अमेरिका एक रणनीतिक साझेदार है, लेकिन जब किसी रणनीतिक साझेदार की सेना आपके नागरिकों की जान लेती है, तो रणनीतिक संप्रभुता का तकाज़ा है कि उसकी सार्वजनिक रूप से निंदा की जाए. नई दिल्ली का ऐसा न कर पाना भारत के ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के दावे को कमज़ोर करता है.

नई दिल्ली: पिछले दो दिनों में ओमान के पास एमटी मारिवेक्स, एमटी सेटेबेलो और एमटी जलवीर पर अमेरिकी सेना के हमलों ने अमेरिका के साथ भारत के रिश्तों को लेकर मोदी सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इन तीनों जहाज़ों पर भारतीय नाविक सवार थे.
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने इस हफ़्ते खाड़ी में तीन जहाजों पर हमले किए हैं, और इन सभी पर भारतीय क्रू मौजूद था.
खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सेना की इन लक्षित कार्रवाइयों ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक ऐसी घटना को जन्म दिया है जिसमें अमेरिकी सेना ने भारतीयों की जान ली है.
इन मौतों पर अमेरिकी सेना या ट्रंप प्रशासन की ओर से अफ़सोस ज़ाहिर करने वाला कोई बयान नहीं आया है, जबकि नई दिल्ली के विरोध के बावजूद वे भारतीय नाविकों वाले कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाना जारी रखे हुए हैं.
हालांकि, न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही केंद्रीय कैबिनेट के किसी वरिष्ठ सदस्य ने भारतीय नागरिकों की हत्या के लिए अमेरिका की सीधे तौर पर निंदा करते हुए एक शब्द भी कहा है.
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान में हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों का नाम लेने से पूरी तरह बचा गया और इस जानलेवा हमले को बस ‘इलाके में चल रहे संघर्ष का सीधा नतीजा’ बताया गया.
शव मिलने पर केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग (शिपिंग) मंत्री के औपचारिक शोक संदेश के अलावा देश के राजनीतिक नेतृत्व ने एक सोची-समझी और दबी-दबी सी चुप्पी साधे रखी है.
वहीं, जब सोहार के पास समुद्र से भारतीय नाविकों के शव निकाले जा रहे थे, तब नई दिल्ली के राजनीतिक व्यवहार में एक बड़ा अंतर देखने को मिला.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पद पर 12 साल पूरे करने की उपलब्धि के लिए बधाई दी. पीएम मोदी ने तुरंत समय निकालकर ट्रंप की शुभकामनाओं के लिए सार्वजनिक रूप से उनका आभार जताया.
उल्लेखनीय है कि अमेरिका के इन सैन्य हमलों पर प्रधानमंत्री मोदी की लगातार चुप्पी भारतीयों की जान बचाने की संवैधानिक ज़िम्मेदारी का उल्लंघन है.
संविधान का अनुच्छेद 52 राष्ट्रपति को देश का रक्षक बताता है, लेकिन विदेशों में नागरिकों की सुरक्षा की ऑपरेशनल ज़िम्मेदारी प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली राजनीतिक कार्यपालिका की होती है.
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी सेना द्वारा निर्दोष भारतीयों की हत्या किए जाने पर चुप रहना प्रधानमंत्री के तौर पर उनके संवैधानिक कर्तव्य से मुंह मोड़ने जैसा है.
ये हमले न सिर्फ़ पीएम मोदी के मज़बूत नेतृत्व के दावों पर सवाल उठाते हैं, बल्कि भारत की ‘रणनीतिक संप्रभुता’ के सिद्धांत के साथ हुए धोखे को भी उजागर करते हैं. यह सिद्धांत कहता है कि जब देश के नागरिकों को नुकसान पहुंचे, तो भारत को – चाहे किसी के साथ कैसी भी साझेदारी हो – स्वतंत्र रूप से कदम उठाना चाहिए.
अमेरिका एक रणनीतिक साझेदार है, लेकिन जब किसी रणनीतिक साझेदार की सेना आपके नागरिकों की जान लेती है, तो रणनीतिक संप्रभुता का तकाज़ा है कि उसकी सार्वजनिक रूप से निंदा की जाए. नई दिल्ली का ऐसा न कर पाना भारत के ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के दावे को कमज़ोर करता है.
वास्तव में मोदी सरकार ने बार-बार इस बात पर ज़ोर देकर अमेरिकी कार्रवाई को परोक्ष रूप से सही ठहराने की कोशिश की है कि ‘दो जहाज़ों पर प्रतिबंध लगा हुआ था और एक जहाज़ नियमों का पालन नहीं कर रहा था.’
