इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले होते हैं और कई बार उनकी लिंचिंग तक हो जाती है और जहां आरोपियों के ख़िलाफ़ केस दर्ज नहीं होते या ठीक से जांच नहीं होती – उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के बजाय उन मामलों में हस्तक्षेप करता दिख रहा है, जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं.

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक पीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी है जिसमें राज्य के मदरसों की जांच का जिम्मा आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को सौंपा गया था. अदालत ने कहा कि वह एनएचआरसी के आदेशों से ‘हैरान’ है, खासकर तब जब वह मुस्लिम समुदाय पर हुए कई हमलों और लिंचिंग की घटनाओं पर चुप रहा.
जहां जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि राज्य और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग देश में मुसलमानों पर हमलों और लिंचिंग के मामलों में स्वतः संज्ञान लेने में विफल रहा है. वहीं, जस्टिस विवेक सरन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आयोग ऐसे मामलों पर ध्यान दे रहा है जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं.
यह मामला ‘टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया’ द्वारा दायर एक याचिका पर आधारित था. इस याचिका में उत्तर प्रदेश के मदरसों के संबंध में एनएचआरसी द्वारा पारित आदेशों को चुनौती दी गई थी.
अंतरिम आदेश में कहा गया, ‘प्रथम दृष्टया, यह अदालत एनएचआरसी द्वारा पारित आदेश से हैरान है. एनएचआरसी की शक्तियां, उसका दायरा और उसके काम करने का क्षेत्र ‘मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993’ से तय होता है.’
बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस श्रीधरन ने कहा, ‘ऐसे मामलों में जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमले होते हैं और कई बार उनकी लिंचिंग तक हो जाती है, और जहां आरोपियों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं होते या ठीक से जांच नहीं होती – उन मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के बजाय मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप करता दिख रहा है, जो प्रथम दृष्टया उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते.’
उन्होंने यह भी कहा कि अदालत को ऐसा कोई उदाहरण ज्ञात नहीं है, जब एनएचआरसी ने कभी ऐसी स्थितियों में खुद संज्ञान लिया हो, जहां कानून को अपने हाथ में लेने वाले लोग (vigilantes) देश के आम नागरिकों को, सिर्फ इसलिए परेशान करते हैं क्योंकि वे किसी अलग समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.’
जज ने कहा, ‘लेकिन इसके बजाय उनके पास ऐसे मामलों पर विचार करने का समय है जो अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और जहां प्रभावी रूप से न्याय दिया जा सकता है.’
उन्होंने आगे कहा कि कभी-कभी अलग धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर चाय या कॉफी पीना भी डर का कारण बन जाता है.
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को सरकार, प्राधिकरण या किसी व्यक्ति के खिलाफ मौलिक और कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए रिट जारी करने तथा अवैध कार्यों पर रोक लगाने का अधिकार देता है.
बार एंड बेंच के अनुसार, हालांकि, जस्टिस सरन इन बातों से सहमत नहीं थे और उन्होंने कहा, ‘चूंकि, पैराग्राफ नंबर 6 और 7 में कई बातें कही गई हैं, जिनसे मैं सहमत नहीं हूं, इसलिए मैं उस आदेश से अलग राय रखता हूं, जो मेरे साथी जस्टिस अतुल श्रीधरन ने दिया है.’
उन्होंने यह भी कहा कि मामले के गुण-दोष या एनएचआरसी की भूमिका से जुड़े किसी भी आदेश के लिए संबंधित सभी पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए थी.
जस्टिस सरन ने कहा, ‘मैं इस तथ्य से भी अवगत हूं कि एक रिट अदालत किसी खास पक्ष की गैर-मौजूदगी में भी आदेश पारित कर सकता है. हालांकि, इस मामले में… जब कुछ निश्चित टिप्पणियां की जा रही थीं, तो यह उचित होता कि सभी पक्षों का अदालत में समुचित प्रतिनिधित्व होता. पक्षकारों की अनुपस्थिति में प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए थीं.’
अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई स्थगन (adjournment) को स्वीकार किया और राज्य की आपत्तियों को खारिज कर दिया. मामले की अगली सुनवाई 11 मई को होने की संभावना है.