पश्चिम बंगाल में ‘खिले’ कमल की उत्तर प्रदेश के चुनाव पर कैसी छाया पड़ेगी?

पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने केंद्र की अपनी सत्ता और चुनाव आयोग की शक्तियों के अभूतपूर्व दुरुपयोग की मार्फत जिस तरह 293 सीटों का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता है, निस्संदेह, उससे अखिलेश यादव की चिंताएं कई गुनी हो जानी चाहिए. इसलिए और कि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में सत्तारूढ़ होने के कारण इस प्रदेश में भाजपा के सामने ऐसा करने में कोई समस्या ही नहीं है.

असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी विधानसभाओं के चुनाव नतीजों को लेकर उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा दिलचस्पी, फिलहाल, इस सवाल के जवाब में दिखाई देती है कि अगले साल होने जा रहे उसके विधानसभा चुनाव पर इनका – खासकर पश्चिम बंगाल में भाजपा की ‘हैरतअंगेज’ दिग्विजय का – किस रूप में और कितना असर पड़ेगा?

जवाब आसान होता, अगर यह दिग्विजय वाकई दिग्विजय होती. दूसरे शब्दों में कहें तो उसके लिए किये गए अश्वमेध यज्ञ ने जनादेश को सचमुच जनादेश रहने दिया होता और अम्पायर को अपनी तरफ मिलाकर चुनावी मुकाबले की सारी नैतिकताओं को मटियामेट न कर दिया होता.

तब शायद किसी भी विश्लेषक को इस प्रश्न का उत्तर देते हुए इतनी ‘सावधानी’ न बरतनी पड़ती, जितनी बरतनी पड़ रही है. हैरत की बात यह कि इसके बावजूद कुछ ज्यादा ही सावधान विश्लेषक ऐसे-ऐसे उत्तर दे रहे हैं, जिन्हें सुनकर गत जनवरी में हुए महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनाव के नतीजों को लेकर एक स्वनामधन्य विश्लेषक की टिप्पणी याद आने लगती है. उन्होंने लिखा था कि उनमें हुई सत्ता दलों की जीत का राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक असर होगा.

यह ठकुरसुहाती बर्दाश्त नहीं हुई तो मैंने उन्हें लिखा कि भाई, 2024 के लोकसभा चुनाव के महाराष्ट्र की सीटों के नतीजों का तो राष्ट्रीय स्तर पर कौन कहे, चंद महीनों बाद हुए इस राज्य के विधानसभा चुनाव तक के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ा और वे अप्रत्याशित रूप से उसके विलोम बन गए. फिर आप कैसे कह सकते हैं कि उसके नगर निकाय चुनाव के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव डालेंगे?

कैसे-कैसे असर!

तब से कई महीने बीत गए, लेकिन उनके उत्तर की मेरी प्रतीक्षा खत्म नहीं हुई. कौन जाने, अब भाजपा की अभूतपूर्व पश्चिम बंगाल विजय के अगले बरस उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक बार फिर उसका कमल खिलाने में निर्णायक होने की बाबत लिख चुकें तो उत्तर देने की सोचें और मैं उनसे पूछूं कि यह असर मतदाताओं द्वारा पांच में से तीन राज्यों में सत्ता दलों को चलता कर देने या भाजपा के लगातार स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के आड़े आते रहने के विरुद्ध गुस्से के रूप में क्यों नहीं हो सकता?

बहरहाल, उनको सोचने दीजिए और याद कीजिए: उत्तर प्रदेश के गत (2022 के) विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) की लगभग उतनी ही मर्मांतक हार, जितनी पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार बताई जा रही है, के बाद ममता ने अखिलेश को उस हार को हार न मानने और निराश न होकर संघर्ष करते रहने की सलाह दी थी.

उन्होंने कहा था कि वे चुनाव नतीजे मतदाताओं का ईमानदारी से दिया गया जनादेश नहीं, बल्कि भाजपा द्वारा की गई वोटों की लूट है, हार के बावजूद सपा का वोट प्रतिशत 20% से बढ़कर 37% हो गया है, जो एक बड़ी उपलब्धि है और ‘खेला अभी बाकी है’.

