नागरिकता, जन्मतिथि से इनकार, तो आख़िर किस बात का प्रमाण है आधार?

देश में आज कल लगभग हर सेवा में आधार कार्ड मांगा जाता है, लेकिन सरकार और यूआईडीएआई बार-बार स्पष्ट करते रहे हैं कि यह जन्मतिथि, नागरिकता या कई मामलों में पते का अंतिम प्रमाण नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर आधार की क़ानूनी और व्यावहारिक हैसियत क्या है?

नई दिल्ली: भारत में ‘आधार’ संख्या आज लगभग हर नागरिक के जीवन का हिस्सा बन चुकी है. बैंक खाता खुलवाने से लेकर मोबाइल सिम लेने, राशन पाने, टैक्स रिटर्न भरने, पेंशन लेने, छात्रवृत्ति पाने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने तक आधार की मांग आम बात है. लेकिन दूसरी तरफ, समय-समय पर सरकार, अदालतें, विभागीय संस्थाएं और खुद भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) यह स्पष्ट करते रहे हैं कि आधार कई महत्वपूर्ण चीज़ों का वैध प्रमाण नहीं है.

ताज़ा विवाद तब सामने आया जब यूआईडीएआई ने फिर स्पष्ट किया कि आधार जन्मतिथि का वैध प्रमाण नहीं है. यदि किसी व्यक्ति की जन्मतिथि पर विवाद हो, तो उसे अलग दस्तावेज़ देने होंगे.

यूआईडीएआई ने कहा कि आधार अधिनियम, 2016 पहचान स्थापित करने की बात करता है, लेकिन जन्मतिथि प्रमाण के रूप में इसकी मान्यता का स्पष्ट उल्लेख नहीं करता.
यानी जिस दस्तावेज़ में किसी व्यक्ति की जन्मतिथि छपी होती है, वही दस्तावेज़ उस जन्मतिथि का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा रहा.

यह पहला मौका नहीं है. इससे पहले जनवरी 2024 में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने आधार को जन्मतिथि प्रमाण की सूची से हटा दिया था. ईपीएफओ ने कहा था कि यह कदम यूआईडीएआई के निर्देश के बाद उठाया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी विभागों को निर्देश दिया था कि आधार कार्ड को जन्मतिथि के आधिकारिक प्रमाण के रूप में स्वीकार न किया जाए.

2025 में यूआईडीएआई प्रमुख ने लखनऊ के एक कार्यक्रम में कहा था कि आधार नागरिकता, पते या जन्मतिथि का प्रमाण नहीं है.

यानी अब तक अलग-अलग स्तरों पर यह कहा जा चुका है कि आधार:

नागरिकता का प्रमाण नहीं है
जन्मतिथि का प्रमाण नहीं है
कई मामलों में पते का अंतिम प्रमाण नहीं है
डोमिसाइल का प्रमाण नहीं है
फिर सवाल उठता है कि आधार है किस चीज़ का प्रमाण?

यूआईडीएआई की आधिकारिक स्थिति यह है कि आधार मुख्य रूप से पहचान (आइडेंटिटी) सत्यापित करने का माध्यम है. वह भी तब, जब उसका प्रमाणीकरण (ऑथेंटिकेशन) किया जाए, जैसे ओटीपी, बायोमेट्रिक या क्यूआर आधारित सत्यापन.

दूसरे शब्दों में, आधार यह कहता है कि यह व्यक्ति वही है जो खुद को बता रहा है. लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि उसकी जन्मतिथि, नागरिकता, स्थायी निवास या अन्य विवरण कानूनी रूप से अंतिम रूप से सिद्ध हो जाएं.

यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है.

क्योंकि व्यवहार में आधार को देश की सबसे प्रभावशाली पहचान प्रणाली बना दिया गया है. केंद्र सरकार और विभिन्न संस्थाओं ने कई क्षेत्रों में आधार को अनिवार्य या लगभग अनिवार्य बना रखा है. उदाहरण के लिए:

पैन कार्ड से आधार लिंक करना
आयकर रिटर्न दाखिल करना
एलपीजी सब्सिडी
मनरेगा भुगतान
राशन प्रणाली (पीडीएस)
छात्रवृत्तियां
पेंशन भुगतान
बैंक केवाईसी
मोबाइल सिम सत्यापन (कई मामलों में)
डीबीटी योजनाएं
सरकारी भर्ती व लाभार्थी सत्यापन
यानी राज्य नागरिक से कहता है कि योजनाओं, सेवाओं और वित्तीय लेन-देन के लिए आधार दें; लेकिन जब अधिकार, उम्र, नागरिकता या वैधता का सवाल आता है, तब कहा जाता है कि आधार पर्याप्त प्रमाण नहीं है.

