वोट हमारा मंत्र है, पर क्या यह लोकतंत्र है?

संविधान के अनुच्छेद 326 में सार्वभौम वयस्क मताधिकार का प्रावधान अब सर्वोच्च न्यायालय की निगाह में संवैधानिक अधिकार न होकर वैधानिक अधिकार भर रह गया है. बिहार से लेकर बंगाल तक हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण गवाह हैं कि संविधान का व्याख्याता व संरक्षक होने के बावजूद यह न्यायालय इस अधिकार को, किसी और की तो क्या, चुनाव आयोग की टेढ़ी नज़र से भी नहीं बचा पा रहा है.

सत्ता का खेल तो चलेगा…सरकारें आएंगी, जाएंगी…पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी…मगर यह देश रहना चाहिए…इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए! क्या पता, अरसा पहले यह ‘आप्तवाक्य’ कह गए भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच होते तो अपनी ही पार्टी की सरकार (वैसे सरकारों कहना बेहतर होगा) को देश के लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं को बेरहमी से बुलडोज करती देखकर क्या कहते और क्या सोचते!

यों तो यह सवाल 2014 में महानायक नरेंद्र मोदी के सत्तारूढ़ होने के बाद से ही देश के लोकतंत्र की छाती पर मूंग दलने वाली एक के बाद एक बरजोरियों के बाद जवाब की मांग करता रहा है, लेकिन अब मामला बरजोरी भर का नहीं रह गया है. कलाई मरोड़कर उसे ‘नियंत्रित लोकतंत्र’ बना देने की हद तक तक जा पहुंचा है, जिसके चलते प्रेक्षकों को पूछना पड़ रहा है कि इससे लाचार नागरिक जाएं तो कहां जाएं?

स्वाभाविक ही, ऐसे में ‘अटल होते तो क्या सोचते?’ के जवाब की मांग भी नई हो गई है. सोचिए जरा, जो वयस्क मताधिकार हमारे लोकतंत्र की टेक है, हम इन दिनों अपने बीच के लाखों लोगों को उससे वंचित कर देने की इस सरकार और इसके द्वारा नियुक्त चुनाव आयोग की मिलीभगत से की जा रही जो कवायदें झेल रहे हैं, उनके रहते हमारा लोकतंत्र अमर तो खैर क्या होगा, सुरक्षित भी कैसे महसूस कर सकता है?

बात को इस तरह समझ सकते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 326 में सार्वभौम वयस्क मताधिकार का जो प्रावधान है, अब वह सर्वोच्च न्यायालय की निगाह में हमारा संवैधानिक अधिकार न होकर वैधानिक (Statuary) अधिकार भर रह गया है और बिहार से लेकर बंगाल तक हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण गवाह हैं कि संविधान का व्याख्याता व संरक्षक होने के बावजूद यह न्यायालय इस अधिकार को, किसी और की तो क्या, चुनाव आयोग की टेढ़ी नजर से भी नहीं बचा पा रहा है.

चुनाव आयोग के निकट एक तार्किक विसंगति भी, जो अनेक मामलों में एक लिपिकीय त्रुटि से ज्यादा की अहमियत नहीं रखती, इस अधिकार को छीन लेने के लिए पर्याप्त हो चली है. तिस पर आयोग के पास सुभीता है कि वह मतदाता सूचियों के ‘विशेष’ और ‘समग्र’ नामधारी पुनरीक्षण को उसमें नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के बजाय पुराने मतदाताओं के नामों की अंधाधुंध कटौती के लिए इस्तेमाल कर ले.

साथ ही, यह देखने से एकदम से इनकार कर दे कि उसकी यह कारस्तानी वयस्क देशवासियों के मताधिकार को सार्वभौम न रहने देकर सरकार के मनपसंद मतदाताओं का विशेषाधिकार बना देती है. यह इस मायने में चुनाव आयोग का भी ‘विशेषाधिकार’ ही है कि इसकी बिना पर वह निपट निरंकुश भाव से अपनी शुभचिंतक सरकार को असुविधाजनक मतदाताओं से निजात दिला दे. भले ही इससे परंपरा से चली आ रही वह चुनाव पद्धति ही बदली-बदली नजर आने लगे, जिसके तहत मतदाता मनपसंद सरकार चुना करते हैं और लगने लगे कि अब सरकार अपने लिए मतदाता चुनने लगी है.

जाएं तो जाएं कहां?

अकारण नहीं कि इसके चलते कई प्रेक्षक मताधिकार से वंचित नागरिकों को लाचार होकर ‘जाएं तो कहां जाएं?’ के सवाल का सामना करते देख रहे हैं. अंध धार्मिकता व सांप्रदायिकता को केंद्र में रखकर फैसले कर रही सरकार और उसके कारण बेतरह क्षरण की शिकार संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष जाकर मतदाताओं की यह लाचारगी और भी दुर्निवार हो जाती है. भक्तों की चौतरफा जय-जयकार के समक्ष तो और भी, क्योंकि भक्ति और लोकतंत्र में पुराना वैर है.

तिस पर यह वैर अब यहां तक जा पहुंचा है कि पश्चिम बंगाल की नई भाजपा सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री अग्निमित्रा पॉल कह रही हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जिनके नाम काट दिए गए हैं, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिलेगा.

