पुणे कोर्ट ने कहा- सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना करना राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना नहीं

पुणे की एक अदालत ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के एक पदाधिकारी को ज़मानत देते हुए कहा कि हर नागरिक को सरकार के कार्यों पर टिप्पणी करने, उसकी सराहना या आलोचना करने का अधिकार है. यह मामला सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की कथित रूप से छेड़छाड़ की गई तस्वीरें प्रसारित करने तथा नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दर्शाने वाली सामग्री पोस्ट करने संबंधी आरोपों से जुड़ा हुआ है.

नई दिल्ली: पुणे की एक अदालत ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) (राकांपा (शप)) के एक पदाधिकारी को ज़मानत देते हुए एक अहम टिप्पणी में कहा कि सरकार या मुख्यमंत्री की आलोचना करने मात्र को राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना नहीं माना जा सकता.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बीडी कुलकर्णी ने मंगलवार (14 जुलाई) को कहा कि हर नागरिक को सरकार के कार्यों पर टिप्पणी करने, उसकी सराहना या आलोचना करने का अधिकार है.

इस संबंध में राकांपा (शरदचंद्र पवार) के पदाधिकारी महादेव बालगुडे की ज़मानत अर्ज़ी मंज़ूर करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘रिकॉर्ड पर ऐसी कोई बात नहीं है जिससे पता चले कि आरोपी ने राज्य के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने की घोषणा या उकसावा दिया हो, या भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को ख़तरे में डालने वाला कोई काम किया हो.’

उल्लेखनीय है कि महादेव बालगुडे को सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की कथित रूप से छेड़छाड़ की गई तस्वीरें प्रसारित करने तथा नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दर्शाने वाली सामग्री पोस्ट करने के आरोप में इस साल अप्रैल में गिरफ़्तार किया गया था.

उनके ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 समेत अन्य धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया गया था. धारा 152 भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को जानबूझकर खतरे में डालने से संबंधित है.

न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस मामले में बीएनएस की धारा 152 लागू करना विवाद का विषय है. साथ ही आरोपी के ख़िलाफ़ लगाई गई अन्य सभी धाराएं ज़मानती प्रकृति की हैं.

अदालत ने कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और पुलिस आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है इसलिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ की अब और आवश्यकता नहीं है.

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि मामले से जुड़े दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि आरोपी ने कुछ मामलों की जांच प्रक्रिया और सरकार की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए थे. यह विषय सार्वजनिक विमर्श के दायरे में आते हैं.

सुनवाई के दौरान बालगुडे के वकील समीर शेख ने दलील दी कि यह मामला राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है. उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना करना संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है.

गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में एक और कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि ‘नागरिकों के साथ भारतीय सरकार के गुलामों जैसा व्यवहार किया जा रहा है.’

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 3 जुलाई को एक ऐसे ही आदेश में राजनीतिक कार्यकर्ता सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के ख़िलाफ़ जारी जिलाबदर (किसी व्यक्ति को किसी इलाक़े या ज़िले से बाहर रखना/निकलना) के आदेश को रद्द करते हुए कहा था कि सरकार के फैसलों का विरोध करना या उसके ख़िलाफ़ नारे लगाना किसी नागरिक को किसी क्षेत्र से निकालने का वैध आधार नहीं हो सकता.

उल्लेखनीय है कि सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी ने राज्य पुलिस द्वारा 3 दिसंबर, 2025 और 27 मार्च, 2026 को उनके ख़िलाफ़ जारी किए गए एक्सटर्नमेंट के आदेशों को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी. पुलिस ने सईद अहमद को एक साल के लिए मुंबई और आसपास के इलाकों से बाहर करने का आदेश दिया था.

याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की थी. साथ ही विरोध-प्रदर्शनों को दबाने की प्रवृत्ति पर मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि नागरिकों के साथ भारत सरकार के गुलामों जैसा व्यवहार किया जा रहा है.
याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ दर्ज कई एफआईआर को देखते हुए जज ने पूछा था कि क्या ‘भाजपा सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाना देशद्रोह है. क्या नागरिक ऐसे नारे नहीं लगा सकते?

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि अगर कोई नागरिक ऐसा करना चाहे, तो यह उसका अधिकार है.

जस्टिस जामदार ने मौखिक रूप से कहा था कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह हैं, किसी मंत्री के अधीन काम करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं. पुलिस अधिकारी जनता के सेवक हैं, न कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के.

आदेश को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता ने भारत सरकार के कुछ फैसलों के ख़िलाफ़ मार्च और धरने आयोजित किए थे. इन कामों के आधार पर महाराष्ट्र पुलिस एक्ट के तहत किसी व्यक्ति को इलाके से बाहर नहीं निकाला जा सकता.

कोर्ट ने तब कहा था कि यह कार्रवाई गलत नीयत से की गई थी और इससे संविधान के आर्टिकल 19 और 21 के तहत याचिकाकर्ता के अधिकारों पर असर पड़ा है. अदालत के आदेश में यह भी कहा गया कि नागरिकों को अपनी राय ज़ाहिर करने और सम्मान के साथ जीने की आज़ादी है.