क्या मध्य प्रदेश की दो दलीय व्यवस्था इस बार होगी खत्म..!

चुनावी तंत्र पर मीडिया मंत्र 
नजरिया… 
लेखक मनीष  द्विवेदी प्रबंध संपादक मंगल भारत राष्ट्रीय समाचार पत्रिका.

पुराने राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो बसपा, कांग्रेस को नुकसान पहुंचाती रही है लेकिन अनायास सपाक्स के अभ्युदय के बाद जो परिस्थितियां बदली हैं उसमें हो सकता है कांग्रेस के साथ तालमेल न हो पाना कांग्रेस को कम नुकसान पहुंचाने वाला हो। कांग्रेस मायावती से गठबंधन करती तो हो सकता है कि सवर्ण उससे कन्नी काट लेते। कांग्रेस ने भी बसपा के सामने आत्मसमर्पण की मुद्रा में समझौता करना इसलिए उचित न समझा हो कि इसमें उसे नफा कम और नुकसान ज्यादा नजर आया हो।


मध्यप्रदेश का चुनावी परिदृश्य जितना धुंधला और उलझा हुआ 2018 में नजर आ रहा है, इतना इसके पहले कभी नजर नहीं आया। छोटे दलों के दलदल ने इसे उलझाकर रख दिया है। कांग्रेस, सपा, बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में आपसी तालमेल न होने और सबके ताल ठोंककर मैदान में उतरने से और अन्य दलों के भी चुनाव लडऩे के लिए कमर कसने के बाद फिलहाल यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ऊंट किस करवट बैठेगा। फिलहाल दलों के दलदल ने भाजपा और कांग्रेस के लिए अग्नि परीक्षा जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि 1972 से मध्यप्रदेश में जो दो दलीय ध्रुवीकरण चला आ रहा है उसकी जगह किसी तीसरी शक्ति का ऐसा अभ्युदय हो सकता है क्या, जिसके हाथ में सत्ता की चाबी आ जाए। अभी तक तो बहुजन समाज पार्टी या समाजवादी या गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने जितने प्रयास किए हैं, उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली है। अनारक्षित वर्ग के हितों के लिए गठित सपाक्स भी चुनाव मैदान में कूद पड़ी है और फिलहाल वह भी सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लडऩे का दावा कर रही है। आदिवासी युवाओं का संगठन जयस भी मैदान में ताल ठोंक रहा है। शिवसेना ने 230 और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जदयू ने 150 सीटें लडऩे की घोषणा की है। आम आदमी पार्टी भी 230 विधानसभा क्षेत्रों में पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ रही है और उसने मतदान बूथ तक अपना संगठनात्मक ढांचा खड़ा करने का दावा किया है। ऐसे हालातों में भाजपा प्रदेश में चौथी बार सत्ताशीर्ष पर काबिज होने में सफल रहेगी या डेढ़ दशक बाद कांग्रेस का राजनीतिक वनवास समाप्त होगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि दलों का दलदल किसके पारंपरिक मतों में सेंध लगाकर दूसरे की सत्ता की राह को आसान बनाएगा। यदि प्रदेश के मतदाता कांग्रेस और भाजपा के ध्रुवीकरण से इतर किसी अन्य विकल्प की तलाश में जाते हैं और मौजूदा राजनीतिक ढर्रे में आमूल-चूल परिवर्तन चाहते हैं तो फिर उनका झुकाव आम आदमी पार्टी की तरफ हो सकता है क्योंकि यह एक ऐसा विकल्प है जो पारंपरिक राजनीतिक दलों से इतर प्रशासनिक मॉडल का वाहक बन सकता है।
