वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और लेखिका-प्रकाशक ऋतु मेनन की किताब ‘द कॉन्स्टिट्यूशन इज़ माई होम’ के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों पर हमेशा गौर किया जाना चाहिए और उन्हें व्यक्त करने की अनुमति मिलनी चाहिए. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गुरुवार (21 मई) को कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी, एक लोकतंत्र में बहुत ज़रूरी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह और लेखिका-प्रकाशक ऋतु मेनन की किताब ‘द कॉन्स्टिट्यूशन इज़ माई होम’ के विमोचन के अवसर पर बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों पर हमेशा गौर किया जाना चाहिए और उन्हें ज़ाहिर करने की अनुमति मिलनी चाहिए.
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, ‘जब मैं कहती हूं कि अलग-अलग विचारों और नजरिए पर हमेशा गौर किया जाना चाहिए और उन्हें व्यक्त करने की अनुमति मिलनी चाहिए, तो मेरा मतलब है कि अपनी बात रखने की आज़ादी- जो हमें अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली है- यह आजकल बहुत ज़्यादा ज़रूरी है. और एक लोकतंत्र में, जैसा कि हमारा देश है, ऐसा ही होना चाहिए.’
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह लगातार अलग-अलग विचारों और दृष्टिकोणों को सामने रखने में सबसे आगे रही हैं, खासकर भारत में महिलाओं की स्थिति और समाज के हाशिए पर पड़े तबकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर.
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, इंदिरा जयसिंह की किताब के शीर्षक को ‘बहुत कुछ बयां करने वाला’ बताते हुए जस्टिस नागरत्ना ने उनकी पुस्तक को ‘एक साथ एक संस्मरण, एक नारीवादी साक्ष्य, एक संवैधानिक चिंतन, और न्याय तथा अधिकारों को लागू करने के लिए लगातार संघर्ष करते हुए बिताए गए जीवन का एक दस्तावेज़ कहा.’
उन्होंने आगे कहा कि ज्यादातर वकील किसी मामले के दौरान कभी-कभार या नियमित रूप से संविधान का अध्ययन करते हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जयसिंह ने इसे अपना स्थायी निवास बना लिया है.
लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना ने न्यायपालिका में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हालांकि कानून का पेशा अत्यधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है, लेकिन इसमें सबसे स्थायी प्रगति उस वक्त हुई जब महिलाओं ने एकजुटता को चुना.
उन्होंने कहा, ‘कई पीढ़ियों से कानून के पेशे में पुरुषों को जान-पहचान, सिफारिश और पेशेवर प्रायोजन से लाभ मिलता रहा है. इसके विपरीत महिलाएं अधिकतर मामलों में ऐसे नेटवर्क के बिना इस पेशे में आई हैं. और यही कारण है कि इस पेशे में महिलाओं के बीच परस्पर संबंध बहुत महत्वपूर्ण है.’
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि कानूनी पेशे में पुरुषों के ‘एक्सक्लूसिव मेल क्लब’ (पुरूषों के नेटवर्क) से मुकाबला करने के लिए महिला वकीलों के बीच ‘सिस्टरहुड’ (आपसी एकजुटता और समर्थन) बेहद ज़रूरी है ताकि कानूनी क्षेत्र में महिलाओं की सफलता सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि तक ही सीमित न रह जाए.
इस अवसर पर सीनियर पत्रकार श्रीनिवासन जैन के साथ बातचीत के दौरान जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट के 18 मई के फैसले पर चर्चा की. इस फ़ैसले में जनवरी में दो जजों की एक दूसरी बेंच द्वारा एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के मामले में ज़मानत देने से इनकार करते समय अपनाए गए तर्क पर खुले तौर पर सवाल उठाए गए थे.
जयसिंह ने इस फ़ैसले को ‘असाधारण’ बताया और कहा कि यह ‘खुशी मनाने का एक मौका’ है.
उन्होंने कहा, ‘यह कानून के व्याकरण में ही है- जज जो कह रहे थे, वह यह है कि अगर राज्य आपको उचित समयसीमा के भीतर निष्पक्ष सुनवाई देने की स्थिति में नहीं है, तो उसे आपको हिरासत में रखने का कोई अधिकार नहीं है और उसे आपको रिहा कर देना चाहिए… सुप्रीम कोर्ट अपने ही फ़ैसलों को लेकर अनुशासित नहीं रहा है और वह तीन जजों की पीठ के फ़ैसले से बंधा हुआ है, इसीलिए आपको यह टिप्पणी देखने को मिली.’