प्रधानमंत्री के ‘ग्लोबल आम’ के दावे और जापान की न: दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक भारत, पर निर्यात 1% से भी कम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में भारतीय आमों की वैश्विक पहचान का ज़िक्र किया, लेकिन इससे ठीक पहले जापान ने गुणवत्ता संबंधी ख़ामियों का हवाला देकर भारतीय आमों की खेप स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. यह विवाद भारत के विशाल आम उत्पादन और सीमित निर्यात क्षमता के बीच के अंतर को भी उजागर करता है.

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मई को प्रसारित मन की बात के 134वें एपिसोड में भारतीय आमों की विविधता, स्वाद और वैश्विक पहचान की चर्चा की. उन्होंने महाराष्ट्र के हापुस (अल्फांसो), गुजरात के केसर, उत्तर प्रदेश के दशहरी और लंगड़ा, बिहार के जर्दालू, दक्षिण भारत के बंगनपल्ली और तोतापुरी जैसे आमों का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय आमों की यात्रा अब गांवों से निकलकर वैश्विक बाजारों तक पहुंच रही है.

विदेश मंत्रालय ने भी मन की बात के इस हिस्से को साझा करते हुए कहा कि भारतीय आम अपनी खुशबू, स्वाद, प्राकृतिक मिठास और विविधता के कारण दुनिया भर में पहचान बना रहे हैं और भारत की समृद्ध कृषि विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं.

लेकिन प्रधानमंत्री के इस उत्साहपूर्ण चित्र के समानांतर एक दूसरा घटनाक्रम भी सामने आया है, जो भारतीय आम निर्यात की वास्तविक चुनौतियों की याद दिलाता है.

बीते ही सप्ताह जापान ने 2026 सीजन के लिए भारत से ताजे आमों की खेप स्वीकार करने से इनकार कर दिया है. कारण है भारतीय निर्यात केंद्रों पर फ्यूमिगेशन और डिसइन्फेक्शन (कीट नियंत्रण और संक्रमण-मुक्ति) प्रक्रियाओं में पाई गई खामियां.
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लगभग दो दशकों बाद पहली बार जापान ने भारतीय आमों पर इस तरह का प्रतिबंध लगाया है.

दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, लेकिन निर्यात बेहद कम

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आम पैदा करता है. वाणिज्य मंत्रालय के तहत आने वाले डायरेक्टरेट जनरल ऑफ कमर्शियल इंटेलिजेंस एंड स्टैटिस्टिक्स (DGCIS) के हवाले प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत ने लगभग 2.62 करोड़ टन (26.2 मिलियन टन) आम का उत्पादन किया.

लेकिन इसी अवधि में देश ने केवल 29,938 टन ताजा आम निर्यात किए, जिनका कुल मूल्य लगभग 5.65 करोड़ डॉलर (56.5 मिलियन डॉलर) था.

दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक होने के बावजूद भारत अपने कुल आम उत्पादन का एक प्रतिशत भी निर्यात नहीं कर पाता. उत्पादन और निर्यात के बीच यह विशाल अंतर लंबे समय से नीति निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय रहा है.

कौन-से राज्य सबसे ज्यादा आम पैदा करते हैं?

उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है. 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार देश के कुल आम उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 26.7 प्रतिशत है.

इसके बाद आंध्र प्रदेश (21.5 प्रतिशत) दूसरे स्थान पर है.

अन्य प्रमुख उत्पादक राज्यों में कर्नाटक और बिहार (6.8-6.8 प्रतिशत), गुजरात (5.5 प्रतिशत), पश्चिम बंगाल (4.7 प्रतिशत), तेलंगाना (4.6 प्रतिशत), तमिलनाडु (4.4 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (4.1 प्रतिशत) और ओडिशा (4 प्रतिशत) शामिल हैं.

जापान ने भारतीय आमों को क्यों रोका?