जहां तक महागठबंधन न बनने से कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं प्रभावित होने का सवाल है, उस पर निश्चित तौर पर कुछ न कुछ असर पड़ेगा, क्योंकि बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी उन्हीं अंचलों में कांग्रेस के हारने का सबब बनती आई हैं जो उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी विंध्य क्षेत्र और महाकौशल अंचल में कांग्रेस के पारंपरिक वोटबैंक में सेंध लगा सकती है तो वहीं दूसरी ओर जयस का अभ्युदय मालवा व मध्यभारत अंचल में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। ऐसी संभावना है कि अंतत: जयस की किसी न किसी रूप में कांग्रेस के साथ समझ पैदा हो जाएगी क्योंकि अभी भी इनके तार आपस में जुड़े हुए हैं। जहां तक बहुजन समाज पार्टी का सवाल है मध्य प्रदेश में धीरे-धीरे इसकी राजनीति ताकत में कुछ कमी आ रही है लेकिन वह लगभग दो दर्जन सीटों पर ऐसी स्थिति में है जहां चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है। वैसे, यदि पुराने राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो बसपा, कांग्रेस को नुकसान पहुंचाती रही है लेकिन अनायास सपाक्स के अभ्युदय के बाद जो परिस्थितियां बदली हैं उसमें हो सकता है कांग्रेस के साथ तालमेल न हो पाना कांग्रेस को कम नुकसान पहुंचाने वाला और फायदा अधिक पहुंचाने वाला हो। यदि कांग्रेस मायावती से गठबंधन कर लेती तो हो सकता है कि सवर्ण मतदाता उससे कुछ कन्नी काट लेते। इस प्रकार कांग्रेस ने भी बसपा के सामने आत्मसमर्पण की मुद्रा में समझौता करना इसलिए उचित न समझा हो कि इसमें उसे नफा कम और नुकसान ज्यादा नजर आया हो।
वैसे, भले ही गठबंधन न होने का ठीकरा कांग्रेस पर फोड़ा जा रहा हो लेकिन असलियत यह है कि उपरोक्त तीनों दलों की मंशा तालमेल करने की नहीं थी क्योंकि सभी अपनी ताकत पर भरोसा करने के स्थान पर अपनी हैसियत से कई गुना ज्यादा सीटें चाहते थे और यदि कांग्रेस उनकी बात कुछ कम या ज्यादा कर मानती तो भी उसे लगभग 60 से 70 सीटें छोडऩा पड़ती, जिसका अर्थ यह होता कि कांग्रेस अपनी भविष्य की सभी संभावनाओं को इनके सामने गिरवी रख देती। कांग्रेस की हालत धीरे-धीरे वही होती जाती जो उत्तर प्रदेश और बिहार में हुई। बसपा और गोंगपा वह सीटें भी मांग रही थीं जिन पर कांग्रेस के मौजूदा विधायक काबिज थे। यहां तक कि बसपा को विधानसभा उपाध्यक्ष और कांग्रेस नेता राजेंद्र सिंह की अमरपाटन सीट भी चाहिए थी और कुछ ऐसे इलाकों में भी वह सीटें मांग रही थी जहां उसके प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बच सकी थीं। 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा के चार विधायक जीते थे और पिछले विधानसभा चुनाव में उसे 6.29 प्रतिशत वोट मिले थे। उसने 277 उम्मीदवार उतारे और 194 की जमानत नहीं बचा पाई थी। केवल डेढ़ दर्जन सीटें ऐसी थीं जिन पर बसपा दूसरे या तीसरे स्थान पर रही थी। 2013 में बसपा को 7.26 प्रतिशत और 2008 में 8.97 प्रतिशत मत मिले थे लेकिन वह इस चुनाव में कांग्रेस से 50 सीटें मांग रही थी।
महागठबंधन के मामले में झटका खाने के बाद अब कांग्रेस उन नए युवाओं को अपने साथ जोडऩे की कोशिश में है जो उसके लिए अधिक फायदेमंद हो सकते हैं। इस हिसाब से उसने अजाक्स महासचिव पीसी जाटव के बेटे देवाशीष झारिया और युवा किसान नेता अर्जुन आर्य को अपने पाले में लाने में सफलता हासिल कर ली है। कांग्रेस इस बार मध्य प्रदेश में गुजरात की तरह कुछ ऐसे प्रयोग करने जा रही है जिसमें वह पेशेवर नए चेहरों को जो किसी राजनीतिक दल से नहीं जुड़े हैं, अपने साथ लेकर महागठबंधन टूटने से जो हालात पैदा हो गए हैं उसकी भरपाई करे। बसपा के जो चार विधायक पिछली बार जीते हैं उनमें से दलित वर्ग का केवल एक है, अन्य तीन ने जातिगत समीकरण साधकर सफलता हासिल की। अब कांग्रेस भी उन इलाकों में ऐसे जातिगत समीकरण बनाने की जुगत में है जिससे वह बसपा में कुछ सेंधमारी कर सके।