उत्तर प्रदेश: क्या भाजपा के मनोवैज्ञानिक युद्ध से पार पा सकेगी सपा?

आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा प्रतिद्वंद्वी सपा को अभी से मनोवैज्ञानिक युद्ध में उलझाने में लग गई है. वहीं, पश्चिम बंगाल में केंद्रीय चुनाव आयोग के पक्षपातपूर्ण रवैये के मद्देनज़र अनेक प्रेक्षक (जिनमें सपा के शुभचिंतक नहीं भी हैं) प्रतिद्वंद्वियों की जीत-हार की संभावनाओं से ज़्यादा इस सवाल से दो चार हैं कि विधानसभा चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे भी या नहीं?
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव, जैसी कि कुछ हल्कों में चर्चा है, समय से पहले करा दिए जाएं तो भी कई महीने बाद होंगे, क्योंकि बरसात में तो वे हो पाने से रहे. लेकिन सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उन्हें लेकर प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी (सपा) को अभी से विकट मनोवैज्ञानिक युद्ध में उलझा देने में लग गई है.

पश्चिम बंगाल में उसकी अप्रत्याशित जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस पर व्याप रहे अस्तित्व के संकट और कुछ अन्य विपक्षी पार्टियों में टूट-फूट से हासिल बढ़त ने वैसे भी इस मामले में उसका काम आसान कर रखा है.

बहरहाल, प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और पंचायती राज, अल्पसंख्यक कल्याण व मुस्लिम वक्फ मंत्री ओमप्रकाश राजभर (भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष) द्वारा सपा में बगावत व टूट-फूट के अचानक छेड़ दिए गए राग को इसी ‘युद्ध’ के आगाज रूप में देखा जा रहा है.

केशव प्रसाद मौर्य ने दावा कर डाला है कि सपा के 25-26 सांसद टूटकर भाजपा में आने को तैयार बैठे हैं, लेकिन भाजपा अभी उनको तोड़ नहीं रही. फिर भी विधानसभा चुनाव तक वे सपा से अलग हो ही जाएंगे.

ओमप्रकाश राजभर की बात करें, तो सपा नेता रामगोपाल यादव की केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से कथित भेंट और उनको दिए कथित गुप्त पत्र के हवाले से वे सपा में बड़ी टूट की बात कर रहे हैं. उनका दावा है कि खनन घोटाले व गोमती रिवर फ्रंट मामले में जांच का शिकंजा कसने के कारण सपा दबाव में है और उसके कई नेता इन मामलों में गिरफ्तारी से बचने के लिए भाजपा से मदद की गुहार लगा रहे हैं.

सपा ने भी पलटवार में देरी नहीं की है. उसके मुखिया अखिलेश यादव ने जवाबी दावे में कह दिया है कि उल्टे भाजपा के कई विधायक व नेता उनके संपर्क में हैं और सपा के जांबाज कार्यकर्ता भाजपा के किसी भी मंसूबे को नाकाम कर देंगे.

दूसरी ओर उनके चाचा शिवपाल यादव ने केशव प्रसाद को विधानसभा चुनाव में उनकी बहुचर्चित शिकस्त की याद दिलाते हुए उनके दावों को बकवास करार दिया है.

यह भी इस मनोवैज्ञानिक युद्ध का ही हिस्सा है कि भाजपाई लगातार कह रहे हैं कि उन्होंने पश्चिम बंगाल प्रतिद्वंद्वियों को छका कर जीत लिया तो उत्तर प्रदेश चुटकियां बजाकर जीत लेंगे.

लेकिन उनके दुर्भाग्य से, केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में हर हाल में भाजपा को जिताने के लिए जैसा पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया गया, उसके मद्देनजर अनेक प्रेक्षक (जो सपा के शुभचिंतक नहीं भी हैं) उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रतिद्वंद्वियों की जीत-हार की संभावनाओं से ज्यादा इस सवाल से दो चार हैं कि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे भी या नहीं? उनकी यह चिंता है कि भाजपा के मनोवैज्ञानिक युद्ध तेज कर देने के बावजूद जा ही नहीं रही.

