बीते दो हफ़्तों से ज़्यादा समय से श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट मंदिर के फंड में गड़बड़ी और मंदिर परिसर से कीमती चढ़ावे की चोरी के आरोपों के चलते सुर्ख़ियों में है. इस संबंध में अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में 16 जून से 18 जून के बीच फंड के ग़लत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए तीन शिकायतें दर्ज की गई हैं. हालांकि, अब तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.

प्रयागराज: 1980 के दशक के आखिर में राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े पूर्व कारसेवक संतोष दुबे ने अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में कुछ दिनों पहले मंदिर के फंड में कथित गड़बड़ी को लेकर शिकायत दर्ज कराई है.
मालूम हो कि बीते दो हफ़्तों से ज़्यादा समय से श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट मंदिर के फंड में गड़बड़ी और मंदिर परिसर से कीमती चढ़ावे की चोरी के आरोपों के चलते सुर्खियों में है.
उल्लेखनीय है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि थाने में 16 जून से 18 जून के बीच फंड के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए तीन शिकायतें दर्ज की गई हैं.
एक शिकायत एक पूर्व कारसेवक ने की है जिसमें ट्रस्ट के अधिकारियों, जैसे महासचिव चंपत राय का नाम लिया गया है. वहीं, बाकी दो शिकायतों में राय की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं; कहा जा रहा है कि उन्होंने ट्रस्ट के फंड का इस्तेमाल ज़मीन के महंगे सौदों में किया था.
एक पूर्व अकाउंटेंट ने कुछ मीडिया संस्थानों को बताया है कि उनके कार्यकाल के दौरान मंदिर परिसर के आठ महीने का सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिया गया था.
दैनिक भास्कर की जांच से पता चला है कि मुंबई के एक व्यापारी की ओर से भेंट की गई 3 किलो चांदी की माला और 1 किलो चांदी की चरण पादुका के लिए कोई रसीद जारी नहीं की गई थी; अब विशेष जांच दल (एसआईटी) इस मामले की जांच कर रही है.
बता दें कि उक्त कारसेवक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के बुलावे पर ये लोग 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के पास एकत्र हुए और बाद में मस्जिद ढहा दी गई.
‘क्या इस देश में राम भी सुरक्षित नहीं हैं?’
अब मस्जिद गिराए जाने के लगभग 34 साल बाद और जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के दो साल बाद पूर्व कारसेवक संतोष दुबे का कहना है कि उन्हें चिंता है कि क्या भगवान राम इस देश में ‘सुरक्षित’ हैं.
राम मंदिर के लिए जमा किए गए फंड में कथित हेराफेरी में शामिल लोगों के बारे में बात करते हुए वे बिना किसी लाग-लपेट के उनकी तुलना बाबर और महमूद गज़नवी से भी करते हैं.
संतोष दुबे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा फंड के गलत इस्तेमाल के हालिया आरोपों के बारे में कहते हैं, ‘बाबर, गज़नवी और ग़ोरी ने मंदिरों को लूटा और चले गए. ये लोग मंदिर के खजाने को लूट रहे हैं. लोगों की आस्था और भरोसे को लूट रहे हैं. क्या इस देश में राम भी सुरक्षित नहीं हैं?’
हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों पर दुबे- जो हिंदुत्व विचारधारा के आजीवन अनुयायी रहे हैं- ने अपनी शिकायत में मंदिर के फंड के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है, उनमें चंपत राय भी शामिल हैं.
राय विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के एक वरिष्ठ पदाधिकारी हैं; विहिप आरएसएस की ही एक शाखा है.
संघ परिवार और राम जन्मभूमि आंदोलन से दुबे की नज़दीकी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह बाबरी विध्वंस मामले में पूर्व उप-प्रधानमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और 30 अन्य लोगों के साथ सह-आरोपी थे. इस मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने की थी. पर्याप्त सबूत न होने के कारण 2020 में इस मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था.
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट फंड मामले में शिकायतकर्ता दुबे ने कहा, ‘हां, मुझ पर आरोप लगे हैं, इसमें क्या गलत है? राम जन्मभूमि की मुक्ति का बस एक ही तरीका था कि बाबरी ढांचे को गिरा दिया जाए, इसलिए हमने वही किया. क्या गुनाह किया?’