जापान का फैसला किसी व्यापारिक विवाद का नतीजा नहीं है, बल्कि गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़ा मामला है.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जापानी क्वारंटीन अधिकारियों ने मार्च 2026 में उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित एक वापर हीट ट्रीटमेंट (वीएचटी) केंद्र का निरीक्षण किया था. निरीक्षण के दौरान कीट नियंत्रण और संक्रमण-मुक्ति प्रक्रियाओं में कमियां पाई गईं.

वीएचटी वह प्रक्रिया है जिसमें आमों को नियंत्रित गर्म और आर्द्र वातावरण में रखा जाता है ताकि फ्रूट फ्लाई जैसे कीटों को समाप्त किया जा सके. जापान इस प्रक्रिया को लेकर बेहद सख्त मानक अपनाता है.

निरीक्षण के बाद जापान के योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने सूचित किया कि 25 मार्च 2026 के बाद प्रमाणित भारतीय आमों की खेप स्वीकार नहीं की जाएगी.

इसका असर अल्फांसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी प्रमुख किस्मों पर पड़ा है.

यह पहली बार नहीं है

जापान पहले भी भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा चुका है.

1986 में फ्रूट फ्लाई संक्रमण की आशंका के चलते जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी थी. यह प्रतिबंध लगभग 20 वर्षों तक चला.

लंबी बातचीत, क्वारंटीन व्यवस्था में सुधार, वापर हीट ट्रीटमेंट सुविधाओं की स्थापना और निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के बाद भारत को 2006 में दोबारा जापानी बाजार में प्रवेश मिला था.

उस समय केवल छह भारतीय किस्मों, अल्फांसो, केसर, बंगनपल्ली, लंगड़ा, चौसा और मालिका, को जापान में निर्यात की अनुमति मिली थी.

कितना महत्वपूर्ण है जापानी बाजार?

मात्रा के लिहाज से जापान भारत के सबसे बड़े खरीदारों में नहीं है. भारत के प्रमुख आम निर्यात गंतव्यों में संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, ब्रिटेन, कुवैत और कतर शामिल हैं. लेकिन जापान को एक प्रीमियम बाजार माना जाता है. यहां गुणवत्ता मानक बेहद कठोर हैं और अच्छे दाम मिलते हैं.

2025-26 में जापान को भारत के ताजे और प्रसंस्कृत आम उत्पादों का निर्यात लगभग 15.4 लाख डॉलर का था. इसमें गुजरात के केसर आम की हिस्सेदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही.

इसलिए जापान का यह कदम केवल एक बाजार के अस्थायी बंद होने का मामला नहीं है, बल्कि भारतीय कृषि निर्यात प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है.

वैश्विक पहचान और जमीनी चुनौतियां
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में सही कहा कि भारतीय आम दुनिया भर में पहचान बना रहे हैं. भारत के पास लगभग एक हजार किस्मों का विशाल भंडार है और आम देश की कृषि, संस्कृति और खाद्य विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

लेकिन जापान की ताजा कार्रवाई यह भी दिखाती है कि वैश्विक बाजार में केवल उत्पादन या स्वाद पर्याप्त नहीं होता. वहां गुणवत्ता नियंत्रण, ट्रेसबिलिटी, कीट प्रबंधन, निर्यात संरचना और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन उतना ही महत्वपूर्ण है.

विडंबना यह है कि जिस समय सरकार भारतीय आमों की वैश्विक सफलता का जश्न मना रही है, उसी समय दुनिया के सबसे सख्त और प्रतिष्ठित बाजारों में से एक भारत को यह संदेश दे रहा है कि वैश्विक पहचान बनाए रखने के लिए केवल ब्रांडिंग नहीं, बल्कि संस्थागत गुणवत्ता और भरोसे की भी जरूरत होती है.

भारतीय आम आज भी दुनिया के सबसे लोकप्रिय फलों में हैं. सवाल यह है कि क्या भारत अपनी उत्पादन क्षमता को निर्यात क्षमता में बदल पाएगा, या फिर दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक होने के बावजूद वैश्विक बाजार में उसकी हिस्सेदारी सीमित ही बनी रहेगी.