पहलगाम हमला: सालभर बाद भी मोदी सरकार ने ‘सुरक्षा में चूक’ पर स्पष्टीकरण नहीं दिया

पहलगाम आतंकी हमले को एक साल बीत चुके हैं. हालांकि अब तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उन ‘खामियों’ के बारे में स्पष्टीकरण नहीं दिया है, जिनके चलते यह हमला संभव हो सका था. इस संबध में सरकार ने यह भी नही बताया है कि क्या हमले के बाद कोई सुधारात्मक उपाय किए गए हैं और क्या कोई जवाबदेही तय की गई है.

श्रीनगर: पहलगाम में हुए आतंकी हमले के एक साल बाद भी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने उन ‘खामियों’ को स्पष्ट नहीं किया है, जिनके कारण बंदूकधारियों के एक समूह ने जम्मू-कश्मीर में नागरिकों पर सबसे घातक हमलों में से एक को अंजाम दिया था.

इस संबध में सरकार ने यह भी नही बताया है कि क्या सुधारात्मक उपाय किए गए हैं और क्या कोई जवाबदेही तय की गई है.

24 अप्रैल, 2025 को केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों, जिनमें खुफिया ब्यूरो (आईबी) के अधिकारी और अन्य शामिल थे, ने राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित सर्वदलीय बैठक में जानकारी दी थी.

उन्होंने कहा था कि ‘चूक‘ हुई थी, जिनके कारण दो दिन पहले पहलगाम के बैसरन मैदान में नरसंहार हुआ था.

ज्ञात हो कि पिछले साल 22 अप्रैल को एक सुरम्य मैदान में हुए हमले में कम से कम 25 पर्यटक मारे गए थे. बताया गया था कि तीन आतंकी जंगल की ओर से आए और उन्होंने हिंदू पुरुषों के एक समूह को निशाना बनाया और उनके परिवारों के सामने एक-एक करके उनकी बेरहमी से हत्या कर दी.

इस हमले में एक कश्मीरी मुस्लिम टट्टू परिचारक भी कथित तौर पर एक हिंदू महिला को बचाने की कोशिश में मारा गया.

‘कोई यह नहीं कह रहा है कि सरकार दोषी है, लेकिन…’

इस दुखद घटना से पहले खुफिया एजेंसियों ने जम्मू और कश्मीर में पर्यटकों पर आतंकी हमले की चेतावनी दी थी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि ऐसा हमला कहां होगा.

कश्मीर की पूर्व वार्ताकार और ‘पैराडाइज एट वॉर: ए पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ की लेखिका राधा कुमार ने आरोप लगाया कि सुरक्षा प्रतिष्ठान खुफिया जानकारी के आधार पर संभावित खतरे वाले क्षेत्रों का प्रभावी आकलन करने में विफल रहा.

उन्होंने कहा, ‘कोई यह नहीं कह रहा कि सरकार इस विफलता के लिए दोषी है, लेकिन लोगों को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि बैसरन हमले को पूरी तरह से नजरअंदाज कैसे किया गया?’

हमले से दो सप्ताह पहले 8 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने श्रीनगर में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के साथ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा मामलों पर सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था, यूनिफाइड कमान (यूसी) की बैठक की अध्यक्षता की थी.

यह ज्ञात नहीं है कि बैठक के दौरान पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले से संबंधित खुफिया जानकारी पर चर्चा हुई या नहीं.

कुछ रक्षा एवं सुरक्षा विशेषज्ञों के साथ-साथ विपक्षी दलों ने उपराज्यपाल की अध्यक्षता वाली यूसी को खुफिया जानकारी में गंभीर विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराया.

‘पुलिस और स्थानीय खुफिया एजेंसियों के साथ आकलन और मंत्रणा’

मामले की जांच करने वाली राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अनुसार, पिछले साल ‘ऑपरेशन महादेव’ में मुठभेड़ में मारे गए बैसरन के तीनों हमलावर नरसंहार से कम से कम दो दिन पहले पहलगाम में थे.

तीनों हमलावरों में से एक फैसल जुट उर्फ ​​सुलेमान, जिसके बारे में माना जाता है कि वह 2023 में जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर चुका था, 20 अक्टूबर, 2024 को रणनीतिक जेड-मोरह सुरंग के पास हुए घातक हमले में भी शामिल था, जिसमें सात लोग मारे गए थे.

खुफिया जानकारी के बावजूद पहलगाम हमले को नाकाम करने में सुरक्षा तंत्र की संभावित विफलता का जिक्र करते हुए कुमार ने कश्मीर के लोगों के प्रति भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के ‘रवैया’ को दोषी ठहराया.
‘पुलिस और स्थानीय खुफिया एजेंसियों के साथ कितना आकलन और मंत्रणा हुई, यह एक अधिक गंभीर मुद्दा है. ऐसा प्रतीत होता है कि शीर्ष स्तर पर कुछ आदान-प्रदान को छोड़कर, बहुत कम ही मंत्रणा हुई. गृह मंत्री और सत्ताधारी दल का यह रवैया कि किसी भी कश्मीरी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, ने कई सुरक्षा खामियों को जन्म दिया, जिनके कारण बैसरन पर किसी का ध्यान नहीं गया.’

दिलचस्प बात यह है कि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने पिछले साल 24 अप्रैल को हुई सर्वदलीय बैठक में कहा कि बैसरन को खोलने के लिए पुलिस की अनुमति ‘नहीं मांगी गई’, जबकि अतीत में भी ऐसी अनुमति नहीं मांगी गई थी.

कुमार ने कहा, ‘यह हास्यास्पद है. इससे सरकार की अज्ञानता का पता चलता है और यह सुरक्षा में एक चूक प्रतीत होती है.’