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को 2003 के विधानसभा चुनाव में 2.03 प्रतिशत मत मिले थे और उसके 3 विधायक जीते थे। 2008 के आते-आते इस पार्टी में विभाजन हो गया और उसके बाद से इसकी ताकत में कमी आई तथा उसके बाद हुए दो चुनावों में उसका कोई उम्मीदवार नहीं जीता, साथ ही उसका मत प्रतिशत भी काफी कम हो गया है। लेकिन अब फिर सभी धड़े एक हो गए हैं इसलिए विंध्य और महाकौशल के आदिवासी इलाकों में वह कांग्रेस के परम्परागत मतों में सेंध लगा सकती है, लेकिन कितनी लगा पाएगी, यह नहीं कहा जा सकता। जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है उसे 2003 के विधानसभा चुनाव में 3.71 प्रतिशत मत मिले थे और उसने 7 सीटें जीती थीं तथा एक सीट उपचुनाव में बाद में जीत ली थी। 2008 में समाजवादी पार्टी को 1.99 प्रतिशत मत मिले और उसने केवल एक सीट जीती जबकि 2013 में उसके पास केवल 1.20 प्रतिशत मत रह गए। हालांकि, उसे एक भी सीट नहीं मिली। अब तो उत्तर प्रदेश में भी सपा पहले से काफी कमजोर है। यदि गठबंधन होता तो कांग्रेस को तो इससे कोई मदद नहीं मिलती उल्टे सपा कुछ मजबूत हो सकती थी जो अवसर उसने गंवा दिया। नीतीश कुमार के धड़े जदयू के सूरज जायसवाल 150 सीटों पर लडऩे का दावा कर रहे हैं जबकि अविभाजित जेडीयू के पास मध्यप्रदेश में 0.55 प्रतिशत 2008 में 0.28 प्रतिशत और 2013 में 0.25 प्रतिशत मत ही बचे थे, अब जेडीयू दो धड़ों में विभक्त हो गई और शरद यादव ने अलग पार्टी बना ली है। ऐसे में जेडीयू के 150 उम्मीदवार केवल रस्म अदायगी के लिए खड़े होंगे और हो सकता है इनमें से अधिकांश की जमानत जब्त हो जाए और उन्हें निर्दलियों व नोटा से भी कम वोट मिलें। शिवसेना ने भी सभी सीटों पर ताल ठोंकने का ऐलान किया है लेकिन उसकी हालत भी जदयू से अलग नहीं होगी, परन्तु वह जितने भी वोट काटेगी उतने मत सीधे-सीधे भाजपा के ही कम होंगे। आम आदमी पार्टी राजनीतिक दलों की भीड़ में एक अलग संस्कृति विकसित करने और परम्परागत सियासत से निजात दिलाने के उद्देश्य से चुनावी समर में उतरने जा रही है, उसे दिल्ली में काफी सफलता भी मिली। केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में चल रही है और उसने कुछ नये प्रयोग भी किए हैं। पंजाब को छोडक़र अन्य किसी राज्य में उसे कोई अधिक सफलता नहीं मिली लेकिन मध्यप्रदेश में वह काफी लम्बे समय से अपने लिए राजनीतिक जमीन तलाश रही है और उसने आलोक अग्रवाल को अपना मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दिया है। आप ने प्रदेश में अपना एक संगठनात्मक ढांचा खड़ा कर लिया है और मतदान केंद्र तक समतियां भी बना दी हैं। बयालिस हजार मतदान केंद्रों तथा 65 हजार बूथों तक उसने अपनी जमावट कर ली है। आलोक अग्रवाल अनेक यात्राओं और जनता से जुड़ी समस्याओं को लेकर पूरे प्रदेश में जा चुके हैं और हर मुद्दे पर धरना-प्रदर्शन करने में उन्होंने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को भी काफी पीछे छोड़ दिया है। आम आदमी पार्टी दिल्ली मॉडल को