महिला आरक्षण पर विपक्ष के विरोध पर शोधात्मक लेख लेखक सत्येंद्र साहू का राजनीतिक विश्लेषण.भोपाल.

महिला आरक्षण पर विपक्ष के विरोध पर शोधात्मक लेख लेखक सत्येंद्र साहू का राजनीतिक विश्लेषण.

महिला सशक्तिकरण की बहस तेज संसद में महिला आरक्षण पर विपक्ष की भूमिका पर उठे सवाल।

भोपाल/संसद में महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है।इसी विषय पर मध्यप्रदेश के लेखक सत्येंद्र तुलाराम साहू ने एक शोधात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है,जिसमें उन्होंने महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष के रुख और उसके संभावित राजनीतिक कारणों पर विस्तार से चर्चा की है।
लेखक के अनुसार महिला आरक्षण केवल एक विधेयक नहीं बल्कि देश की महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उचित भागीदारी दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। उनका कहना है कि संसद में जब महिला आरक्षण बिल पास न होने की घोषणा हुई तो विपक्षी दलों की ओर से तालियां और मेज थपथपाकर प्रतिक्रिया दी गई, जिसे वे महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर विरोधाभासी स्थिति के रूप में देखते हैं।साहू अपने लेख में बताते हैं कि संसद की वर्तमान 543 सीटें वर्ष 1971 की जनसंख्या के आधार पर तय हैं, जबकि जनसंख्या में हुए बड़े बदलाव के कारण भविष्य में परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या लगभग 850 तक पहुंचने का अनुमान व्यक्त किया जाता है।ऐसे में यदि परिसीमन के दौरान सीटों का आरक्षण बदलेगा तो कई पारंपरिक राजनीतिक क्षेत्रों की स्थिति भी बदल सकती है।
लेखक का तर्क है कि कई दलों की पारंपरिक और पारिवारिक मानी जाने वाली सीटें-जैसे अमेठी,रायबरेली या अन्य क्षेत्र-यदि महिला,अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हो जाती हैं तो राजनीतिक दलों को अपने पुराने क्षेत्रों से हटकर नए क्षेत्रों में चुनाव लड़ना पड़ सकता है।अपने विश्लेषण में उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में देश की “मातृशक्ति” की राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी,जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं।लेखक ने अंत में नागरिकों और विशेष रूप से महिलाओं से लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहने और अपने मताधिकार का उपयोग सोच-समझकर करने की अपील की है।यह लेख महिला प्रतिनिधित्व,परिसीमन और भविष्य की राजनीति को लेकर चल रही बहस को एक नया दृष्टिकोण देने का प्रयास करता है।