अच्छे राजनेता और अच्छे पत्रकार के बीच संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, तनावपूर्ण सम्मान का होता है. पत्रकार पूछता है; क्योंकि वह नागरिक की ओर से खड़ा है. राजनेता जवाब देता है; क्योंकि वह राज्य की ओर से ज़िम्मेदार है. दोनों के बीच यह निरंतर रस्साकशी ही लोकतंत्र के ताक़त देती है. जिस लोकतंत्र में पत्रकार केवल जयकार करे और नेता केवल भाषण दे, वहां जनता धीरे-धीरे दर्शक बन जाती है और संसद राजशाही की दर्शक दीर्घा.

अच्छा राजनेता किसी सवाल से असहज नहीं होता. वह जानता है कि लोकतंत्र में सवाल अपमान नहीं, अवसर है. सवाल बाउंसर हो सकता है, यॉर्कर हो सकता है, तेज़ इनस्विंगर हो सकता है; लेकिन कुशल बल्लेबाज उसे अपने हेलमेट पर नहीं लगने देता; वह उसके नीचे झुकता है, उसे छोड़ता है या कभी-कभी उसी गेंद को मिड विकेट के ऊपर से सिक्सर में बदल देता है. राजनीति में भी यही गुण किसी नेता को राजनेता से कूटनीतिज्ञ बनाता है.
जो नेता कठिन सवाल से बचता है, वह सत्ता में हो सकता है; पर जो कठिन सवाल को जवाब की कला, हास्य, विवेक और लोकतांत्रिक आत्मविश्वास में बदल देता है, वही राजनेता कहलाने का अधिकारी होता है. राजनेता को टेलीप्रॉम्प्टर नहीं, विकेट-बुभुक्षु गेंदबाज़ के सामने खड़े सिद्ध बल्लेबाज़ जैसी प्रत्युत्पन्नमति चाहिए; जो सवालिया गेंद की रफ़्तार से नहीं डरता, उसकी सीम उधेड़ देने वाला सिक्सर निकालने में माहिर होता है.
हेले ल्यूंग ने नॉर्वे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा कि वे दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते. इस प्रश्न पर भारत में जो हंगामा हुआ, उससे अधिक रोचक यह है कि एक सचमुच कुशल नेता ऐसे प्रश्न को कैसे संभालता. कुशल नेता मुस्कराकर कह सकता था, ‘आप पूछिए, भारत भी उतना ही आत्मविश्वासी लोकतंत्र है जितना नॉर्वे.’
या वह कह सकता था, ‘प्रेस की स्वतंत्रता पर हमारे अपने तर्क हैं; लेकिन सवाल पूछना आपका अधिकार है, उत्तर देना या न देना मेरा सर्वाधिकार.’
एक मुस्कुराहट के साथ इतना भर जवाब पूरे विवाद को बदल देता. वही प्रश्न, जो आलोचना बनकर उठा था, जवाब पाकर राजनयिक गरिमा में बदल सकता था. एक बार ख़ुद मोदी ने एक प्रश्न पर ऐसी कोशिश की भी थी. पर जब प्रश्न का जवाब देने के बजाय प्रश्नकर्ता को निशाना बनाया जाता है, तब नेतृत्व नहीं, असुरक्षा दिखाई देती है.
सवाल सुनने का संयम
इतिहास बताता है कि बड़े नेता सवालों से भागते नहीं, उन्हें भाषा का उत्सव बना देते हैं.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पाकिस्तान वाला प्रसिद्ध प्रसंग इसी कारण याद किया जाता है. राजनाथ सिंह ने भी बाद के वर्षों में वह किस्सा दोहराया कि एक बार पाकिस्तान यात्रा के दौरान एक महिला ने वाजपेयी से मज़ाक में कहा कि वह उनसे शादी करना चाहती है, पर मुंह दिखाई में कश्मीर चाहिए. वाजपेयी ने उसी क्षण जवाब दिया, ‘मैं शादी को तैयार हूं, पर दहेज में पूरा पाकिस्तान चाहिए.‘
इस किस्से की लोकप्रियता इसलिए नहीं है कि उसमें केवल हास्य था; इसलिए है कि उसमें हास्य के भीतर राष्ट्रीय रुख, कूटनीतिक संयम और लाजवाब होने की रश्क पैदा करती बिजली एक साथ थी. कठिन प्रश्न आया; लेकिन नेता ने उसे टकराव नहीं बनने दिया; उसे स्मृति बना दिया.
यही कला जवाहरलाल नेहरू की प्रेस-वार्ताओं में भी दिखाई देती थी. नेहरू प्रश्नों से घिरे रहते थे. वे कभी-कभी चिढ़ते भी थे; लेकिन भागते नहीं थे.
1958 की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब उनसे शिखर सम्मेलन पर आशावाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने हल्के विनोद में कहा कि ‘शिखर तो बादलों में गायब हो गया है; अभी मानसून का मौसम है.’ यह उत्तर केवल मज़ाक नहीं था; यह राजनयिक अनिश्चितता को ऐसे कहने की कला थी, जिसमें उत्तर भी है और मुस्कान भी. नेहरू की राजनीति से असहमति हो सकती है; लेकिन प्रेस से संवाद करने की उनकी सहजता लोकतंत्र की एक बुनियादी संस्कृति थी.