सामने रखकर मतदाताओं का विश्वास जीतना चाहती है। यदि प्रदेश का मतदाता कांग्रेस और भाजपा से इतर कोई विकल्प तलाश रहा है तो उसे एक विकल्प देने का वायदा यह पार्टी कर रही है। भाजपा और कांग्रेस को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि इसने भी युवा कार्यकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशाली लोगों को अपने साथ जोड़ा है। एट्रोसिटी एक्ट में केंद्र सरकार द्वारा किए गए बदलाव के बाद सपाक्स ने जो आंदोलन छेड़ा उसका व्यापक असर देखा गया और इसने दोनों ही स्थापित राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है। जहां तक सपाक्स के प्रभावी होने का सवाल है वह कितनी प्रभावी हो पाएगी, यह तो चुनाव नतीजों से पता चल सकेगा लेकिन उसने 230 सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। चूंकि, केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकारें हैं इसलिए सपाक्स की नाराजगी का ज्यादा खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ेगा। कुछ न कुछ नुकसान कांग्रेस को भी हो सकता है, क्योंकि सत्ता-विरोधी मत जो उसे मिलते उसमें सपाक्स के आने से कुछ कमी हो सकती है। अनारक्षित वर्गों के हितों के संरक्षण के नाम पर गठित इस नए दल में अधिकतर सेवानिवृत्त या सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंचे अधिकारी व कर्मचारी हैं, फिलहाल इनके साथ कोई राजनीतिक शख्सियत नहीं जुड़ी है। यदि मतदाताओं के मानस में इससे जुड़े अधिकारी-कर्मचारी जो उम्मीदवार बनेंगे उनके सेवाकाल के आचरण ताजा हो गए तो फिर राजनीतिक दल के रूप में इसे लेने के देने भी पड़ सकते हैं। मूल रूप से सपाक्स सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों का संगठन है लेकिन उसी नाम से अब कुछ सेवानिवृत्त अधिकारियों ने आगे आकर इसे एक राजनीतिक दल बनाया है और 230 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लडऩे के लिए कमर कस ली है। वैसे, दल बनाने वालों ने ऐसा कोई कारण नहीं बताया कि आखिर ऐसा करने की अनिवार्यता क्यों आ पड़ी। सपाक्स से जुड़े जो नामी-गिरामी चेहरे सामने आए हैं उनमें से ऐसा कोई चेहरा नहीं है जिसने सवर्णों के हितों की रक्षा के लिए पद पर रहते हुए ऐसा कोई टफ स्टैंड लिया हो जैसा कि अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के कर्मचारियों के हितों के लिए इस वर्ग के आला अधिकारी लेते रहे हैं। देखने की बात यही होगी कि यह राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस को कितना नुकसान पहुंचाता है या फिर सेवानिवृत्त अधिकारियों की सत्ता में आने और राजनेता बनने की महत्वाकांक्षाओं की भ्रूम हत्या कर देता है। सवर्ण समाज के मतदाताओं को परम्परागत ढंग से भाजपा का मजबूत वोटबैंक माना जाता रहा है तो इसमें कुछ निश्चित प्रतिशत कांग्रेस मतदाताओं का भी है। भाजपा को भरोसा है कि वह अपने ब्राह्मण व ठाकुर नेताओं को आगे कर सपाक्स के उभार को न्यूनतम कर देगी और उसका परम्परागत वोट बैंक अधिक टस से मस नहीं होगा। जबकि कांग्रेस को भरोसा है कि सपाक्स के आंदोलन से जो मतदाता नाराज है वह कांग्रेस की झोली में ही गिरेगा क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। आस पर ही आसमान टिका है और किसका आशावाद ज्यादा पुख्ता निकलता है यह 11 दिसंबर को होने वाली मतगणना से ही पता चल पाएगा।