पुस्तक समीक्षा: ‘मैं बरबाद होना चाहती हूं’ मलिका अमर शेख की आत्मकथा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश ज़रूर देती दिखती है कि भारतीय समाज में बेटियों को इस लायक ज़रूर बनाया जाए कि वह अपने सिर पर बनी रहने वाली छत ज़रूर खरीद सकें, ताकि उन्हें खदेड़े जाने पर उलटकर पति के ही यहां अथवा अन्य किसी के यहां शरण न लेनी पड़े.

मराठी की सुप्रसिद्ध कवि मलिका अमर शेख जब अपनी आत्मकथा ‘मैं बरबाद होना चाहती हूं’ में यह कहती है कि हम जितना सहते हैं, हमारे सिर पर अन्याय का बोझ उतना ही भारी होता जाता है, उसका निहितार्थ यह ही है कि स्त्री को किसी भी सूरत में वंचना नहीं सहनी चाहिए यह उसकी सबसे बड़ी जिल्लत है.
बकौल मलिका हर स्त्री का अस्तित्व जन्म से स्वतंत्र ही होता है और उसे चाहिए कि वह इसे हर कीमत पर बचाए रखे. जिस स्त्री को यह पता हो कि कहां रुकना है, उसे स्वतंत्र प्रज्ञा की स्त्री समझा जाए. जीवन एक बार मिलता है. उसे दीनता में जीना, यह भी किसी अपराध से कम नहीं. जब स्त्री के पास एक अलग मस्तिष्क, सोचने की क्षमता है तो क्यों स्त्री स्वयं को मिटाकर पुरुष का वर्चस्व स्वीकार करे.
पर मलिका जिन्होंने मराठी के बदलावकारी दलित कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह किया था और जिस तरह का स्वयं को मिटाते चलने वाला जीवन जिया, उसका वह ‘मर्म’ जिसमें पीड़ा का अमानुषिक प्रवाह कभी थमता नहीं, हमारी समझ में आता है.
हालांकि, स्त्रियों को लेकर इस तरह की बातें हम स्त्रियों और पुरुषों दोनों के मुंह से पहले भी सुनते और पढ़ते रहे हैं. मगर इन बातों में बसे यथार्थ से, उसके रूप, रंग और सुभाव से हमारी असल और नग्न मुलाकात तब होती है जब हम मलिका अमर शेख की इस जीवनी को पढ़ते हैं. क्योंकि ये हमें, अपने ही ताप में निरंतर ‘झुलसती’ जाती किसी स्त्री लेखक के किसी लेख अथवा भाषण के हिस्से नहीं वरन उसकी असहनीय अनुभवजन्य पीड़ा से उपजी व्यथा की तपिश के रूप में बांचने को मिलते हैं.
संघर्ष की शुरुआत
इस जीवनी को पढ़ते हुए सबसे पहले और सबसे सरल आम कथन जो हमारे जेहन और हमारी जुबान पर आता है वह यह कि ज़रूरत क्या थी ‘ऐसे आदमी से विवाह करने की’, क्या अक्ल बेच खाई थी, जिसके चलते अपने बुरे-भले का बिल्कुल भान नहीं रहा.’ जबकि घर का वातावरण पूर्व से ही विचार और कला संपन्न था, तो उस प्रश्न के उत्तर की शक्ल में यह प्रतिप्रश्न हमारे सामने आता है कि तब हमारे पास वह कवि मलिका अमर शेख नहीं होती जिसे हमने ‘मैं बरबाद होना चाहती हूं’ पढ़कर पाया है.
फिर प्रश्न, क्या तब वह कहीं किसी जगह दुनिया की भीड़ में गुमी हुई मलिका अमर शेख होती. जिसे वह खुद भी नहीं जानती और किसी गृहस्थी में रहकर पति के साथ सोती, बच्चे पालती और नौकरी करती मलिका अमर शेख होकर रह जाती. जो तब भी कविता लिखती होती और अपनी स्मृति में थोड़ा बहुत गा भी रही होती. मलिका अमर शेख के संबंध में उठने वाले ये प्रश्न और प्रतिप्रश्न दोनों ही मेरी समझ में गलत हैं.
