बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस माधव जामदार ने महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एक राजनीतिक कार्यकर्ता के ख़िलाफ़ जारी ज़िलाबदर किए जाने के आदेश रद्द करते हुए कहा कि नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है. उन्होंने सवाल किया, ‘क्या सभी नागरिकों को भारत सरकार का ग़ुलाम बनाया जा रहा है? वे न विरोध कर सकते हैं, न आंदोलन कर सकते हैं. आखिर यह सब क्या है?’

नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस माधव जामदार ने गुरुवार (2 जुलाई) को कहा कि नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने का अधिकार है और पुलिस ‘मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की नौकर’ नहीं, बल्कि जनता की सेवक है.
अदालत ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र पुलिस द्वारा एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ जारी किए गए जिलाबदर (निर्धारित अवधि तक किसी क्षेत्र से बाहर रहने) का आदेश को रद्द करते हुए की.
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने कहा, ‘यह क्या हो रहा है? क्या सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है? वे न विरोध कर सकते हैं, न आंदोलन कर सकते हैं. आखिर यह सब क्या है?’
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी नागरिकता अधिनियम, 1955 में किए गए संशोधनों और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित कर रहे थे. 3 दिसंबर 2025 को पुलिस उपायुक्त ने उन्हें एक वर्ष के लिए संबंधित क्षेत्र से बाहर रहने का आदेश दिया था, जिसे बाद में कोंकण रेंज के मंडल आयुक्त ने भी बरकरार रखा.
हालांकि, गुरुवार को हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द करते हुए इसे ‘दुर्भावनापूर्ण’ करार दिया.
जस्टिस जामदार ने अपने लिखित आदेश में कहा, ‘याचिकाकर्ता ने भारत सरकार के कुछ फैसलों के विरोध में मोर्चे और धरने आयोजित किए. केवल यही तथ्य महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को संबंधित क्षेत्र से बाहर रखने का आधार नहीं हो सकता.’
समाचार एजेंसी यूएनआई के अनुसार, अदालत ने अपने आदेश में आगे कहा, ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 नागरिकों को न केवल अपनी बात रखने की स्वतंत्रता देते हैं, बल्कि सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार भी प्रदान करते हैं. भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने मात्र के कारण याचिकाकर्ता के खिलाफ की गई कार्रवाई उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है.’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने यह भी कहा कि वह चौधरी के ख़िलाफ़ इस आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले पुलिस अधिकारियों पर जुर्माना लगाने पर विचार करेंगे.
उन्होंने कहा, ‘याचिकाकर्ता ने सिर्फ ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए थे. नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? विरोध करना उनका अधिकार है.’
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस जामदार ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा कि चौधरी भी ‘वॉशिंग मशीन’ में जा सकते हैं, क्योंकि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हैं.
उन्होंने टिप्पणी की, ‘वैसे भी पूरे महाराष्ट्र में हॉर्स ट्रेडिंग चल रही है.’ यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राज्य में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसद भाजपा सहयोगी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं.
जस्टिस जामदार ने आगे कहा, ‘परसों एक सड़क दुर्घटना में 10 साल के बच्चे की मौत हो गई, लेकिन राज्य विधानसभा में चर्चा इस बात पर हो रही थी कि अध्यक्ष का चुनाव कैसे हुआ और कौन किस पार्टी से दूसरी पार्टी में चला गया. आखिर यह सब क्या है?’
एसडीपीआई ने अपनी वेबसाइट पर चौधरी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का विवरण सार्वजनिक किया है. इसके अनुसार, उनके खिलाफ कुल चार एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें अधिकांश आरोप बिना अनुमति विरोध-प्रदर्शन करने, गैरकानूनी जमावड़ा लगाने और एक मामले में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से जुड़े हैं.