क्या चुनाव निष्पक्ष होंगे?

कई हल्कों में अभी भी सवाल पूछा जा रहा है कि केंद्रीय चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को हराने के प्रयासों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में हर हाल में योगी आदित्यनाथ को जिताने के प्रयासों को समर्पित हो गया तो क्या होगा?

सवाल पूछने वालों के अनुसार, आयोग के ऐसा न करने का सिर्फ एक ही कारण है: यह कि भाजपा के भीतर अरसे से चला आ रहा मोदी-योगी अंतर्विरोध उसको ऐसा करने से रोक दे. यानी आयोग की नियंत्रक मोदी सरकार उसे योगी को उनके हाल पर छोड़कर स्वतंत्र व निष्पक्ष रहने को कह दे. लेकिन फिलहाल, इसकी संभावनाएं कम दिखाई देती हैं.

इसलिए सत्ता की सबसे बड़ी विपक्षी दावेदार के रूप में सपा ने चुनाव की शुचिता से जुड़ी अपनी चिंताओं को शब्द देने शुरू कर दिए हैं. उसकी चिंता इस लिहाज से बहुत बड़ी है कि वह कहती आई है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के पक्ष में चुनाव आयोग और सरकारी मशीनरी की जो मिलीभगत दिखाई दी, उसका रिहर्सल उत्तर प्रदेश विधानसभा के गत उपचुनावों में ही किया गया था.

इसलिए गत 15 जून को लखनऊ स्थित पार्टी के मुख्यालय में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठक में भी यह चिंता ही छाई रही. बैठक में अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं से लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान को बचाने के लिए पूरी ताकत से जुट जाने का आह्वान किया और कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव न सिर्फ प्रदेश बल्कि देश की लोकतांत्रिक प्रणाली की रक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण सिद्ध होने जा रहे हैं और इनमें लोकतंत्र की रक्षा नहीं की गई, तो यह देश का आखिरी चुनाव साबित हो सकता है और इसके बाद भाजपा देश की चुनावी व्यवस्था को ही समाप्त कर सकती है.
उन्होंने यह भी कहा कि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जीत गईं तो वह लोकतांत्रिक संस्थाओं, निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया और संविधान को इतना कमजोर कर देगी कि भविष्य में कभी स्वतंत्र चुनाव नहीं हो पाएंगे.

लेकिन ऐसा कुछ न हो और चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र व निष्पक्ष हों तो भी समाजवादी पार्टी की चिंताएं कम नहीं होगी.

इसलिए कि प्रदेश के चुनावी आंकड़े भी उसके पक्ष में नहीं हैं और 1992 में चार अक्टूबर को अस्तित्व में आई यह पार्टी कभी अकेले दम पर भाजपा को पराजित नहीं कर पाई. (अलबत्ता, उसने अपने संस्थापक मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में 1993 में बसपा से गठबंधन में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा तो रामलहर के हिंडोले में झूल रही भाजपा को करारी शिकस्त देकर ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ का नारा लगवा दिया था.)

बस एक बार

2012 के विधानसभा चुनाव को छोड़कर वह कभी अकेले दम पर बहुमत भी प्राप्त नहीं कर पाई. 2012 का बहुमत भी उसने भाजपा को नहीं बसपा की मायावती सरकार को बेदखल करके पाया था. तब, जब मायावती सरकार की रीति-नीति से नाराज़ प्रदेश के सवर्णों ने उनको हराने के लिए रणनीतिक रूप से सपा के पक्ष में मतदान कर दिया था. कारण यह था कि उनकी पहली पसंद की दोनों पार्टियों कांग्रेस व भाजपा में से कोई भी बसपा को हराने में सक्षम नहीं थी. कांग्रेस तो उतार पर थी ही, भाजपा उठान पर होने के बावजूद सफलता के पाले से बहुत दूर थी.

