पदोन्नति पर फिर लगा… कानूनी ब्रेक!

प्रमोशन की राह देख रहे लाखों अ
प्रमोशन की राह देख रहे लाखों अफसर-कर्मचारियों का इंतजार और लंबा.

नई भर्तियों पर भी मंडराया संकट
पदोन्नति
मध्यप्रदेश में वर्ष 2016 से रुकी अधिकारियों-कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया एक बार फिर कानूनी पेचीदगियों में उलझ गई है। करीब एक दशक से प्रमोशन की आस लगाए बैठे लाखों शासकीय कर्मचारियों और अधिकारियों को अब और लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। हाई कोर्ट में पदोन्नति नियमों को लेकर सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बावजूद निर्णय नहीं आ सका। इस बीच सुनवाई करने वाले तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा के सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त हो जाने से पूरा मामला नई बेंच के गठन पर निर्भर हो गया है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि अब इस प्रकरण में फैसला आने में कई महीने और लग सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार पदोन्नति नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने विस्तृत सुनवाई की थी। सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया और सरकार ने भी नए पदोन्नति नियमों का पक्ष मजबूती से रखा था। 17 फरवरी को सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया गया था। सरकारी हलकों में उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप 90 दिनों के भीतर फैसला आ जाएगा, लेकिन मुख्य न्यायाधीश के सुप्रीम कोर्ट चले जाने से मामला अटक गया। अब नई बेंच गठित होगी और यह तय किया जाएगा कि सुरक्षित निर्णय सुनाया जा सकता है या फिर पूरे मामले की दोबारा सुनवाई होगी। यदि पुन: सुनवाई होती है तो निर्णय आने में और अधिक समय लग सकता है।
10 साल से रुकी है पदोन्नति व्यवस्था
मध्यप्रदेश में मई 2016 से पदोन्नतियां पूरी तरह ठप हैं। उस समय हाई कोर्ट ने पदोन्नति नियम 2002 को निरस्त कर दिया था। इसके बाद से सरकार कई बार नए नियम बनाकर पदोन्नति शुरू करने की कोशिश करती रही, लेकिन हर बार मामला न्यायालय में पहुंच गया। इसका सबसे बड़ा असर प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ा है। विभागों में बड़ी संख्या में वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत हैं। कई कर्मचारी बिना प्रमोशन पाए सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि हजारों कर्मचारी रिटायरमेंट के नजदीक पहुंच चुके हैं।
प्रभार मिला, लेकिन लाभ नहीं
सरकार ने विभागीय कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए कई अधिकारियों और कर्मचारियों को उच्च पदों का प्रभार सौंप रखा है। हालांकि प्रभार मिलने के बावजूद उन्हें पदोन्नति से मिलने वाले वेतनमान, वरिष्ठता और अन्य वित्तीय लाभ नहीं मिल रहे हैं। कई विभागों में ऐसी स्थिति है जहां अधिकारी वर्षों से उच्च पद का कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका मूल पद वही बना हुआ है। इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि पदोन्नति नहीं मिलने से कैरियर ग्रोथ पूरी तरह प्रभावित हो गई है।
हजारों पद खाली, कामकाज पर असर
प्रमोशन रुकने का असर सिर्फ कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। विभिन्न विभागों में उच्च स्तर के हजारों पद रिक्त पड़े हैं। कई कार्यालयों में एक अधिकारी को दो-दो और तीन-तीन पदों का दायित्व संभालना पड़ रहा है। इससे निर्णय प्रक्रिया धीमी हो रही है और योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी असर पड़ रहा है। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि पदोन्नति व्यवस्था किसी भी सरकारी तंत्र की रीढ़ होती है। जब वरिष्ठ पद नहीं भरते तो पूरी प्रशासनिक श्रृंखला प्रभावित होती है और निचले स्तर पर भी रिक्तियों का दबाव बढ़ता जाता है।
नई भर्तियों पर भी पड़ेगा सीधा असर
राज्य सरकार ने वर्ष 2028 तक करीब ढाई लाख सरकारी पदों पर भर्ती का लक्ष्य तय किया है। अब तक 78 हजार से अधिक पदों पर भर्ती प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। हालांकि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़े विवाद के कारण 13 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां अभी भी लंबित हैं। अनुमान है कि करीब 13 से 14 हजार पद इसी कारण अटके हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पदोन्नति प्रक्रिया जल्द शुरू नहीं होती तो नई भर्तियों की रफ्तार भी प्रभावित होगी। सामान्यत: किसी कर्मचारी के प्रमोट होने पर उसका पद रिक्त होता है और उसी आधार पर नई नियुक्तियां की जाती हैं। प्रमोशन नहीं होने से बड़ी संख्या में पद रिक्त ही नहीं हो पा रहे हैं।
स्वास्थ्य और ऊर्जा विभाग में सबसे अधिक जरूरत
वर्तमान में सरकार मुख्य रूप से नए सृजित पदों पर भर्ती कर रही है। इनमें स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा और ऊर्जा विभाग प्रमुख हैं। लेकिन अन्य विभागों में पदोन्नति नहीं होने के कारण रिक्तियों का वास्तविक आंकड़ा सामने नहीं आ पा रहा है। कई विभाग भर्ती प्रस्ताव भेजने में भी असमर्थ हैं क्योंकि पद संरचना स्पष्ट नहीं हो पा रही है। वहीं लगातार लंबित होती प्रक्रिया से कर्मचारी संगठनों में नाराजगी बढ़ रही है। उनका कहना है कि पदोन्नति केवल वेतन वृद्धि का विषय नहीं है, बल्कि यह कर्मचारियों के सम्मान, वरिष्ठता और सेवा अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। कई संगठनों ने सरकार से न्यायालय में प्रभावी पैरवी कर जल्द समाधान निकालने की मांग की है।
सरकार की चिंता भी बढ़ी
सरकार के सामने भी यह मामला बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक ओर कर्मचारियों का दबाव है तो दूसरी ओर बड़े पैमाने पर भर्ती अभियान को सफल बनाने की जिम्मेदारी। यदि पदोन्नति और आरक्षण से जुड़े मामले शीघ्र नहीं सुलझते हैं तो आने वाले वर्षों में प्रशासनिक ढांचे में रिक्तियों का संकट और गहरा सकता है। फिलहाल लाखों अधिकारी-कर्मचारी हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन नई न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने की संभावना ने संकेत दे दिए हैं कि प्रमोशन की राह अभी आसान नहीं है और इंतजार अपेक्षा से कहीं अधिक लंबा हो सकता है।