वाजपेयी ने 2001 में अंतरराष्ट्रीय प्रेस संस्थान कांग्रेस में कहा था कि प्रेस या तो स्वतंत्र होती है या उसे प्रेस कहा ही नहीं जा सकता. यह वाक्य भारतीय लोकतंत्र की गहरी समझ से निकला था.
कोई भी शासन प्रेस से प्रेम नहीं करता; पर लोकतंत्र वही है, जो प्रेस की असुविधा को सहता है. प्रेस को केवल तब तक स्वतंत्र मानना, जब तक वह सत्ता की प्रशंसा करे, वैसा ही है जैसे केवल धूप में छाता खोलना और बारिश आते ही उसे बंद करके घर भूल जाना.
दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रमोद महाजन का 11 अप्रैल 1997 का लोकसभा भाषण इसी परंपरा का संसदीय उदाहरण है. उन्होंने चीन गए भारतीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल का किस्सा सुनाते हुए कहा कि उन्होंने चीनी सांसदों से परिचय कराया, ‘मैं प्रमोद महाजन हूं, लोकसभा का सदस्य हूं, मेरी पार्टी सदन की सबसे बड़ी पार्टी है और मैं विपक्ष में हूं.’ चीनी प्रतिनिधि चकित रह गए. महाजन ने आगे बताया कि दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बाहर से सरकार का समर्थन कर रही है और एक-दो सांसदों वाली पार्टियां सत्ता में हैं. यह भाषण केवल गठबंधन राजनीति पर व्यंग्य नहीं था; यह भारतीय लोकतंत्र की विचित्रता को रोचक, बौद्धिक और हास्यपूर्ण भाषा में समझाने की कला थी. लोकतंत्र की उलझन को क्रोध से नहीं, विनोद से खोलना भी नेतृत्व है.
दुनिया की राजनीति में रोनाल्ड रीगन का 1984 का उदाहरण भी इसी श्रेणी में आता है. उम्र को लेकर उन पर सवाल था कि क्या वे बहुत बूढ़े हो चुके हैं. रीगन ने जवाब दिया, ‘मैं उम्र को इस अभियान का मुद्दा नहीं बनाऊंगा. मैं राजनीतिक लाभ के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी की युवावस्था और अनुभवहीनता का इस्तेमाल नहीं करूंगा.’ पूरा हॉल हंस पड़ा, प्रतिद्वंद्वी और तो और, ख़ुद वॉल्टर मोंडेल भी. एक कमज़ोर बिंदु था उम्र. रीगन ने उसे लासानी जवाब में बदल दिया और रसदार जवाब को राजनीतिक ताक़त में. यही है मुश्किल गेंद को सिक्सर में बदलना.
नरेंद्र मोदी ने भी 2023 में अमेरिका में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अल्पसंख्यक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि भारत और अमेरिका दोनों के डीएनए में लोकतंत्र है और भारत में जाति, पंथ या धर्म के आधार पर भेदभाव का कोई स्थान नहीं है. इस उत्तर से सहमति-असहमति अलग प्रश्न है; लेकिन वह उदाहरण यह दिखाता है कि कठिन प्रश्न का उत्तर दिया जा सकता है. सवाल को ‘साज़िश’ कहकर छोड़ा नहीं गया; उसे लोकतंत्र, संविधान और विकास की भाषा में मोड़ने की कोशिश की गई.
यही राजनीतिक कौशल है. सवाल हटाना नहीं, सवाल को अपने फ्रेम में उत्तरित करना. बल्कि इसका एक मतलब ये भी है कि ट्रोलरों के कारण भारतीय प्रधानमंत्री को जितना शर्मसार होना पड़ा, उतना विरोधियों के कारण नहीं; क्योंकि उनके पतित हस्तपेक्ष ने इसे चर्चा में ला दिया.
सवाल अपमान नहीं
महान नेता प्रश्न को निजी अपमान नहीं मानता. वह समझता है कि पत्रकार सत्ता का शत्रु नहीं, जम्हूरियत के ज़ुगराफ़िए का ज़रूरी मील-पत्थर है. पत्रकार का सवाल कभी असुविधाजनक होगा, कभी असभ्य भी लगेगा, कभी उसमें पूर्वाग्रह भी होगा. लेकिन नेता का स्तर सवाल के स्तर से नहीं, उत्तर के स्तर से तय होता है.
छोटे नेता सवाल में षड्यंत्र खोजते हैं; बड़े नेता सवाल में मंच खोजते हैं. छोटे नेता पूछने वाले की जाति, धर्म, देश, लिंग, कपड़े, फॉलोअर और अतीत में उतर जाते हैं; बड़े नेता प्रश्न के केंद्र में जाते हैं और वहीं से अपनी राजनीति की रोशनी निकालते हैं.
यहीं आज की भारतीय पत्रकारिता और राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी है.