जानना दिलचस्प है कि सपा ने वह चुनाव मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में लड़ा था और 401 सीटों पर प्रत्याशी खड़े करके 224 पर जीत हासिल की थी, जो बहुमत से इक्कीस ज्यादा थीं. उसे 29.13 फीसदी वोट मिले थे और इससे आह्लादित मुलायम ने अपना ताज अपने बेटे के सिर पर सजा दिया था.

यहां गौर कीजिए: 224 सीटें जीतने के बावजूद सपा को उस चुनाव में कुल 29.13 प्रतिशत वोट ही मिले थे. इतने कम वोटों के बावजूद उसका बहुमत का आंकड़ा पार कर लेना आज की तारीख में आश्चर्यजनक लगता है, लेकिन यह इसलिए संभव हुआ था कि वह प्रदेश में सपा, बसपा, भाजपा व कांग्रेस के बीच चौकोने चुनावी मुकाबलों का दौर था.

इनमें कांग्रेस व भाजपा को सवर्णों या अगड़ों की पार्टियां माना जाता था और सपा व बसपा को पिछड़ों व दलितों या कि बहुजनों की. उनके बीच चौकोने मुकाबलों में कई बार तीस प्रतिशत से भी कम वोट पाने वाली पार्टी सरकार बनाने भर को बहुमत प्राप्त कर लेती थी.

लेकिन बाद में मतदाताओं के ध्रुवीकरण के बीच भाजपा व सपा में सीधे मुकाबले की स्थिति आई तो 2022 में अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके 32.06% वोट शेयर पाने के बावजूद सपा को 111 सीटों पर ही जीत हासिल हो पाईं.

जाहिर है कि कभी धरतीपुत्र, धर्मनिरपेक्षता के अलम्बरदार और सामाजिक न्याय के अलम्बरदार कहलाने वाले मुलायम का एम-वाई समीकरण सीधे मुकाबले जीतने के लिए अपर्याप्त था. इसीलिए बाद में अखिलेश ने एमवाई को छोड़कर पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और आधी आबादी) का नारा दिया.

2012 के बाद 2024

बहरहाल, 2012 में मुलायम का अपने बजाय अखिलेश को मुख्यमंत्री बनवाना सपा को रास नहीं आया. चाचा-भतीजे (शिवपाल-अखिलेश) के बहुप्रचारित झगड़े के बाद वह 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरी तो कांग्रेस से गठबंधन के बावजूद उसको केवल 21.82 प्रतिशत वोट और 47 सीटें ही नसीब हुईं.

इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उसकी करारी हार हुई थी और 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन की पुनरावृत्ति के बावजूद उसकी यह नियति नहीं बदली थी- 2022 के विधानसभा चुनाव में भी नहीं.

उसे तो वह 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ गठबंधन की घटक बनकर ही बदल पाई.

उसकी चुनावी ‘उपलब्धियों’ का यह हाल तब है, जब प्रदेश के मतदाता 2007 के विधानसभा चुनाव में ही त्रिशंकु विधानसभाओं और गठबंधन सरकारों के दौर से बाहर निकल आए और तब से लगातार स्पष्ट जनादेश देते आ रहे हैं. 2007 में उन्होंने यह जनादेश बसपा को दिया, 2012 में सपा को और 2017 व 2022 में भाजपा को.

गौरतलब है कि मुलायम सिंह सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता की अलम्बरदारी वाले अपने सुनहरे दिनों के एक दौर में दावा किया करते थे कि कांग्रेस या उसका गठबंधन केंद्र में तभी सरकार बना पाता है, जब सपा उत्तर प्रदेश में भाजपा को शिकस्त देकर पीछे छोड़ देती और केंद्र में कांग्रेस का समर्थन करती है. वे मानते थे कि उत्तर प्रदेश में सपा ही भाजपा को रोकने में सक्षम है और जब तक भाजपा उत्तर प्रदेश में नहीं हारती, केंद्र में कोई भी गैर-भाजपा सरकार (जिसमें कांग्रेस की अहम भूमिका हो) नहीं बन सकती.