हालांकि, दुबे को मस्जिद गिराए जाने का कोई पछतावा नहीं है, लेकिन उन्हें इस बात का दुख जरूर है कि राम मंदिर ‘चोरों के हाथों में’ है.
द वायर से बात करते हुए दुबे ने कहा, ‘मुझे बहुत बुरा लग रहा है, यह कोई मामूली पछतावा नहीं है; मन में यह द्वंद्व चल रहा है कि क्या अयोध्या हमेशा चोरों के हाथों में ही रहेगी.’
दुबे का गुस्सा और नाराज़गी उस कुप्रबंधन को लेकर थी, जिसका आरोप वे लगा रहे हैं. उनके अनुसार, 2003-04 के आसपास से अयोध्या में राम मंदिर के लिए दान में मिले नकद और अन्य कीमती सामान का गलत इस्तेमाल होता रहा है.
तीन पुलिस शिकायतें, कोई एफआईआर नहीं
उल्लेखनीय है कि दुबे उन शिकायतकर्ताओं में शामिल हैं, जिन्होंने औपचारिक रूप से यूपी पुलिस से संपर्क किया है. जिस दिन दुबे ने अपनी शिकायत दर्ज कराई (16 जून को), उसी दिन अयोध्या के भारतीय युवा कांग्रेस नेता शरद शुक्ला ने भी राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन में शिकायत की और मंदिर के फंड के गलत इस्तेमाल के मामले में एफआईआर दर्ज करने की मांग की.
18 जून तक राम जन्मभूमि थाने में शिकायत पत्र देने वालों की कुल संख्या तीन हो गई थी, जिनमें दुबे और शुक्ला के साथ आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी शामिल थे. सिंह द्वारा उसी दिन तीसरी शिकायत भेजी गई थी.
हालांकि, भाजपा शासित उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अभी तक इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है. इस बीच मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के कार्यालय द्वारा 13 जून को बनाई गई एसआईटी अपनी जांच जारी रखे हुए है.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि एसआईटी ने लगभग 150 संदिग्धों की पहचान की है और करीब 25 लोगों पर कार्रवाई हो सकती है.
इस संबंध में द वायर ने दो शिकायतकर्ताओं- दुबे और शुक्ला से बात करके ट्रस्ट के ख़िलाफ़ उनके आरोपों को समझने की कोशिश की. यह ट्रस्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्रीय कैबिनेट की मंज़ूरी के बाद फरवरी 2020 में बनाया गया था. यह घोषणा 2019 में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद की गई थी, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि अयोध्या में विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन के असली हक़दार भगवान रामलला हैं, और इस तरह हिंदू पक्षों के दावे को स्वीकार कर लिया था.
द वायर ने उन ज़मीन सौदों से जुड़े दस्तावेज़ों की भी जांच की जिनमें श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महामहासचिव चंपत राय शामिल थे- जो विहिप के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं. ट्रस्ट की ओर से खरीदी गई संपत्तियों की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर बताने के आरोपों के कारण अब ये सौदे जांच के दायरे में हैं.
‘इस गलत काम से पूरा हिंदू समाज आहत है’
अपनी एक पन्ने की शिकायत में ‘धर्म सेना भारत’ नाम का संगठन चलाने वाले दुबे ने ट्रस्ट से जुड़े चार लोगों के नाम लिए हैं, जिन पर मंदिर का पैसा हड़पने का आरोप है.
द वायर द्वारा देखी गई इस शिकायत की कॉपी में कहा गया है: ‘राम भक्तों से रोज़ाना दान के बक्सों में 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा का चढ़ावा मिलता है, जिसमें कैश, सोने-चांदी के सिक्के और गहने शामिल होते हैं. इसका प्रबंधन और देखभाल राम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य करते हैं. मुख्य रूप से ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बंसल, अनिल मिश्रा, गोपाल राव और चंपत राय के ड्राइवर रामाशंकर यादव उर्फ टिन्नू ने नियुक्त कर्मचारियों के साथ मिलकर एक साज़िश के तहत इस तरह के दान का एक बड़ा हिस्सा, यानी 200 करोड़ रुपये से ज़्यादा की रकम, हड़प ली है.’
दुबे की शिकायत में आगे कहा गया है, ‘धर्म के हित में यह ज़रूरी है कि कैश और गहनों के रूप में मिले इस दान को वापस पाने के लिए संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए और जांच के हिस्से के तौर पर उनका (आरोपियों का) पॉलीग्राफ टेस्ट कराया जाए. इस गलत काम से मैं समेत पूरा हिंदू समाज आहत हुआ है.’