अब चार साल बाद जब खुद उनके साथ ही खेला हो गया है, अच्छी बात है कि अखिलेश ने यह समझने में कतई देर नहीं की है कि अब ममता को उनसे वैसी ही हमदर्दी की जरूरत है.

इसलिए उन्होंने यह कहने में कतई विलंब नहीं किया है कि भाजपा ने उसी मॉडल से बंगाल का चुनाव जीता है, जिससे 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपनी करारी शिकस्त के बाद विधायकों के सांसद बन जाने से रिक्त हुई विधानसभा सीटों के उपचुनाव जीते थे. तब चुनाव आयोग की मिलीभगत से समूची सरकारी मशीनरी द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा को जिताने के लिए कुछ भी उठा न रखने का सिलसिला मिल्कीपुर और कटेहरी विधानसभा सीटों के उपचुनावों तक चलता आया था. इस सिलसिले की शुरुआत 2022 के रामपुर में लोकसभा व विधानसभा सीटों के उपचुनाव से हुई थी.
तब एक के बाद एक उपचुनाव हारने से परेशान अखिलेश ने बुरी तरह हताश व निराश सपा कार्यकर्ताओं को यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश की थी कि 2027 में जब प्रदेश की सभी 403 सीटों के लिए विधानसभा का आम चुनाव होगा तो भाजपा के लिए इन उपचुनावों की तरह चुनाव आयोग और अपनी सत्ताशक्ति का दुरुपयोग करके जनादेश का अपहरण करना संभव नहीं होगा.

मुंह में खून

उस वक्त उनकी बात पूरी तरह सही लगती थी, लेकिन अब भाजपा ने उसको भी ग़लत सिद्ध कर दिया है.

पश्चिम बंगाल में विपक्ष में रहते हुए उसने केंद्र की अपनी सत्ता और उसके द्वारा नियुक्त चुनाव आयोग की शक्तियों के अभूतपूर्व दुरुपयोग की मार्फत जिस तरह 293 सीटों का विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता है, निस्संदेह, उससे अखिलेश की चिंताएं कई गुनी हो जानी चाहिए. इसलिए और कि उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों में सत्तारूढ़ होने के कारण इस प्रदेश में उसके सामने ऐसा करने में कोई समस्या ही नहीं है.

इस कारण और कि लोकलाज उसे कतई सताती नहीं और चुनाव जीतने के लिए मोदी-योगी अंतर्विरोध समेत अपनी सारी अंदरूनी समस्याओं से निपट लेने के गुर उसको किसी से सीखने नहीं हैं.

तिस पर थोड़ी भिन्न स्थिति (जिसके चलते एक समय मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से सबसे ज्यादा खिन्न मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही हुए) के कारण उसे उत्तर प्रदेश में पश्चिम बंगाल जैसे प्रपंचों की जरूरत ही नहीं है. इसकी तो कतई नहीं कि विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर केंद्र व चुनाव आयोग मिलकर उसे सुभीते के वोटर उपलब्ध कराकर असुविधाजनक वोटरों से निजात दिलाएं.

वह बिहार की तरह विधानसभा चुनाव के दौरान किसी योजना के नाम पर महिलाओं के खातों में कुछ हजार रुपयों की नकदी डालकर काम चला लेने की भी सोच सकती है. बिहार ही क्यों, असम में भी इसी रास्ते पर चलकर वह अपनी हिमंता सरकार की शानदार वापसी कराने में सफल रही है, जो अन्यथा खासी अलोकप्रिय हो चली थी. अलबत्ता, उस राज्य की विधानसभा सीटों के मनमाफिक परिसीमन और हिमंता के लगातार साम्प्रदायिक विषवमन ने भी उसे खास तरह से ‘लोकप्रिय’ बनाने में भूमिका निभाई.

सवाल है कि जब उसके मुंह ऐसी योजनाओं का खून लगा हुआ है, तो उत्तर प्रदेश में उनके ‘सार्थक इस्तेमाल’ से उसे कौन रोक सकता है?

ऐसे में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के मुखिया के रूप में अखिलेश को समय रहते तय करना होगा कि वे कुछ हजार रुपयों की सौगात (कहना चाहिए रिश्वत) के बदले में सत्तापक्ष को वोट दे आने की लत लगा बैठे मतदाताओं को लोकतांत्रिक संस्कार देने का जोखिम उठाएंगे या खुद सत्ता में आने पर उससे ज्यादा बड़ी रकम उनके खातों में डालने का वादा करेंगे?
यह जानते हुए कि अब मतदाता ऐसे वादों पर ज्यादा नहीं पसीजते, जबकि ‘न नौ नकद न तेरह उधार’ में यकीन करते हुए अपने खाते में नकदी डालने वाले सत्ताधीशों की बल्ले-बल्ले कर देते हैं. भले ही उनके कारण देश की आजादी आंशिक हो गई हो, लोकतंत्र लंगड़ा, प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में देश बहुत नीचे चला गया हो, प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों तक के हेट स्पीच पर उतरने और घृणा व अविश्वास फैलाने में लग जाने व रीढ़हीन हो जाने से दुनिया में उसकी प्रतिष्ठा सलामत न रह गई हो.

विडंबना यह कि ये मतदाता कई बार इस कदर ‘उपकृत’ महसूस करने लगते हैं कि उसके खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं होते. तब दूसरे समुदाय का खलनायकीकरण और जनादेश का अपहरण तक उनके बीच कोई आलोड़न पैदा नहीं करते. करते तो इस कदर परंपरा में तो नहीं ही बदल पाते. सवाल है कि क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ उन दलों पर डालकर छुट्टी की जा सकती है, जो इन हालात में चुनाव मैदान में खेत रह जाते हैं?

ममता बनाम निर्ममता

बहरहाल, जैसे पश्चिम बंगाल व उत्तर प्रदेश की परिस्थितियों में, वैसे ही सपा व तृणमूल कांग्रेस में भी एक बड़ा फर्क है: सपा के विपरीत तृणमूल कांग्रेस अरसे तक भाजपा की शुभचिंतक व सहयोगी रही है. अटल बिहारी वाजपेयी की तो वह सरकार में भी शामिल थी. यह तो बदली हुई परिस्थितियों में भाजपा विरोधी दलों की असहायता है कि पंद्रह साल की एंटी-इंकम्बैंसी के बावजूद वे उससे लौ लगाए हुए थे कि वह अपने राज्य में भाजपा को रोक देगी. लेकिन चुनाव सिर्फ सदाशयता थोड़े ही जीते जाते हैं.

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में प्रचार के दौरान गलत नहीं कहा था कि ममता ने ही ध्रुवीकरण की राजनीति के रास्ते पश्चिम बंगाल में भाजपा का प्रवेश कराया और उसके लिए जवाबी ध्रुवीकरण को आसान बनाया. (वामपंथी दल तो यहां तक कह चुके हैं कि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में कोई फर्क नहीं है.)

भले ही कुछ हल्कों में राहुल के कथन को उनका बूमरैंग तक बताया और आरोप लगाया गया कि ऐसा कहते हुए न उन्होंने देश-काल देखा और न ही अपनी पार्टी की पराजय कथा. लेकिन अच्छी बात है कि अब वे किसी भी तरह की खुन्नस से परे ममता के इस कथन का सच देख पा रहे हैं कि उनको वोट व चुनाव चोरी करके हराया गया है.

याद कीजिए, एक दौर में कहा जाता था कि चुनावी मुकाबलों में भाजपा आम तौर पर सिर्फ कांग्रेस को हरा पाती है, तीसरी शक्तियों पर उसका वश नहीं चलता. लेकिन ममता की ग़लती यह है कि वे तब भी नहीं चेतीं, जब भाजपा ने तीसरी शक्तियों को हराना भी सीख लिया. तब भी नहीं, जब प्रेक्षक ममता के ध्रुवीकरण के बरक्स भाजपा के जवाबी ध्रुवीकरण को लेकर चेताने लगे. चेतीं तो भी भाजपा को दिल्ली तक से उखाड़ देने की डींगें तो हांकती रहीं, लेकिन अपने राज्य में विपक्षी एकता की राह का रोड़ा ही बनी रहीं.

ऐसे में अब वे भाजपा की सहज शिकार बन गई हैं तो उनके लिए देखना दिलचस्प होगा कि उन्हें कितनी सीटें भाजपा विरोधी मतों के बंटवारे के कारण गंवानी पड़ीं. वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ रिश्तों में थोड़ा समन्वय बरतकर वे इससे बच सकती थीं. लेकिन उनकी अहमन्यता ने उनको ऐसा नहीं करने दिया और अब कहा जा रहा है कि उनके लिए अपने संसद सदस्यों तक को संभाले रखना कठिन होगा, क्योंकि उसमें कई ‘राघव चड्ढा’ हो सकते हैं.

बेहतर होगा कि अखिलेश इससे सबक लेकर आगे की रणनीति बनाएं. खासकर, जब वे देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह तो कह रहे हैं कि अब गंगोत्री से गंगासागर तक कमल खिल गया है, लेकिन इसकी शर्म नहीं महसूस कर रहे कि उसे खिलाने के लिए उन्हें ढेर सारे बदबूदार कीचड़ से आपादमस्तक स्नान करना पड़ा है. उनकी पार्टी इसे साफ-साफ अपने हिंदुत्व की जीत बता रही है.
जोखिम उठाने होंगे

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ इस बात को किस तरह बताएंगे और फैलाएंगे, इसे समझना कठिन नहीं है. इसे भी नहीं कि भाजपा के पास दिन को रात, रात को दिन, सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने में सक्षम मशीनरी है.

ऐसे में उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करेंगे कि उसके प्रति अखिलेश कौन-सा रुख अपनाते हैं. कभी उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्षता की चैंपियन हुआ करती थी, लेकिन अब वे अयोध्या के नवनिर्मित राम मंदिर में जाने को लेकर पूछे जाने वाले सवालों के भी बहुत गोलमोल उत्तर देते हैं और किसी तरह के नुकसान से बचने के लिए धर्मनिरपेक्षता शब्द अपने मुंह तक पर नहीं लाते.

शायद जानबूझकर समझना नहीं चाहते कि भाजपा के हार्ड हिंदुत्व को सॉफ्ट हिंदुत्व से हराने की कोशिशों के खाते में सफलता की अब तक एक भी नज़ीर नहीं है, जबकि भाजपा अब उसे सीधे-सीधे ‘हिंदूवाद’ में बदल और ‘व्यापक स्वीकृति’ दिला चुकी है. ऐसे में सॉफ्ट हिंदुत्व के बूते उसे हराने की सोचने में जोखिम ही जोखिम हैं.

ये जोखिम इस बात से और बढ़ जाते हैं कि कभी दृढ़तापूर्वक धर्मनिरपेक्षता को पवित्र संवैधानिक मूल्य बताने वाले भाजपा के प्रतिद्वंद्वी उस पर जोर देने से नुकसान की आशंका से डरकर आत्मविश्वास खो देते और उसकी जमीन पर जाकर इस मूल्य से उसके जैसा ही लुकाछिपी का खेल खेलने लग जाते हैं. उत्तर प्रदेश के मुकाबले में बहुत कुछ इस पर भी निर्भर करने वाला है कि अखिलेश इससे बच पाते हैं या नहीं.

हां, अब एक और असुविधाजनक सवाल लगातार उनका पीछा करता रहने वाला है कि अगर वे अभी भी स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के पक्ष में व्यापक जनगोलबंदी की नहीं सोच रहे, तो उनके चुनाव लड़ने का मतलब क्या है? खासकर जब लोगों में यह धारणा घर करती जा रही है कि जीत तो आखिरकार भाजपा ही जाएगी!

साफ कहें तो ममता का हश्र अखिलेश के लिए सबक हो सकता है. बशर्ते वे उसे लेना चाहें. इनकी सुविधा है कि वे ममता की तरह सत्ता में नहीं हैं और उनको अपनी पीठ पर एंटी-इंकम्बैंसी का बोझ लिए नहीं फिरना.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)