिक नहीं किया जा सकता. इस फैसले को पारदर्शिता बनाम निजता की बहस में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना गया था.
जस्टिस संजीव सचदेवा का जन्म 26 दिसंबर 1964 को हुआ था. उन्होंने 1988 में दिल्ली बार काउंसिल में नामांकन कराया और उसी वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से कानून की पढ़ाई पूरी की. 2013 में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. लंबे समय तक दिल्ली हाईकोर्ट में कार्य करने के बाद उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया.

जस्टिस श्री चंद्रशेखर

जस्टिस श्री चंद्रशेखर मूल रूप से झारखंड हाईकोर्ट से आते हैं. उनका जन्म 25 मई 1965 को हुआ था. उन्होंने 1993 में दिल्ली बार काउंसिल में वकालत के लिए नामांकन कराया और दीवानी तथा आपराधिक मामलों में प्रैक्टिस की.

न्यायपालिका में आने से पहले वे सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता के तौर पर भी सक्रिय रहे. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, वे 140 से अधिक रिपोर्टेड मामलों में सुप्रीम कोर्ट में पेश हो चुके हैं. जनवरी 2013 में उन्हें झारखंड हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और जून 2014 में वे स्थायी न्यायाधीश बने.
हाल के महीनों में वे उस संसदीय जांच समिति के सदस्य भी रहे, जिसने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले पर अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी थी. उनकी नियुक्ति इसलिए भी उल्लेखनीय मानी जा रही है क्योंकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में झारखंड का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था.

जस्टिस अरुण पल्ली

जस्टिस अरुण पल्ली का जन्म 18 सितंबर 1964 को हुआ था. वे ऐसे परिवार से आते हैं जिसकी कई पीढ़ियां वकालत के पेशे से जुड़ी रही हैं. उनके दादा और पिता दोनों पटियाला में अधिवक्ता थे.

न्यायाधीश बनने से पहले वे 2004 से 2007 के बीच पंजाब सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (एडिशनल एडवोकेट जनरल) भी रहे.
दिसंबर 2013 में उन्हें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति को पंजाब-हरियाणा क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को बनाए रखने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस एजी मसीह इसी हाईकोर्ट से आए हैं. अप्रैल 2026 में जस्टिस राजेश बिंदल के सेवानिवृत्त होने के बाद उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कम हो गया था, जिसे जस्टिस पल्ली की नियुक्ति से फिर मजबूत किया गया है.

अधिवक्ता से जज

वरिष्ठ अधिवक्ता वी. मोहना की नियुक्ति कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है. वे सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में दूसरी महिला हैं जिन्हें सीधे बार से सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया है. इससे पहले 2018 में जस्टिस इंदु मल्होत्रा को यह अवसर मिला था.

मोहना भारतीय सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिलाने वाले ऐतिहासिक मुकदमे में पक्षकारों की ओर से पैरवी करने के लिए जानी जाती हैं.
इन नियुक्तियों के साथ सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या भी बढ़ी है. हाल ही में केंद्र सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी थी.