बहरहाल, सोचिए जरा कि ऐसे में देशवासियों के संवैधानिक व वैधानिक अधिकारों की रक्षा के मामले में अब तक रामबाण अवलंब माना जाता रहा सर्वोच्च न्यायालय भी उनको आश्वस्त न कर पाए और चुनाव आयोग द्वारा मताधिकार छीनने को लेकर उसकी ओर से ऐसी अगंंभीर टिप्पणी की जाने लगे कि जिनका मताधिकार छिना है, वे इस बार नहीं तो अगली बार वोट दे देंगे, तो क्या हम लोकतंत्र को गंवा देने के कगार तक पहुंच जाने जैसा अहसास नहीं करने लगते?
यह अहसास इस मायने में और चिंतित करता है कि जो दूसरी संस्थाएं कठिन वक्त में नागरिकों का संबल बन सकती थीं, उन्हें पहले से ही शक्तिहीन व निरुपाय कर दिया गया है.

इस सिलसिले में सबसे पहले समाचार माध्यमों की आजादी की बात करें, जो लंबे समय तक नागरिकों के हकों के पैरोकार रहे हैं, तो उनकी बदहाली का अंदाजा इस एक बात से ही बखूबी लगाया जा सकता है कि इस साल के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में हमारा देश छह और स्थान गिरकर 157वें पायदान पर जा पहुंचा है. गौरतलब है कि 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो यह 140वें स्थान पर था.

सिविल सोसाइटी की बात की जाए, तो उसके जिन संगठनों का लोकतांत्रिक मूल्यों व जनाधिकारों की रक्षा के लिए आवाजें उठाते रहने का इतिहास रहा है, मोदी सरकार शुरू से ही उनको किसी न किसी तरह उलझाये रखने और कमजोर करने के फेर में रही है. इसके लिए वह उन पर कड़े कानूनी व वित्तीय प्रतिबंधों से तो परहेज़ नहीं ही करती, विदेशी अंशदान (विनियमन) कानून (एफसीआरए) के तहत जारी उनके विदेशी फंडिंग लाइसेंस रद्द कर उनकी कर रियायतें भी कम या खत्म कर देती है.

सो भी वित्तीय पारदर्शिता के नाम पर, जबकि सबको पता है कि इस सबका एकमात्र उद्देश्य लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में उनका हस्तक्षेप न्यूनतम करना है. वे फिर भी सवाल उठाने से बाज नहीं आते तो ईडी और सीबीआई के जरिए भी उनको सबक सिखाया जाता है.

परिणाम यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गिरता हुआ देश का ‘सिविल सोसाइटी पार्टीसिपेशन इंडेक्स’ नीति-निर्माताओं और नागरिक समाज के बीच संवाद लगातार कमजोर होने के संकेत दे रहा है.

फ्रीडम हाउस और वी-डेम जैसे वैश्विक थिंक-टैंकों ने जहां भारत को ‘आंशिक रूप से स्वतंत्र’ या ‘इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी’ की श्रेणी में रखा हुआ है, वहीं आम धारणा है कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और संघवाद (केंद्र-राज्य संबंध) जैसी संवैधानिक प्रणालियों में सरकारी छेड़छाड़ बढ़ने से कोई चेक और तो बैलेंस नहीं रह गया है.

चौतरफा क्षरण

लोकतंत्र और संविधान जहां बुरी तरह संस्थागत असंतुलन के शिकार हो चले हैं, वहीं केंद्रीय सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग कोढ़ में खाज पैदा कर रहा है. मानवाधिकारों, खासकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का तो कोई नामलेवा तक नहीं रह गया है.

शिक्षाविद और बुद्धिजीवी इतने दबाव या असुविधा में हैं कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थाओं की स्वतंत्रता और चुनावों की निष्पक्षता पर ठीक से बहस तक नहीं कर पा रहे. सांप्रदायिकता और सामाजिक असमानता के जाए दबावों की तो चर्चा तक करना खतरे से खाली नहीं समझा जाता.

किसी समय छात्रसंघों को युवा पीढ़ी के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का जरिया माना जाता था और उससे निकले नेता आगे चलकर देश के लोकतंत्र को समृद्ध करने में बड़ी भूमिकाएं निभाया करते थे. लेकिन अब गिनती के केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में ही ये चुनाव होते हैं.

अन्यत्र वे लिंगदोह समिति के कड़े नियमों, शैक्षणिक सत्रों में देरी अथवा हिंसा के कारण प्रतिबंध या निलंबन झेल रहे हैं. इस सिलसिले में भाजपा सरकारों की भूमिका पर विचार करें तो वे युवाओं के लोकतांत्रिक प्रशिक्षण या देश के लोकतंत्र के भविष्य से ज़्यादा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की संभावनाओं को उजली करने की चिंता में रत रहतीं और उसकी अलोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर से आंखें मूंदे रखती हैं.

गांवों में लोकतंत्र की प्राथमिक इकाई के रूप में पंचायतों का हाल भी बुरा ही है. उन पर गुंडों, बाहुबलियों, तथाकथित उच्च जातियों और सामंती मानसिकता वाले रसूखदार लोगों का वर्चस्व अभी भी गंभीर समस्या बना हुआ है, लेकिन उसके कारणों को दूर करने की फिलहाल किसी भी स्तर पर कोई पहल नहीं है. इसके चलते लोकतंत्र वहां भी आर्थिक असमानता, पारंपरिक जाति व्यवस्था और कमजोर स्थानीय शासन के शिकंजे में जकड़ा हुआ है.

सोचिए जरा कि ऐसे में हम भारत के लोग कैसे अपने लोकतंत्र की खैर मनाएं और कैसे उसकी अमरत्व की कामना करें?

याद आता है, एक समय 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता तो आश्वस्ति के भाव से कहा जाता था कि वोट हमारा मंत्र है, यह लोकतंत्र है, लेकिन अब यह मंत्र नाना अंदेशों के हवाले होकर नारे से ज्यादा सवाल बन गया है वोट हमारा मंत्र है? यह लोकतंत्र है? विडंबना यह कि किसी भी तरफ से इसका कोई सार्थक जवाब सुनाई नहीं पड़ रहा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)