सवाल पूछने वाले पर हमला कर देना आसान है. उसे विदेशी कह देना आसान है. उसे एजेंट, पेड, प्लांटेड, एंटी-नेशनल, लिबरल, वामपंथी, पाकिस्तानी, या कुछ भी घोषित कर देना आसान है. कठिन काम है, लाजवाब कर देने वाला उत्तर देना. और उससे भी कठिन काम है उत्तर देते हुए लोकतंत्र की गरिमा को बचाए रखना.
ऊपर के कुछ किस्सों का यही मूल सूत्र है कि भारतीय और विश्व राजनीति के कई यादगार क्षण इसीलिए बचे हुए हैं; क्योंकि नेताओं ने मुश्किल सवालों को अपनी भाषा, विनोद और बौद्धिकता की अद्वितीय ख़ूबियों से पलट दिया.
बोलने की ही कला है राजनीति
राजनीति मूलतः जवाबदेही ही नहीं, हाज़िरजवाबी की भी कला है. जो सत्ता में है, उसे सवालों की धूप में खड़ा होना ही पड़ेगा. वह चाहे प्रधानमंत्री हो, मुख्यमंत्री हो, कुलपति हो या कोई बड़ा संपादक. सवाल से बचकर कोई लोकतांत्रिक वैभव नहीं बनता. सिंहासन की ऊंचाई से नहीं, उत्तर की ऊंचाई से नेता बड़ा होता है.
अगर पत्रकार पूछे, ‘आप प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?’ तो यह राजनेता के लिए संकट नहीं, अवसर है. वह कह सकता है; ‘क्योंकि मैं देने में विश्वास करता हूं और आप कहें तो आज से लेना शुरू कर देता हूं.’ यह एक वाक्य पूरी कथा बदल सकता है. आख़िर दो देशों के रिश्तों की बुनियाद इसी पर तो टिकी है.
दरअसल सवाल का डर सत्ता का नहीं, उसके आसपास पल रहे चाटुकारों का अधिक होता है. नेता कई बार प्रश्न झेल सकता है; लेकिन दरबारी नहीं झेल पाते. उन्हें लगता है कि एक प्रश्न से साम्राज्य कांप जाएगा. वे तुरंत प्रश्नकर्ता पर टूट पड़ते हैं. वे उसकी तस्वीरें खोजते हैं, उसकी निजी जिंदगी खंगालते हैं, उसके पुराने ट्वीट गिनते हैं, उसके फॉलोअर नापते हैं. यह सब देखकर लगता है कि सवाल नेता से नहीं, दरबार से पूछा गया था. और दरबार जानता है कि उसका अस्तित्व प्रश्नों पर नहीं, मौन पर टिका है.
अच्छे राजनेता और अच्छे पत्रकार के बीच संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, तनावपूर्ण सम्मान का होता है. पत्रकार पूछता है; क्योंकि वह नागरिक की ओर से खड़ा है. राजनेता जवाब देता है; क्योंकि वह राज्य की ओर से जिम्मेदार है. दोनों के बीच यह निरंतर रस्साकशी ही लोकतंत्र की मांसपेशियों को ताक़त देने वाले प्रोटीन को ख़ास तरह के रसायन में बदलती है.
जिस लोकतंत्र में पत्रकार केवल जयकार करे और नेता केवल भाषण दे, वहां जनता धीरे-धीरे दर्शक बन जाती है और संसद राजशाही की दर्शक दीर्घा बनकर रह जाती है; लेकिन जहा पत्रकार सवाल पूछता है और नेता उत्तर देता है, वहा नागरिक उपस्थित रहता है और लोकतंत्र की नई कोंपले उसे और भी छायादार बनाती हैं.
इसलिए हेले का सवाल जितना नॉर्वे का प्रसंग है, उतना ही भारत की परीक्षा भी है. यह परीक्षा प्रधानमंत्री से अधिक उन लोगों की है जो प्रधानमंत्री के नाम पर प्रश्न से लड़ने निकल पड़ते हैं. क्या हमें ऐसा भारत चाहिए, जहां विदेशी पत्रकार का सवाल सुनते ही हम उसकी निजी तस्वीरें ढूंढ़ने लगें? या ऐसा भारत जहां प्रधानमंत्री मुस्कराकर जवाब दे और दुनिया कहे; देखिए, यह आत्मविश्वासी लोकतंत्र है?
किसी भी बड़े राजनेता के लिए कठिन सवाल अपमान नहीं, बल्लेबाजी का मौका होता है. वाजपेयी ने उसे हास्य में बदला, नेहरू ने उसे संवाद में बदला, प्रमोद महाजन ने उसे संसदीय विनोद में बदला, रीगन ने उसे आत्म-व्यंग्य में बदला. यही राजनीति की श्रेष्ठ परंपरा है.
सवाल से भागना सत्ता की सुविधा हो सकती है; सवाल को छक्का बनाना नेतृत्व की कला है. आख़िर मंटगुमरी जेल में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने ऐसे तो नहीं लिखा था: ‘जिस धज से कोई मक़तल में गया, वो शान सलामत रहती है.’
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)