नरोत्तम मिश्रा के साथ भाजपा-कांग्रेस की साख दांव पर

मोहन सरकार के कार्यकाल का तीसरा उपचुनाव

मंगल भारत/भोपाल/दतिया विधानसभा उपचुनाव की घोषणा के साथ ही मध्यप्रदेश की राजनीति का केंद्र एक बार फिर बुंदेलखंड बन गया है। यह चुनाव सिर्फ एक रिक्त सीट भरने का औपचारिक उपचुनाव नहीं, बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है। भाजपा के लिए यह चुनाव पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक वापसी का अवसर है, जबकि कांग्रेस के सामने 2023 में जीती हुई सीट बचाने के साथ संगठन की एकजुटता साबित करने की चुनौती होगी। दतिया विधानसभा सीट लंबे समय तक डॉ. नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य राजनीतिक गढ़ मानी जाती रही। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने उन्हें हराकर प्रदेश की सबसे चर्चित राजनीतिक जीत दर्ज की थी। इस हार के बाद नरोत्तम मिश्रा सत्ता और विधानसभा दोनों से बाहर हो गए। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क बढ़ाया, धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की और संगठन के साथ तालमेल मजबूत करने का प्रयास किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा दतिया सीट वापस जीतती है तो नरोत्तम मिश्रा की प्रदेश राजनीति में भूमिका फिर मजबूत हो सकती है। वहीं दूसरी हार उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर नई बहस छिड़ सकती है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में यह तीसरा विधानसभा उपचुनाव होगा। अब तक हुए दो उपचुनावों में भाजपा और कांग्रेस एक-एक सीट जीत चुकी हैं। अमरवाड़ा में भाजपा के कमलेश प्रताप शाह ने कांग्रेस के धीरन शाह इनवाती को हराया। विजयपुर में कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा ने भाजपा प्रत्याशी एवं तत्कालीन वन मंत्री रामनिवास रावत को पराजित किया। ऐसे में दतिया का परिणाम तय करेगा कि उपचुनावों की इस राजनीतिक श्रृंखला में कौन बढ़त बनाता है।
टिकट को लेकर दोनों दलों में हलचल
भाजपा की ओर से पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का चुनाव लडऩा लगभग तय माना जा रहा है। कांग्रेस में टिकट के लिए तीन प्रमुख नाम चर्चा में हैं सेंवढ़ा के पूर्व विधायक घनश्याम सिंह, पूर्व विधायक राजेंद्र भारती, जो अपने पुत्र को टिकट दिलाने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व उपाध्यक्ष अवधेश नायक। वहीं आजाद समाज पार्टी (एएसपी) ने दामोदर यादव को मैदान में उतारने की तैयारी शुरू कर दी है। वे पिछले दो महीने से क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं।
कांग्रेस के लिए सिर्फ सीट नहीं, संगठन की भी परीक्षा
कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ सीट बचाने की नहीं है। पार्टी लंबे समय से गुटबाजी और वरिष्ठ नेताओं के बीच सार्वजनिक मतभेदों से जूझ रही है। ऐसे माहौल में दतिया उपचुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व की भी परीक्षा माना जा रहा है। राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस को ऐसा प्रत्याशी चुनना होगा जो स्थानीय समीकरणों के साथ संगठन को भी एकजुट रख सके। यदि टिकट वितरण में असंतोष उभरता है तो इसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।
बुंदेलखंड की राजनीति पर भी असर
दतिया उपचुनाव का असर सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। बुंदेलखंड में भाजपा और कांग्रेस दोनों अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश में हैं। चुनाव परिणाम आने वाले समय में क्षेत्रीय नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है। दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल एक विधायक तय नहीं करेगा। यह भाजपा के लिए नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक प्रासंगिकता, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में संगठन की चुनावी क्षमता और कांग्रेस के लिए जीतू पटवारी के नेतृत्व तथा संगठनात्मक मजबूती की भी महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है। इसलिए इस चुनाव पर पूरे प्रदेश की राजनीतिक निगाहें टिकी रहेंगी।
कानूनी विवाद भी बना हुआ है
उपचुनाव की घोषणा के बीच कानूनी विवाद भी जारी है। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती का कहना है कि उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है और अगली सुनवाई 8 जुलाई को निर्धारित है। उनका तर्क है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तब उपचुनाव की घोषणा नहीं की जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा है कि यदि हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलती है तो वे सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे।