मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल फिल्म ‘करुप्पु’- जो एक ट्रायल कोर्ट में भ्रष्टाचार पर आधारित है, पर प्रतिबंध लगाने इनकार करते हुए कहा कि ऐसा चित्रण फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं हो सकता. साथ ही कहा कि कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है. पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं.

नई दिल्ली: हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल फिल्म ‘करुप्पु’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए कहा कि कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है. यह फिल्म एक ट्रायल कोर्ट में भ्रष्टाचार के चित्रण पर आधारित है.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने यह टिप्पणी एक वकील आरएस तमिलवेंडन द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए की.
याचिकाकर्ता का आरोप था कि फिल्म ‘करुप्पु’ में अदालतों को गलत तरीके से दिखाया गया है और न्यायिक व्यवस्था को बदनाम करती है.
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, ‘कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है. पहले भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं.’
पीठ ने यह भी कहा कि अदालतें और न्यायाधीश आलोचना से ऊपर नहीं हैं. अदालत ने कहा, ‘जजों को ‘पवित्र’ नहीं माना जाना चाहिए. न्याय कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे छिपाकर रखा जाए; उसे आम लोगों की जांच-परख और सम्मानजनक, भले ही बेबाक टिप्पणियों का सामना करने दिया जाना चाहिए.’
अदालत ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसपी भरूचा के उस बयान का भी उल्लेख किया, जो उन्होंने केरल के कोल्लम में आयोजित एक विधिक सम्मेलन में दिया था. उस बयान में उन्होंने संकेत दिया था कि देश के 20 प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं.
अदालत ने इस मामले में वरिष्ठ वकील शांति भूषण और उनके बेटे वकील प्रशांत भूषण द्वारा दिए गए एक ‘चौंकाने वाले बयान’ का भी संज्ञान लिया. हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि वह ऐसे व्यापक बयानों का समर्थन नहीं कर रही है.
अदालत ने कहा, ‘हम इतनी दूर तक नहीं जाएंगे. हम ऐसे व्यापक बयानों का समर्थन करने से भी इनकार करते हैं.’ हालांकि पीठ ने यह भी जोड़ा कि वह इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकती कि व्यवस्था में भ्रष्ट न्यायाधीश रहे हैं.
अदालत ने कहा, ‘हम न्यायिक भ्रष्टाचार की घटनाओं को जानते हैं और उनसे रूबरू भी हुए हैं. मद्रास हाईकोर्ट की फुल कोर्ट नियमित रूप से ऐसे भ्रष्ट तत्वों को बाहर का रास्ता दिखाती है.’
अदालत के समक्ष दायर याचिका में तमिलनाडु सरकार, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग तथा केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को निर्देश देने की मांग की गई थी कि वे ‘करुप्पु’ को सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंधित करें या उसके प्रदर्शन को नियंत्रित करें.
फिल्म की निर्माता कंपनी ड्रीम वॉरियर पिक्चर्स है. आरजे बालाजी इसके निर्देशक हैं. अभिनेता सूर्या और तृषा प्रमुख भूमिकाओं में हैं.
अदालत ने उल्लेख किया कि फिल्म की कहानी ‘सेवन वेल्स’ नामक जगह पर स्थित एक अदालत पर आधारित है. फिल्म में उस अदालत के पीठासीन अधिकारी को भ्रष्ट दिखाया गया है और एक अनैतिक वकील का अदालत के कामकाज पर ज़बरदस्त दबदबा है. हालांकि पीठ ने कहा कि ऐसा चित्रण फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं हो सकता.
अदालत ने कहा कि फिल्म का मूल विषय एक अनैतिक वकील और भ्रष्ट न्यायाधीश के बीच ‘अपवित्र गठजोड़’ है. आदेश लिखने वाले जस्टिस स्वामीनाथन ने यह भी दर्ज किया कि उन्होंने खुद यह फिल्म देखी है.
अदालत ने कहा, ‘यह सही है कि फिल्म में व्यवस्था का चित्रण बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया गया है. लेकिन तमिल फिल्मों की यही शैली है. नायक अकेले दर्जनों खलनायकों को हरा देता है. तमिल सिनेमा में सब कुछ मेलोड्रामा होता है. इसलिए करुप्पु को भी उसी शैली की एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए.’
पीठ ने आगे कहा कि किसी कलाकार को अपनी कहानी अपने तरीके से प्रस्तुत करने का अधिकार है और कलात्मक स्वतंत्रता को अत्यंत ऊंचा स्थान दिया जाना चाहिए.
अदालत ने कलात्मक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसलों का हवाला दिया, जिनमें एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम, प्रकाश झा प्रोडक्शंस बनाम भारत संघ, नचिकेता वाल्हेकर बनाम सीबीएफसी, वायकॉम 18 मीडिया बनाम भारत संघ और इंडिबिली क्रिएटिव बनाम पश्चिम बंगाल राज्य शामिल हैं.
पीठ ने आगे कहा कि जब एक बार सीबीएफसी ने फिल्म को मंज़ूरी दे दी हो, तो अदालत अपनी राय थोपकर किसी जनहित याचिका के आधार पर फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती.
याचिकाकर्ता की इस दलील पर कि यह फिल्म अदालत की आपराधिक अवमानना के दायरे में आती है, पीठ ने कहा कि जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला हो, तो अवमानना क़ानून की व्याख्या बहुत सीमित दायरे में की जानी चाहिए.
पीठ ने यह भी कहा कि फिल्म की कहानी एक काल्पनिक अदालत, जिसे ‘सेवन वेल्स कोर्ट’ नाम दिया गया है, पर आधारित है.
फैसले में कहा, ‘सेवन वेल्स कोर्ट नाम का कोई कोर्ट नहीं है. यह एक काल्पनिक कोर्ट है, ठीक वैसे ही जैसे आरके नारायण की रचनाओं में ‘मालगुडी’ एक काल्पनिक गांव है. जब किसी काल्पनिक कोर्ट की अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति को भ्रष्ट के रूप में दिखाया जाता है, तो उस पर ‘कोर्ट की अवमानना अधिनियम, 1971’ के तहत दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं होंगे.’
उल्लेखनीय है कि इसी साल राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की एक पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार वाले अध्याय को लेकर विवाद हुआ था. 26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक पर ‘पूर्ण और व्यापक प्रतिबंध’ लगाने का आदेश दिया था, जबकि केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया था कि 82,000 से अधिक प्रतियां पहले ही वापस ले ली गई थीं.
सुप्रीम कोर्ट ने पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार संबंधी सामग्री शामिल किए जाने को संस्था की छवि धूमिल करने की ‘सुनियोजित कोशिश’ और ‘गहरी साजिश’ बताया था.