मलिका अमर शेख तब नामदेव ढसाल के बिना भी मलिका अमर शेख ही होती. मलिका अमर शेख ने नामदेव ढसाल को अपनी पसंद के पुरुष के रूप में चुना था. जिसका एक सच यह भी है कि नामदेव ढसाल ने मलिका के सामने स्वयं को उपस्थित बनाए रखा, जिसके चलते भी वह मलिका की पसंद बन सका. वह उसके लगातार विकसित होने जाने की संभावना से भरे आक्रामक और अराजक व्यवहार से परिचित होते जाते हुए उसे पसंद कर रही थी और उसकी पसंद बनती जा रही थी. घर-परिवार की समझाइश और नामदेव की सामाजिक-आर्थिक और स्थानीय स्तर की जीवन- परिस्थितियों से अच्छी तरह से परिचित होने के बावजूद वह यहां बराबर की भागीदार थी.
शायद उसे अपनी इस प्रारंभिक धारणा पर विश्वास रहा हो कि हमारे बीच का ‘प्रेम’ सब नियंत्रण में रखेगा अथवा जब हमारे बीच प्रेम है तो सब स्वीकार्य है. मगर ऐसा नहीं हो सका और उन दोनों के बीच पनपा ‘प्रेम’, प्रेम करने वाले एक के पैरों के नीचे जल्द ही कुचला जाने लगा.
परिणाम की शक्ल में जब सामाजिक, सांगठनिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली होते जाते नामदेव ढसाल के कहीं-कहीं पितृसत्ता और कहीं-कहीं बेलगाम, अस्थिर-चित्त अनियंत्रित-अराजकता का प्रतिनिधित्व करते पुरुष-मानस ने सबसे पहले मलिका अमर शेख और अपने बीच के ‘प्रेम’ को बार-बार और स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त करना प्रारंभ किया, वहीं से मलिका अमर शेख का मलिका अमर शेख बनना भी प्रारंभ हुआ.
पुरुष-सत्ता से भिड़ंत
क्या औरतें इसी तरह नामदेव ढसाल जैसे क्रांतिकारियों के जीवन या परिस्थितियों में खुद पहुंचकर अथवा खींच ली जाकर तिल-तिल मरते हुए मरती हैं या मलिका अमर शेख की तरह पल-पल मजबूत बनती हैं? हां इस धारणा की सकारात्मकता पर भरोसा किया जा सकता है. स्त्री हो या पुरुष अंतिम सांस तक जीने के लिए लड़ना और तत्कालीन कठिनतम परिस्थितियों को उलट कर रख देना ही मनुष्य होना है. मनुष्यता संवेदना आधारित ही नहीं संघर्ष आधारित भी होती है.
मनुष्यता का मापदंड रोने-धोने से ही नहीं स्वयं को रोने-धोने से रोक देने से भी होता है. ऐसा नहीं कि नामदेव ढसाल के व्यवहार से निरंतर आहत होती जाती मलिका अमर शेख रोती या आंसू नहीं बहाती या नामदेव ढसाल को कोसती नहीं. वह सब करती है. मगर इसे बर्दाश्त करती मलिका का आत्मविश्वास इतना प्रगाढ़ है कि कि वह हर बार अपने तन और मन पर होने वाले प्रहार को पश्चाताप के स्थान पर प्रस्तर में बदल लेता है. जिसे किसी दिन उसके जीवन को नर्क में बदल देने में लगे अपराधी पुरुष-पति के सिर पर मारा जा सके.ठीक इस बदले हुए रूप में मलिका को नामदेव ढसाल से भिड़ने के क्रम में, भिड़ते रहने के लिए खुद को और धारदार बनाते जाते हुए हम यहां देख सकते हैं. किसी औरत का किसी पुरुष से अलग होने का निर्णय लेना. उससे अपने बच्चे का संरक्षण मांगना. इसके लिए कोर्ट-कचहरी पुलिस करना, पुरुष-सत्ता से भिड़ना ही है.
