प्रत्याशी नहीं, नेताओं की साख दांव पर

विंध्य भूमि/भोपाल/। मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव ने अंतिम दौर में प्रवेश कर लिया है। 30 जुलाई को होने वाले मतदान से पहले चुनाव प्रचार मंगलवार शाम थम जाएगा, लेकिन इस चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच नहीं है। यह उपचुनाव दोनों दलों के दिग्गज नेताओं की राजनीतिक पकड़, चुनावी रणनीति और संगठनात्मक क्षमता की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। नतीजे केवल विधायक का फैसला नहीं करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि किस दल के नेताओं की रणनीति कितनी सफल रही। दतिया उपचुनाव की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट रही। इसके बाद भाजपा को सबसे पहले अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं की नाराजगी दूर करने में मेहनत करनी पड़ी। डॉ. मिश्रा के समर्थकों को साधना और पार्टी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक, विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं को एकजुट रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
दतिया उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं है। यह भाजपा के लिए अपनी मजबूत संगठनात्मक पकड़ और कांग्रेस के लिए अपने परंपरागत सामाजिक समीकरण बचाने की चुनौती है। कुशवाहा, यादव, अनुसूचित जाति और सवर्ण वोटों का संतुलन, स्थानीय असंतोष और नेताओं की रणनीति—इन सभी का अंतिम फैसला अब 30 जुलाई को मतदाता करेंगे। इस चुनाव का परिणाम दोनों दलों के भीतर भविष्य की राजनीतिक भूमिका और नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी असर डाल सकता है। आज शाम पांच बजे चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा। इसके बाद बाहरी नेता दतिया छोड़ देंगे और चुनाव की कमान पूरी तरह स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के हाथ में होगी। अंतिम दो दिन घर-घर संपर्क, व्यक्तिगत संवाद और बूथ प्रबंधन जीत-हार में अहम भूमिका निभाएंगे।
कुशवाहा वोट बैंक पर सबसे ज्यादा नजर
करीब 2.20 लाख मतदाताओं वाली दतिया सीट पर सबसे बड़ा वोट बैंक कुशवाहा समाज का है, जिसकी संख्या लगभग 40 हजार है। यही कारण है कि भाजपा ने मंत्री नारायण सिंह कुशवाहा को चुनाव प्रचार की कमान सौंपी है, जबकि कांग्रेस ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा को समाज के मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने की जिम्मेदारी दी है।
यादव और एससी वोट बनेंगे निर्णायक
दतिया में यादव और अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग का मतदान हमेशा चुनाव परिणाम को प्रभावित करता रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इन वर्गों का अच्छा समर्थन मिला था। लेकिन इस बार आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव के मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दामोदर यादव यादव समाज के साथ-साथ अनुसूचित जाति के वोटों में भी सेंध लगा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है। इसी वजह से कांग्रेस ने भांडेर विधायक फूलसिंह बरैया को लगातार क्षेत्र में सक्रिय रखा है, जो एससी मतदाताओं के बीच जनसंपर्क कर रहे हैं।
नेताओं की भी होगी राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड की समीक्षा
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह उपचुनाव नेताओं की भी सीआर लिखेगा। जिस दल को हार मिलेगी, उसके चुनाव प्रभारियों और रणनीतिकार नेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। दोनों दलों ने ऐसे नेताओं को मैदान में उतारा है, जिन्हें चुनाव प्रबंधन और बूथ स्तर की रणनीति में माहिर माना जाता है।
भाजपा ने संघ और यूपी के नेताओं को भी उतारा
दतिया सीट कांग्रेस से छीनने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के झांसी और ललितपुर के वरिष्ठ नेताओं, विधायकों और मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार में लगाया है। भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की संघ पृष्ठभूमि होने से संघ का संगठनात्मक नेटवर्क भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
जीतू पटवारी के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत
चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में भाजपा ने कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा का आरोप है कि पटवारी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के खिलाफ ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे मुख्यमंत्री की छवि धूमिल हो रही है और मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। भाजपा ने इसे आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बताते हुए उनके प्रचार पर रोक लगाने की मांग की है