सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा नामांकन रद्द किए जाने को चुनौती देने वाली मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज़ की

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की मध्य प्रदेश से उनके राज्यसभा नामांकन को रद्द किए जाने ख़िलाफ़ दायर याचिका को खारिज़ करते हुए उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका दायर करने की छूट दी है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (12 जून) को कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन द्वारा मध्य प्रदेश से उनके राज्यसभा नामांकन को रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एएस चंडुरकर की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि नटराजन द्वारा दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है. अदालत ने उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव याचिका दायर कर अपनी चुनौती उठाने की छूट दी.

याचिका खारिज करते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 329 के तहत लगाए गए संवैधानिक प्रतिबंध का हवाला दिया.

अदालत ने कहा, ‘अगर न्यायालय ऐसे दलीलों को स्वीकार कर यह निर्धारित करने लगे कि कौन-से मामलों में अनुच्छेद 32/226 के तहत दखल दिया जाना चाहिए और किन अन्य मामलों में याचिकाकर्ताओं को चुनाव याचिका का सहारा लेने के लिए भेजा जाना चाहिए, तो यह न्यायालय अनुच्छेद 329 में ऐसा सिद्धांत अपना रहा होगा जिसका उसमें कोई प्रावधान नहीं है. हमें डर है कि ऐसी किसी भी व्याख्या को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता जिसके तहत कुछ मामलों में तो यह कोर्ट दखल दे, जबकि अन्य मामलों में पक्षकारों को चुनाव ट्रिब्यूनल से उपाय खोजने के लिए छोड़ दिया जाए.’

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा नामांकन रद्द किए जाने को चुनौती देने वाली कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी.

हालांकि अदालत ने चुनाव याचिका का रास्ता खुला रखते हुए स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

इससे पहले नटराजन का नामांकन कथित तौर पर इसलिए रद्द कर दिया गया था क्योंकि उन्होंने अपने शपथपत्र में अपने खिलाफ लंबित एक आपराधिक मामले का विवरण नहीं दिया था. कांग्रेस का कहना है कि नटराजन के नामांकन को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज ही नहीं किया गया था.

शुक्रवार को नटराजन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत को बताया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के अनुसार केवल उन्हीं आपराधिक मामलों का खुलासा करना आवश्यक है जिनमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जा चुके हों. उन्होंने कहा कि नटराजन को केवल भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 के तहत नोटिस प्राप्त हुआ है और अदालत ने शिकायत पर अभी संज्ञान भी नहीं लिया है.

सिंघवी ने अदालत से कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत आपराधिक मामले का खुलासा तभी आवश्यक है जब आरोप तय किए जा चुके हों.

उन्होंने यह भी कहा कि बीएनएसएस की धारा 223 के अनुसार संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है, जबकि जिस निजी शिकायत के आधार पर नटराजन का नामांकन खारिज किया गया, वह अभी संज्ञान लेने से पहले के चरण में है.

प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दिया कि चुनाव लड़ने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि सिर्फ एक कानूनी अधिकार है. इसलिए जब कोई मौलिक अधिकार ही नहीं है, तो अनुच्छेद 32 का सहारा नहीं लिया जा सकता.

जब रोहतगी, जो वर्चुअल माध्यम से सुनवाई में शामिल थे, तकनीकी कारणों से डिस्कनेक्ट हो गए, तब भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उनकी दलीलों को आगे बढ़ाने की इच्छा जताई.

इस पर सिंघवी ने पूछा कि क्या सॉलिसिटर जनरल उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं. सिंघवी ने कहा, ‘सरकार उम्मीदवार के समर्थन करने आई है.’ इस पर मेहता ने स्पष्ट किया कि वे उम्मीदवार की ओर से नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हो रहे हैं, जो इस रिट याचिका में हस्तक्षेप करना चाहती है.

रोहतगी के दोबारा जुड़ने के बाद उन्होंने दलील दी कि वर्ष 2018 के बाद उम्मीदवारों को अपने खिलाफ लंबित सभी मामलों का खुलासा करना आवश्यक है और फॉर्म-26 में इसकी अनिवार्यता है. इसके जवाब में सिंघवी ने कहा कि फॉर्म-26, धारा 33ए के प्रावधानों को निरस्त या उनसे ऊपर नहीं हो सकता.

उल्लेखनीय है कि 230 सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास राज्यसभा की दो सीटें आसानी से जीतने के लिए पर्याप्त संख्या बल था. सदन में उसके 164 विधायक है. इसके बावजूद पार्टी ने चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे – अपने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ, प्रदेश इकाई के सचिव रजनीश अग्रवाल और राज्य मत्स्यजीवी कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट.

महेश केवट के नामांकन ने क्रॉस-वोटिंग और दल-बदल की आशंकाओं को लेकर चिंता पैदा कर दी थी. इसके बाद रिटर्निंग अधिकारी द्वारा नटराजन का नामांकन खारिज किए जाने पर केवट और भाजपा के अन्य दोनों उम्मीदवार निर्विरोध राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो गए.

नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने एक बयान जारी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और निर्वाचन आयोग पर ‘हर लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने’ का आरोप लगाया था.

पार्टी ने कहा था, ‘जब संवैधानिक संस्थाएं राजनीतिक सुविधा का जरिया बन जाती हैं, तब लोकतंत्र टिक नहीं सकता. मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को खारिज किया जाना हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है.’