अपनी देह पर अनेक खरोंचे लिए यहां मलिका हमें नामदेव ढसाल नामक अंधेरे को भेदकर एक सुबह की तरह उगने की कोशिश करती मिलती है. यदि सुबह कोई स्त्री है तो उसकी पूरी रात मलिका अमर शेख की तरह अंधेरे से लड़ने में जाती होगी.
विवाह के बाद पैसों की घोर कमी से जूझने, आंदोलन के लिए मलिका के गहने तक बेच देने, दिन-रात घर में घुसे रहने वाले दलित पैंथर कार्यकर्ताओं के रोटी-पानी, कपड़े-जूतों की व्यवस्था के बीच निजता तलाशती मलिका के साथ बुरी तरह मारपीट और गाली-गलौज करते नामदेव ढसाल ने क्या मलिका को भी उन्हीं औरतों में से एक की तरह देखना प्रारंभ कर दिया था जिनके बीच वह निरंतर रहा और उनके साथ लगातार सोया? जिनसे हासिल घातक यौन-रोग उसके जिस्म से मलिका के जिस्म में स्थानांतरित हो गया.
जैसा कि मलिका बताती हैं, नामदेव को कमाठीपुरा में सब जानते थे, वेश्याएं उनके ग्राहक, गुंडे-मवाली, नशेड़ी-दलाल पुलिस-अन्य दलों के राजनेता आदि. उसकी पार्टी का कार्यालय भी कमाठीपुरा में ही था और उसका घर भी उसके एकदम नजदीक जहां वह पहली बार अपने परिवार के साथ उसके परिवार से मिलने गई.
नामदेव ढसाल के साथ मलिका अमर शेख ने मुंबई की अधिकांश सड़कें और गलियां ही नहीं कमाठीपुरा का पूरा नर्क घूमकर देखा भी और उनके बीच जाकर, उनसे बात कर, उनके लिए कुछ काम भी किया. मगर बार-बार मलिका के साथ मारपीट और गाली-गलौज करते और बाद में मलिका के पैरों में गिरकर माफी मांगते रोते-गिड़गिड़ाते नामदेव ढसाल के इस कुछ ही दिन में बदल जाने वाले विक्षिप्त-व्यवहार पर मलिका कब तक भरोसा करती.
हारकर वह क्यों न लिखती कि दरअसल, पुरुष की कोई जाति (पहचान) नहीं होती. सभ्यता तो उसमें हरगिज नहीं होती. समझा जा सकता है कि नामदेव के पल में मानुष से अमानुष होने ने मलिका को खुद के साथ रहने को किस विकल्पहीन विवशता के चलते प्रेरित किया.
लड़ते ही रहना है…
मलिका अमर शेख यदि अपनी आत्मकथा में कवि, और तब की दलित राजनीति के नव-नेतृत्वकर्ता नामदेव ढसाल के बारे में जब यह लिखने में संकोच नहीं करतीं कि आपातकाल का समर्थन करने वाले क्रांतिकारी कवि के पास खूब सारा पैसा कहां से आता, वह साथ रहते यह कभी नहीं जान सकी. मगर वह पैसा जिस मात्रा में जिस तेजी से आता वह उसे उतनी ही तेजी से जाता हुआ भी देखती. महंगी शराब, मंहगे होटलों में खाना, महंगी यात्राएं. इसके बाद भी घर में फाकाकशी की आने वाली नौबत.
नामदेव का उसकी नाक के नीचे एक गोरी-चिट्टी औरत के साथ रहने लगना और अवसर मिलने पर अन्य औरतों के साथ रहने को लेकर उसके विचार तथा एक ऐसे राजनीतिक दल से स्वयं को जोड़ लेने पर अपनी नाराज़गी व्यक्त करने पर लिखने में मलिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है.