अपनी राजनीतिक ज़िम्मेदारी और घरेलू जवाबदेही से बचने के लिए सरकार ने कानूनी बारीकियों का हवाला देते हुए यह तर्क भी दिया है कि एमटी मारिवेक्स, एमटी सेटेबेलो और एमटी जलवीर विदेशी झंडे वाले जहाज़ थे (जिन पर पलाऊ या गिनी-बिसाऊ का झंडा लगा था) और वे भारतीय स्वामित्व वाले नहीं थे.
बता दें कि सेंटकॉम की ओर से कोई खेद न जताए जाने पर कुछ पूर्व विदेश सेवा अधिकारियों ने कड़ी आलोचना की है.
अब तक क्या-क्या हुआ?
बुधवार (10 जून) को विदेश मंत्रालय ने ओमान के तट पर मौजूद कमर्शियल जहाज़ एमटी सेटेबेलो के बारे में एक छोटा-सा आधिकारिक बयान जारी किया था.
बयान में कहा गया था: ‘हम आज ओमान के तट पर कमर्शियल जहाज़ सेटेबेलो पर हुए हमले की निंदा करते हैं. जहाज़ पर मौजूद 24 भारतीय क्रू सदस्यों में से अब तक 21 भारतीयों को बचा लिया गया है और 3 भारतीयों के लापता होने की खबर है.’
इसके बाद गुरुवार को केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग (शिपिंग) मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पुष्टि की कि लापता तीनों भारतीय नाविकों की मौत हो गई है; अमेरिकी सेना के सटीक मिसाइल हमले से जहाज़ का इंजन रूम बेकार हो जाने के बाद उनके शव बरामद किए गए.
एमटी सेटेबेलो पर हुए इस जानलेवा हमले से ठीक 24 घंटे पहले एक और जहाज़ एमटी मारिवेक्स पर भी हमला हुआ था, जिसमें भी 24 भारतीय क्रू सदस्य सवार थे.
सोमवार को एमटी मारिवेक्स पर हमले के बाद आधिकारिक सूत्रों ने कहा था कि यह ‘भारतीय झंडे वाला जहाज़’ नहीं था, इसलिए मोदी सरकार कोई कार्रवाई नहीं करेगी. सरकार ने हमले के लिए अमेरिका का नाम लेने से भी परहेज किया था.
मंगलवार को हुए जानलेवा हमले के जवाब में विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली में अमेरिकी चार्ज डी’अफेयर्स जेसन मीक्स को बुलाकर कूटनीतिक कदम उठाया.
अमेरिकी राजनयिक के समक्ष विदेश मंत्रालय में अपर सचिव नागराज नायडू ने औपचारिक रूप से भारत का विरोध दर्ज कराया और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई.
हालांकि, इसका अमेरिका पर कोई असर नहीं पड़ा और उसने गुरुवार को फिर से एमटी जलवीर को निशाना बनाया.
इसके बाद मोदी सरकार ने जानकारी दी कि ओमान के पास अमेरिकी सैन्य हमले के बाद एमटी जलवीर पर मौजूद सभी 20 क्रू सदस्य (जो सभी भारतीय थे) सुरक्षित हैं.
ताज़ा घटनाक्रम
अब बढ़ते गुस्से और दबाव के बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार (12 जून) को इस हफ़्ते दूसरी बार अमेरिकी एम्बेसी के चार्ज डी’एफ़ेयर्स को तलब किया है. मंत्रालय ने ऐसा ओमान की खाड़ी में तीसरे जहाज़ पर हमले, जिसमें ज़्यादातर भारतीय नागरिक थे, का विरोध जताने के लिए किया है.
ख़बरों के अनुसार, अमेरिकी एम्बेसी के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन जेसन मीक्स को दोपहर करीब 2 बजे जवाहरलाल नेहरू भवन में मंत्रालय के हेडक्वार्टर में बुलाया गया और उन्होंने एडिशनल सेक्रेटरी (अमेरिका) नागराज नायडू से मुलाक़ात की.
अधिकारियों के मुताबिक, मंत्रालय ने गिनी-बिसाऊ झंडे वाले टैंकर एमटी जलवीर से जुड़ी ताज़ा घटना पर भारत की चिंता जाहिर की.
यह राजनयिक कदम उस घटना के दो दिन बाद उठाया गया है जब नई दिल्ली ने 10 जून को पलाऊ के झंडे वाले टैंकर एमटी सेटेबेलो पर हुए हमले के विरोध में मीक्स को तलब किया था; इस हमले में तीन भारतीय नाविक मारे गए थे. ऐसा बताया जा रहा है कि अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर अभी भी भारत से बाहर यात्रा पर हैं.
इससे पहले जब उन्हें तलब किया गया था, तो वह घटना देर शाम हुई थी और सार्वजनिक रूप इस बारे में बताया नहीं गया था. हालांकि, शुक्रवार की बैठक दिन में कामकाज के समय में हुई और इस दौरान मंत्रालय की इमारत के अंदर-बाहर टीवी कैमरे मौजूद थे.