यदि पुलिस की अनुमति आवश्यक थी, जैसा कि सरकार ने तर्क दिया है, तो यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इसे क्यों नहीं प्राप्त किया गया या प्रक्रिया को दरकिनार करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है या नहीं.

सुरक्षाहीन

गौरतलब है कि यह हमला एक ऐसे क्षेत्र में हुआ था जहां सेना की भारी तैनाती है और जहां वार्षिक अमरनाथ यात्रा का आयोजन होता है.

बैसरन से लगभग 10 किलोमीटर सड़क मार्ग से लिद्रू के पास एक सेना शिविर स्थित है, जबकि केंद्रीय रिजर्व अर्धसैनिक बलों, जो हमले के बाद सबसे पहले मौके पर पहुंचा था, का एक अड्डा बैसरन के मैदान से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित है.

हालांकि, पर्यटकों के बीच लोकप्रिय होने के बावजूद बैसरन को पूरी तरह से असुरक्षित छोड़ दिया गया था और घटनास्थल तक जाने वाली कच्ची सड़क पर सुरक्षाकर्मियों की कोई तैनाती नहीं थी, जिससे पर्यटक की सुरक्षा से समझौता हुआ.

खबरों के मुताबिक, बैसरन में तैनात सीआरपीएफ की दो कंपनियों में से एक को हमले से पहले कहीं और तैनात कर दिया गया था.

हमले के कुछ दिनों बाद, जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस दुखद हमले में शामिल हमलावरों के स्केच जारी किए. हालांकि, बाद में एनआईए ने पुष्टि की कि ये स्केच गलत थे.

वरिष्ठ पत्रकार और ‘द स्पाई क्रॉनिकल्स: रॉ, आईएसआई एंड द इल्यूजन ऑफ पीस’ और अन्य पुस्तकों के सह-लेखक आदित्य सिन्हा ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि हम यह भी पता लगा पाए कि असल हमलावर कौन थे.’

भाजपा हमेशा से कांग्रेस और अन्य दलों पर लापरवाही के लिए जवाबदेही न लेने का आरोप लगाती रही है, लेकिन आज तक किसी भी अधिकारी को दोषी नहीं पाया गया है.

पहलगाम त्रासदी के एक साल बाद भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं, जबकि नागरिक एवं सुरक्षा प्रतिष्ठान के उन अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है, जो सतर्कता और तत्परता से काम करके इस नरसंहार को रोक सकते थे.

अनुच्छेद 370 के बाद

पहलगाम हमले के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के इस दावे पर सवाल उठाए कि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में शांति लौट आई है.

पिछले साल केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता और शाह की उपस्थिति में हुई सर्वदलीय बैठक के समापन के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने पत्रकारों से कहा था, ‘पिछले कुछ वर्षों से कारोबार अच्छा चल रहा था, पर्यटक आ रहे थे; इस घटना ने उस माहौल को बिगाड़ दिया है और सभी ने इस पर चिंता व्यक्त की है. ख़ुफ़िया एजेंसी और गृह मंत्रालय के हमारे अधिकारियों ने भी कैसे यह घटना हुई और क्या चूक हुई, इस बारे में जानकारी दी.’

कुमार ने आगे कहा कि हालांकि, भारत जैसे देश में सुरक्षा चूक की ठीक से जांच होना और जवाबदेही तय होना दुर्लभ है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता और तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल आखिरी व्यक्ति थे जिन्होंने जिम्मेदारी ली थी– उन्होंने 2008 के मुंबई हमलों के बाद इस्तीफा दे दिया था.
उन्होंने आगे कहा, ‘आम तौर पर ‘मामले को अनदेखा करो, जब तक लोग भूल न जाएं’ वाला रवैया अपनाया जाता है. अगर आंतरिक स्तर पर खामियों की जांच की जाए, तो सुधार जरूरी हो जाते हैं. लेकिन क्या वे सुधार किए गए हैं, यह स्पष्ट नहीं है. इसके बजाय हम देखते हैं कि पुराने दमनकारी हथकंडे को ही अपनाया जा रहा है.’

सिन्हा के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल, जो औपचारिक रूप से नगर निगम के प्रमुख हैं, उन्हें तो ‘कम से कम’ बदल देना चाहिए था. ‘लेकिन वे अभी भी इस पद पर बने हुए हैं क्योंकि वे घाटी में गृह मंत्री के मुखपत्र हैं. यह बेहद शर्मनाक स्थिति है.

कुमार ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने कश्मीर के लोगों को आतंकवादी करार देकर उन्हें अलग-थलग कर दिया है. पहलगाम हमले के बाद संदिग्ध आतंकवादियों के कुछ घर ध्वस्त कर दिए गए, जबकि सैकड़ों युवाओं को हिरासत में लिया गया.

‘खुफिया एजेंसियां ​​लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाकर काम करती हैं. हम डिजिटल माध्यम से संदिग्ध बातचीत का पता लगा सकते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत का पता स्थानीय लोगों के साथ मज़बूत संबंध बनाकर ही लगाया जा सकता है.’

कुमार ने कहा कि इस बात के सबूत हैं कि जब शांति प्रक्रिया और बातचीत चल रही थी, तब घाटी में हिंसा कम हुई थी, ‘लेकिन हमारे देश के शासकों को लगता है कि जिसे कठोर सुरक्षा नीति कहा जाता है, वह असल में तानाशाही है, और इससे फायदा होगा. यह थोड़े समय के लिए तो कारगर हो सकता है, लेकिन साथ ही इससे असंतोष भी भड़केगा, जो आखिर में अपना रास्ता खोज लेगा, शायद तुरंत नहीं, लेकिन बाद में.