मगर ऐसा भी नहीं कि उन्होंने अपने बारे नहीं लिखा. उन्होंने यह बताने में कोई संकोच नहीं बरता कि विवाह से पूर्व उन्होंने नामदेव ढसाल के साथ शारीरिक संबंध बनाए. यह भी कि उन्होंने नामदेव से अलग रहना प्रारंभ करने के पश्चात स्वयं को संभाले रहने के क्रम में बीयर और सिगरेट पीना शुरू किया. लेकिन यह जिज्ञासा भरी उल्लेखनीयता है कि नामदेव से दूर रहने की शुरुआत के बाद वह किसी अन्य पुरुष की तरफ आकर्षित नहीं हुईं या कोई उनकी तरफ़ आकर्षित नहीं हुआ.
क्या किसी नजदीक के व्यक्ति ने उनके अकेलेपन में घुसपैठ करने का प्रयास नहीं किया. क्या उनके मन किसी के साथ स्वयं को रिक्त कर लेने का ख़याल नहीं आया. या कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसा चाहते हुए भी नामदेव ढसाल के आतंक और भय ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक लिया.
बहरहाल, उनके आत्मकथ्य से स्वभाविक या अस्वभाविक रूप से, नामदेव से बदला लेने, उसे पीड़ा पहुंचाने के लिए बहक जाने अथवा बहकने की सीमा तक पहुंचने के कोई संकेत नहीं मिलते.
यह आत्मकथा अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश ज़रूर देती दिखती है कि भारतीय समाज में बेटियों को इस लायक ज़रूर बनाया जाए कि वह अपने सिर पर बनी रहने वाली छत ज़रूर खरीद सकें, ताकि उन्हें खदेड़े जाने पर उलटकर पति के ही यहां अथवा अन्य किसी के यहां शरण न लेनी पड़े.
मलिका यहां भी मलिका हो सकी कि उसके पास पिता के घर लौटने की संभावना थी.. लाल झंडा यूनियन पार्टी के सक्रिय सदस्य, प्रभावी वक्ता, अभिनेता और कवि अमर शेख और हिंदू ब्राह्मण मां की बेटी के लिए उसके बचे रहने के लिए वह घर वरदान साबित हुआ.
मलिका अमर शेख की इस आत्मकथा का एक भाग बरसों पहले ‘मैं खाक में मिल जाना चाहती हूं’ शायद इस शीर्षक से हंस में पढ़ा था. जिसे मेरे एक मराठी भाषी आत्मीय मित्र ने मुझे पढ़ने दिया था. मलिका अमर शेख जैसी अनूठी स्त्री और कवि के लेखन से यह मेरा पहला परिचय था, और अब ये अच्छी तरह से अनूदित होकर किताब बनकर सब तक पहुंचा है.
इस आत्मकथा को मैं इस मामले में शानदार आत्मकथा कहूंगा कि इसमें उन्होंने कोई विक्टिम कार्ड नहीं खेला है. न हीं उन्होंने नामदेव ढसाल को राक्षस साबित करने की कोशिश की है.
उन्होंने स्वयं को और उसे मनुष्य ही बनाए रखा है और यह उन्होंने इस आत्मकथा के पाठकों पर छोड़ दिया है कि वह नामदेव ढसाल को इस आत्मकथा से जानकर किस तरह लेते और किस नाम से पुकारते हैं. कवि मलिका अमर शेख खुद को बचाए और बनाए रखने के लिए बीच-बीच में अपने लिए छोटा-छोटा जीवन खोजते हुए जितना लड़ सकीं उतना लड़ी हैं.
अनेक पहलुओं से पढ़ी और आंकी-परखी जाने वाली अपनी आत्मकथा में जितना कह सकती थीं उतना कह सकी हैं. मगर स्त्रियों को उनसे भी आगे जाकर लड़ना है. कहना है. बल्कि लड़ते ही रहना है.