डेढ़ महीने बाद भी नहीं हो पाया टीम खंडेलवाल का गठन

मप्र भाजपा में नई प्रदेश कार्यसमिति के गठन को लेकर चल रही कवायद डेढ़ महीने बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत खंडेलवाल ने घोषणा की थी कि भाजपा की पहली प्रदेश कार्यसमिति बैठक ओरछा में आयोजित की जाएगी, लेकिन कार्यसमिति का गठन ही अब तक नहीं हो पाया है। पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं के अनुसार वरिष्ठ नेताओं के बीच समर्थकों को जगह दिलाने की प्रतिस्पर्धा और नामों पर असहमति इसकी सबसे बड़ी वजह बन गई है। प्रदेश नेतृत्व द्वारा तैयार की गई सूची कई बार दिल्ली भेजी जा चुकी है, लेकिन अब तक उस पर अंतिम मुहर नहीं लग पाई है। इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी में आखिर कार्यसमिति गठन इतना जटिल क्यों हो गया है।
सूत्रों के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव कई दौर की बैठकों में प्रस्तावित नामों पर चर्चा कर चुके हैं। दोनों नेता सूची को अंतिम रूप देकर केंद्रीय नेतृत्व के पास भी भेज चुके हैं। बताया जाता है कि सूची को लेकर दिल्ली में भी कई दौर की चर्चा हुई, लेकिन वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग आग्रहों के कारण सहमति नहीं बन सकी। परिणामस्वरूप प्रदेश कार्यसमिति का गठन लगातार टलता जा रहा है। कार्यसमिति के गठन में हो रही देरी को लेकर कार्यकर्ताओं के मन में तरह-तरह के साल उठ रहे हैं कि आखिर प्रदेश कार्यसमिति की सूची पर सहमति क्यों नहीं बन पा रही? क्या समर्थकों को जगह दिलाने की राजनीति गठन में सबसे बड़ी बाधा है? क्या नए राष्ट्रीय संगठन और नए प्रदेश संगठन महामंत्री की नियुक्ति के बाद रास्ता साफ होगा? ओरछा में प्रस्तावित पहली कार्यसमिति बैठक कब होगी? क्या छोटी कार्यसमिति बनाने का प्रयोग भाजपा के भीतर असंतोष बढ़ा रहा है?
समर्थकों को जगह दिलाने की होड़
जानकारों का कहना है कि मप्र भाजपा में कार्यसमिति गठन अब केवल एक संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन और भविष्य के राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा बन गया है। भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि प्रदेश के कई बड़े नेता कार्यसमिति में अपने समर्थकों को स्थान दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कई प्रभावशाली नेताओं की ओर से नाम सुझाए गए हैं। समस्या यह है कि एक नेता जिन नामों का समर्थन कर रहे हैं, दूसरे खेमे की ओर से उन पर आपत्ति जताई जा रही है। ऐसे में संतुलन बनाना प्रदेश नेतृत्व के लिए चुनौती बन गया है। सूत्र बताते हैं कि क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल और राष्ट्रीय संगठन सहमहामंत्री शिवप्रकाश ने भी विभिन्न नेताओं के बीच सहमति बनाने की कोशिश की। उद्देश्य था कि सभी प्रमुख गुटों को प्रतिनिधित्व मिले और सूची पर अंतिम सहमति बन जाए। लेकिन अब तक यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं। यही कारण है कि कार्यसमिति गठन की घोषणा लगातार टल रही है।
राष्ट्रीय टीम के गठन का इंतजार
भाजपा के अंदर यह भी चर्चा है कि नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद प्रदेश कार्यसमिति पर फैसला आसान हो जाएगा। पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जून के अंतिम सप्ताह में अपनी नई टीम की घोषणा कर सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी माना जा रहा है कि राष्ट्रीय संगठन में मध्यप्रदेश के कुछ नेताओं को जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रदेश स्तर पर समीकरण बदलेंगे और कार्यसमिति गठन का रास्ता साफ होगा। भाजपा के जानकारों का मानना है कि प्रदेश संगठन महामंत्री का पद रिक्त होना भी देरी का एक बड़ा कारण है। आमतौर पर संगठन महामंत्री विभिन्न नेताओं के बीच समन्वय स्थापित कर विवादित मुद्दों का समाधान निकालते हैं। वे असंतुष्ट नेताओं को समझाकर संगठनात्मक संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फिलहाल यह जिम्मेदारी पूरी तरह प्रभावी तरीके से निभाने वाला कोई स्थायी चेहरा नहीं होने से निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
छोटी कार्यसमिति ने बढ़ाया विवाद
जानकारी के अनुसार इस बार भाजपा कार्यसमिति का आकार सीमित रखना चाहती है। प्रदेश के 62 संगठनात्मक जिलों से लगभग 130 नाम प्रस्तावित किए गए हैं। योजना है कि प्रत्येक जिले से सीमित प्रतिनिधित्व दिया जाए ताकि कार्यसमिति ज्यादा प्रभावी और कार्यक्षम बन सके। लेकिन यहीं सबसे बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पद कम हैं और दावेदार ज्यादा। कई वरिष्ठ नेताओं के समर्थकों के नाम सूची से बाहर हो रहे हैं, जिससे असंतोष बढ़ रहा है।
ओरछा की बैठक भी अधर में
प्रदेश अध्यक्ष द्वारा घोषित ओरछा बैठक को लेकर निवाड़ी जिला इकाई ने तैयारियां शुरू कर दी थीं। लेकिन कार्यसमिति का गठन न होने के कारण बैठक की तारीख तय नहीं हो सकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कार्यसमिति गठन में हो रही देरी भाजपा के लिए संगठनात्मक संकट नहीं, बल्कि बढ़ते नेतृत्व केंद्रों और प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन साधने की चुनौती का संकेत है।