2023 का चुनाव जाति पर दांव

मप्र में विधानसभा चुनाव के करीब आते ही सियासत में एक


नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। राजनीतिक दलों ने जाति के आधार पर मतदाताओं को खुश करने के दांव चलना शुरू कर दिया है। राज्य की सियासत में यह पहला मौका है, जब जातिवादी राजनीति के दांव आजमाए जा रहे हैं। यह संकेत दे रहे हैं कि मप्र की सियासत उत्तर प्रदेश और बिहार की राह पर आगे बढ़ने लगी है। राज्य के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करना भाजपा और कांग्रेस दोनों का लक्ष्य है। दोनों ही दल यह मानकर चल रहे हैं कि साल के अंत में होने वाले चुनाव आसान नहीं होंगे। लिहाजा इन दलों ने हर वर्ग को लुभाने की योजनाएं बना डाली हैं।
सत्ताधारी भाजपा की सरकार स्वर्ण कला बोर्ड, रजत कल्याण बोर्ड, तेल घनी बोर्ड, विश्वकर्मा कल्याण बोर्ड, तेजाजी कल्याण बोर्ड और कुशवाहा कल्याण बोर्ड के गठन का ऐलान कर चुकी है। वहीं कांग्रेस की ओर से यादव समाज, केवट समाज और अन्य समाजों के साथ पिछड़ा वर्ग के सम्मेलनों का आयोजन किया जा चुका है। भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही दल समाजों के सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं , तो संबंधित समाजों से जुड़े नेता अपने लिए विधानसभा चुनाव में टिकट देने का दबाव भी बना रहे हैं। इन नेताओं का तर्क यही है कि उनकी जाति के मतदाताओं का जितना प्रतिशत है, उतने टिकट उस जाति के लोगों को दिए जाएं। कुल मिलाकर इस बार के चुनाव से पहले राज्य में उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति की छाया नजर आने लगी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एमपी में अब तक जाति के आधार पर राजनीति की दिशा में न तो भाजपा बढ़ी थी और न ही कांग्रेस। इस बार दोनों ही राजनीतिक दल सत्ता पाने की चाहत में उस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, जो आने वाले समय में राज्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।
70 सीटों पर जाति का प्रभाव
230 विधानसभा में से करीब 70 सीटों पर जाति और धर्म बाहुल्य होने का प्रभाव चुनाव में दिखाई देता है। राजनीतिक दल भी जातिगत समीकरण को ध्यान में रख टिकट देते हैं और वोट मांगते हैं। समाज और संगठन जाति बाहुल्य के हिसाब से टिकट में हिस्सा मांगते हैं। रीवा सतना, सीधी सहित कई विधानसभा ऐसी हैं, जहां चुनाव में जातिगत समीकरण हावी रहता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि समाजवादी पार्टी, बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टियों का वोट बैंक जाति आधारित रहा है। अब तो बड़े दल भाजपा और कांग्रेस भी जाति और समाज के वोट बैंक को देखकर निर्णय लेते हैं। मध्यप्रदेश में जाति और समाजों के आधार पर चुनावी बिसात बिछने लगी है। दल भी इन्हीं जातियों के आधार पर निर्णय लेते हैं। जबकि 70 के दशक और इसके पहले खासकर बड़े दलों में ऐसी स्थिति नहीं थी। ब्राह्मण, ठाकुर और पटेल समाज के लोग समीकरण बनाते-बिगाड़ते हैं। 2013 के चुनाव में 54 प्रतिशत सवर्णों ने भाजपा को और 24 प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया था। 2018 के चुनाव में भी कुछ स्थिति बदली थी, लेकिन अब यह वर्ग किसी भी दल से खुश नहीं है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दल इन्हें साधने में जुटे हैं। अब तो जातियों के साथ समाजों के आधार पर निर्णय हो रहे हैं।
मप्र में जाति का गणित
देश की चुनावी राजनीति की बात आती है तो दो सबसे बड़े फैक्टर सामने आते हैं- जाति और धर्म। मप्र में जाति ही तय करती हैं कि सरकार किसकी बनेगी। अब भी देश में 55 प्रतिशत वोटर प्रत्याशी की जाति देखकर वोट करते हैं। मप्र में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा 65 प्रतिशत है। सियासी दल भी जातियों की सोशल इंजीनियरिंग के हिसाब से ही प्रत्याशी उतारते हैं। मप्र में अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग की आबादी 23 प्रतिशत है। मालवा-निमाड़ और महाकौशल रीजन में 37 सीटों पर इनकी उपस्थिति निर्णायक है। विंध्य में 14 प्रतिशत ब्राह्मण मतदाता हैं और ये पूरे देश में ब्राह्मणों की बहुतायत वाले क्षेत्रों में से एक हैं। सर्वाधिक 29 प्रतिशत सवर्ण मतदाता इसी क्षेत्र में आते हैं। प्रदेश के 4.94 करोड़ वोटर्स में 10.12 प्रतिशत (50 लाख) मुस्लिम वोटर हैं, जो पश्चिमी मप्र के मालवा-निमाड़ और भोपाल संभाग में 40 सीटों पर दखल रखते हैं।
जातियों को साधने की तैयारी
चुनावी साल में भाजपा, कांग्रेस सहित अन्य दल सभी वर्गों को साधने के प्रयास में हैं। शिवराज सरकार ओबीसी के साथ अब आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को साधने की तैयारी शुरू हो गई है। इस वर्ग के नौजवानों को सरकारी नौकरी में 10 प्रतिशत आरक्षण के बाद अब इन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की फीस में 50 प्रतिशत की छूट दी है। यानी इन्हें अब 50 प्रतिशत ही फीस देना होगी। राज्य की आबादी 7.26 करोड़ से ज्यादा है। कुल आबादी में ईडब्ल्यूएस वर्ग की आबादी 72.60 लाख से ज्यादा है। प्रदेश के लिए यह बड़ा वोट बैंक है। ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण करने के बाद भी राजनीति दल इसे और बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। तर्क है कि राज्य में ओबीसी वर्ग की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, इसलिए आबादी के हिसाब से आरक्षण भी मिले। सामान्य वर्ग के गरीबों की कहीं कोई बात नहीं होती थी, ऐसे में इस वर्ग की राजनैतिक दलों के प्रति नाराजगी रहती है। धीरे-धीरे संगठित हुए इस वर्ग ने आवाज बुलंद की तो सरकारी नौकरी में 10 फीसदी आरक्षण लागू किया गया और अब प्रतियोगी परीक्षाओं में भी परीक्षा शुल्क में कमी की गई।
युवा ब्रिगेड के सहारे कांग्रेस-भाजपा
वहीं भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल तेजी से रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। दोनों पार्टियों की आंखे प्रदेश के युवा वोटर पर टिकी हैं। इसलिए दोनों दलों ने अपने युवा संगठनों को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। जिसे देखते हुए भाजयुमो और युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता प्रदेश में सक्रिय हो गए हैं। दरअसल, आगामी विधानसभा चुनाव में नौजवान मतदाता सरकार बनाने में 52 फीसदी की हिस्सेदारी रखेंगे, यही कारण है कि अब राजनैतिक पार्टियां युवाओं को लुभाने में लग गईं हैं। एक तरफ जहां मप्र की शिवराज सरकार युवाओं पर फोकस करते हुए नई-नई योजनाएं बना रही है, तो वहीं कांग्रेस बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने में लगी है।