बिहार के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे अभियानों के दौरान भी आधार को लेकर सवाल उठे थे कि यदि यह देश का सबसे व्यापक पहचान दस्तावेज़ है, तो फिर मतदाता सत्यापन या नागरिकता से जुड़े मामलों में इसकी स्थिति अस्पष्ट क्यों है.

कानूनी रूप से देखा जाए, तो इसका कारण आधार की मूल संरचना में छिपा है. आधार नागरिकता रजिस्टर नहीं है. यह राष्ट्रीयता तय नहीं करता. यह जन्म पंजीकरण प्रणाली भी नहीं है. यह मुख्यतः एक डिजिटल पहचान संख्या है, जिसे कल्याणकारी योजनाओं और पहचान प्रमाणीकरण के लिए विकसित किया गया था.

लेकिन वर्षों में इसे प्रशासनिक सुविधा के नाम पर इतने क्षेत्रों में फैला दिया गया कि आम नागरिक के लिए आधार ‘सब कुछ’ बन गया. अब जब विभाग कहते हैं कि यह फलां चीज़ का प्रमाण नहीं है, तब भ्रम पैदा होता है.
यही कारण है कि विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि सरकार को आधार की सीमाएं और उपयोग दोनों साफ़-साफ़ बताने चाहिए. यदि यह केवल पहचान का साधन है, तो इसे नागरिकता, जन्मतिथि या निवास के विकल्प की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए. और यदि इसे लगभग हर सेवा के लिए जरूरी बनाया जा रहा है, तो फिर इसकी वैधानिक स्थिति को लेकर स्पष्टता भी उतनी ही जरूरी है.

आज स्थिति यह है कि आधार सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला दस्तावेज़ है, लेकिन शायद सबसे ज़्यादा गलत समझा जाने वाला भी. नागरिक के हाथ में कार्ड है, मगर उसके अर्थ पर अब भी धुंध बनी हुई है.

आधार को लेकर चेतावनी

दिसंबर 2025 में आधार को लेकर 200 से अधिक प्रमुख नागरिकों और 54 अधिकार संगठनों ने संयुक्त बयान जारी कर दुनिया के देशों को भारत के आधार मॉडल से सावधान रहने की अपील की थी. यह बयान मानवाधिकार दिवस से ठीक पहले जारी किया गया था.

हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि विश्व बैंक की ID4D पहल आधार को केन्या, नाइजीरिया और युगांडा जैसे देशों के लिए सफल मॉडल के तौर पर पेश कर रही है, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भारत यात्रा के दौरान आधार को ‘बड़ी सफलता’ बताया था.

बयान में कहा गया कि आधार शुरुआत में स्वैच्छिक बताया गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यावहारिक रूप से अनिवार्य बन गया. सामाजिक कल्याण योजनाओं, राशन, पेंशन और अन्य लाभों तक पहुंच कई जगह आधार पर निर्भर कर दी गई.

हस्ताक्षरकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आधार की केंद्रीकृत डेटाबेस संरचना नागरिकों की निगरानी, प्रोफाइलिंग और सामाजिक नियंत्रण का औजार बन सकती है, खासकर सत्तावादी सरकारों के हाथों में. उन्होंने यह भी कहा कि अनेक सरकारी और निजी डाटाबेस को आधार से जोड़ने से निजता और डेटा सुरक्षा के खतरे बढ़े हैं.

बयान में यह भी कहा गया कि आधार में दर्ज नाम, जन्मतिथि, पता जैसी जनसांख्यिकीय जानकारियों में बड़ी संख्या में त्रुटियां हैं, लेकिन इन्हें सुधारने की प्रक्रिया कठिन है. इसका सबसे अधिक असर गरीबों, बुजुर्गों, विकलांगों और हाशिये के समुदायों पर पड़ा है, जिन्हें लाभ योजनाओं से बाहर होने का जोखिम झेलना पड़ता है.

आलोचकों ने बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की विफलताओं को भी बड़ा मुद्दा बताया. उनका कहना था कि फिंगरप्रिंट या आइरिस सत्यापन न होने पर लोगों को राशन, पेंशन या अन्य सेवाओं से वंचित होना पड़ा.

संयुक्त बयान में यह भी कहा गया था कि आधार भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा पूरा नहीं कर सका, बल्कि नई तरह की समस्याएं पैदा हुईं, जैसे पहचान की धोखाधड़ी, बैंकिंग जोखिम, लंबी कतारें, अपडेट की दिक्कतें और शिकायत निवारण की कमजोर व्यवस्था.

हस्ताक्षरकर्ताओं ने यह आरोप भी लगाया कि आधार परियोजना की शुरुआत पर्याप्त कानूनी ढांचे के बिना हुई और बाद में बने कानून में संसदीय निगरानी के प्रावधान कमजोर कर दिए गए.