लेकिन वे भूल जाते थे कि सपा भी उत्तर प्रदेश में भाजपा को तभी पीछे छोड़ पाती है, जब लगभग समान मतदाता आधार के कारण कांग्रेस भाजपा के वोटों में बंटवारा कराकर उसे कमजोर कर दे. इससे उन दिनों सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस के बीच होने वाले चौकोने मुकाबले में कांग्रेस भले ही न जीत पाए, सपा की जीत का रास्ता साफ हो जाता था.
अलबत्ता, बाद में भाजपा ने कांग्रेस की कीमत पर इतनी शक्ति संचित कर ली कि कांग्रेस के लिए उसके आधार में बंटवारा करना कतई मुमकिन नहीं रह गया. तब उस पर जीत हासिल करने का सपा का कस-बल भी कम पड़ने लगा.

लगातार चार चुनावी शिकस्तों के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में वह तब चला, जब सपा व कांग्रेस दोनों सच्चे मन से एक दूजे के हुए और कांग्रेस के साथ के कारण दलितों ने दशकों पुरानी दुश्मनी भुलाकर उसे वोट दिया, भाजपा की बदनीयती से संविधान को बचाने के लिए ही सही. साथ ही उसके अल्पसंख्यक वोटबैंक में बंटवारा या बिखराव भी नहीं हुआ. यह और बात है कि इस चुनाव में भाजपा की करारी शिकस्त के बावजूद केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व या अहम भूमिका वाली सरकार नहीं बनी.

मुश्किल नहीं, अगर ठान ले

सपा को आम तौर पर धर्मनिरपेक्षता की चैंपियन और भाजपा के हिंदुत्व से अनथक संघर्ष के लिए जाना जाता है, हालांकि कुछ प्रेक्षक कहते हैं कि अब उसकी धर्मनिरपेक्षता में मुलायम के वक्त जैसी चमक और तमक नहीं है.

लेकिन ऐसा भी नहीं कि मुलायम के वक्त उसमें एकदम से झोल न रहे हों. 2003 में मुलायम ने केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की शर्तें स्वीकार कर प्रदेश में सरकार बनाई तो ‘फ्रंटलाइन’ ने चकित होते हुए से लिखा था,’जिस भाजपा ने फरवरी, 2002 में मुलायम सिंह को मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया, उसी ने 29 अगस्त, 2003 को उन्हें सरकार बनाने में मदद की.

14 साल से मुलायम सिंह विरोधी राजनीति कर रहे अजित सिंह ने उन्हें समर्थन दिया. जो कल्याण सिंह, मुलायम सिंह को रामसेवकों की हत्या करने वाला रावण कहते थे, उन्होंने मुलायम को बहुमत जुटाने में मदद की और जिस सोनिया गांधी को मुलायम ने 1999 में प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था, उन्होंने मुलायम की सरकार को समर्थन दिया.’

इन सारे हालात के मद्देनजर सपा के निकट सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह तोड़-फोड़ की भाजपा की कोशिशों से अपनी रक्षा करके उससे प्रदेश की सत्ता छीन पाएगी या नहीं?

और जवाब साफ है: स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव होने पर उसका ऐसा कर पाना मुश्किल नहीं है, लेकिन बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से बने जिताऊ समन्वय को बरकरार रखते हुए वह प्रदेश में सक्रिय क्षेत्रीय अपील वाले भाजपा से असहज दलों को शुभचिंतक बनाकर अपने गठबंधन की अपील को भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की अपील से बड़ा कर पाती है या नहीं.