अनुकंपा नियुक्ति: चक्कर लगा-लगाकर थक गए आश्रित

आश्रित बने निराश्रित
भोपाल/मंगल भारत

प्रदेश की सरकार हमेशा दावे करती है कि वह कर्मचारियों और उनके परिवारों के बड़ी हितैषी है। उनके हर दुख दर्द में सरकार सदैव साथ खड़े रहती है। इसी प्रकार अनुकंपा नियुक्ति को लेकर भी बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन अनुकंपा नियुक्ति के लिए आश्रितों को परेशान होना पड़ रहा है। आश्रित परेशान होकर दफ्तर,अफसर और मंत्री के चक्कर लगा-लगाकर अधेड़ हो जाता है लेकिन उसे अनुकम्पा नियुक्ति नहीं मिलती। सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी शासकीय विभागों में अनुकंपा नियुक्ति के प्रकरणों का समय पर समाधान नहीं हो पा रहा है। हर विभाग में लंबी अवधि गुजरने के बाद भी दिवंगतों के आश्रितों को सेवा में नहीं लिया गया है। मप्र राज्य कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हेमंत श्रीवास्तव का कहना है कि अनुकंपा नियमों में शिथिलीकरण जरूरी है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र लिखा गया है। चीफ सेक्रेटरी के समक्ष भी मुलाकात में इस मुद्दे को रखा गया है। नियमों की जटिलता से प्रकरण उलझे हैं।
जानकारी के अनुसार, स्कूल शिक्षा और पंचायत विभाग में सबसे अधिक मामले लंबित पड़े हैं। अनुकंपा प्रकरणों का समाधान करने विभागवार अभियान चलाने के निर्देश सीएम दे चुके हैं, लेकिन किसी भी विभाग में इसका गंभीरता से पालन नहीं हो रहा है। पंचायत विभाग में पांच सौ प्रकरण अनुकंपा के लंबित पड़े हैं। साल 2011 से एक भी प्रकरण का विभाग में समाधान नहीं हो पाया है। पूर्व और मौजूदा विभागीय मंत्री और प्रमुख सचिव को भी दिवंगतों के आश्रित अपनी पीड़ा बता चुके हैं। स्कूल शिक्षा विभाग में सात सौ प्रकरण लंबित पड़े हैं। ज्यादातर उन दिवंगत अध्यापकों के यह प्रकरण हैं, जिनका शिक्षा विभाग में संविलियन हुआ था।
नियमों का सरलीकरण होना चाहिए
विभागों में दिवगत विभिन्न संवर्गों के आश्रितों के लिए जहां अनुकंपा के लिए भटकना पड़ रहा है। वहीं मरणोपरांत लिपिकों के पात्र परिजनों के लिए एक कंडिका परेशानी का कारण बनी है। साल 2014 में इस संवर्ग में अनुकंपा के लिए सीपीसीटी (कंप्यूटर प्रोफिशिएंसी सर्टिफिकेट टेस्ट) यानि कम्प्यूटर दक्षता परीक्षा ने अनेक के भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया है। तीन साल की अवधि में यह परीक्षा उत्तीर्ण करने का प्रावधान रखा है। इस अवधि में अगर एग्जाम सफल नहीं हुआ तो अनुकंपा पाने वाले आश्रित को सेवा से निकालने का प्रावधान है। अभी तक प्रदेश भर में सवा दो सौ ऐसे कर्मचारियों को सेवा से निकाला गया जो अनुकंपा पाने के तीन साल बाद सीपीसीटी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाए हैं। जबकि इस संबंध में उप मुख्यमंत्री भी जीएडी को नोटशीट लिख चुके है, लेकिन नियम शिथिल नहीं हो पाया है। मप्र लिपिक वर्गीय शासकीय कर्मचारी संघ के संरक्षक एमपी द्विवेदी का कहना है कि अनुकंपा में नियमों का सरलीकरण होना चाहिए। पिछले कई सालों से हम यह मांग उठा रहे हैं। समय पर दिवंगतों के आश्रितों को अनुकंपा नहीं मिलने से आंदोलन भी हो चुके हैं, फिर भी कोई सुधार नहीं है।