ज्ञात हो कि इस ट्रस्ट के कामकाज को लेकर सबसे पहले सार्वजनिक रूप से तब उठाए गए, जब 7 जून 2026 को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ‘एक्स’ पर चढ़ावे की रकम के कथित तौर पर गायब होने के बारे में लिखा और साथ ही अदालतों से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया. इसके तुरंत बाद ट्रस्ट के खिलाफ आरोपों की झड़ी लग गई.
सबसे पहले दैनिक भास्कर ने रिपोर्ट किया था कि मंदिर के कर्मचारी लवकुश मिश्रा, जो गिनती करने वाली टीम के सदस्य थे, को तब गिरफ़्तार किया गया जब पुलिस ने कथित तौर पर उसके घर से उपलों में छिपाकर रखे गए 10 लाख रुपये बरामद किए.
यूट्यूब चैनल टॉप सीक्रेट को दिए एक इंटरव्यू में ट्रस्ट के पूर्व अकाउंट अधिकारी महिपाल सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को बताया कि ट्रस्ट को दान में मिले गहनों का कोई रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंदिर के स्टाफ ने एक बार आठ महीने का सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिया था.
दुबे ने कहा, ‘1989 में ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ अभियान के तहत अलग-अलग गांवों से राम शिलाएं (मंदिर निर्माण में इस्तेमाल होने वाली ईंटें) आई थीं और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी. ऐसी 1,250 राम शिलाएं थीं, जो सोने और चांदी से बनी थीं और उनमें हीरे जड़े हुए थे; ये 2002 के बाद गायब हो गईं.’
दुबे के मुताबिक, उन्होंने यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) प्रशांत कुमार को भी ‘एक शिकायत पत्र भेजा था, जो उस समय फैजाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) के पद पर तैनात थे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.’
उन्होंने आगे दावा किया कि गायब राम शिलाओं के बारे में ऐसी ही एक शिकायत 2002 और 2003 के बीच अयोध्या के कोतवाली पुलिस स्टेशन में महंत रामचंद्र दास परमहंस ने भी दर्ज कराई थी, जो अयोध्या मंदिर आंदोलन के नेता और विहिप के नेतृत्व वाले राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष थे, लेकिन उस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.
द वायर इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है.
दुबे ने आगे कहा, ‘अगर पुलिस मुझसे सबूत मांगती है, तो मैं ज़रूर दूंगा, लेकिन इससे देश के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे लोग फंस जाएंगे. उन्हें सरयू नदी में खड़ा होने दें; मैं हाथ में जल लेकर कहूंगा कि उन्होंने लूट की है. वे खुद जल हाथ में लेकर इससे इनकार कर सकते हैं.’
‘दो साल से ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई हैं’
दूसरे शिकायतकर्ता शरद शुक्ला हैं, जो भारतीय युवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष और अयोध्या के रहने वाले हैं. शुक्ला ने श्री राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन के एसएचओ को लिखे एक पत्र में छह मांगें रखीं.
शुक्ला ने 16 जून को पुलिस को दी अपनी शिकायत, जिसकी एक कॉपी द वायर ने देखी है, में कहा है, ‘यह सिर्फ़ कोई वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भक्तों की आस्था, भरोसे और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी बात है. मंदिर को चढ़ाया गया एक-एक पैसा किसी व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह भगवान राम के प्रति किसी की भक्ति का इज़हार है.’
शुक्ला की छह मांगों में राम मंदिर को दिए गए दान और चढ़ावे की गहन जांच; अगर जांच में कोई संज्ञेय अपराध पाया जाए तो तुरंत एफआईआर दर्ज करना; दान से जुड़े रिकॉर्ड, अकाउंटिंग रजिस्टर, बैंक स्टेटमेंट और सीसीटीवी फुटेज जैसे सबूतों को सुरक्षित रखना; बिना किसी अनुचित प्रभाव, दबाव या दखल के जांच करना; दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई करना; और आम जनता व श्रद्धालुओं का भरोसा बनाए रखने के लिए पूरी जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतना शामिल है.
द वायर से फोन पर बात करते हुए शुक्ला ने कहा, ‘काफ़ी समय से इस बारे में चर्चा चल रही थी, लेकिन मंदिर प्रशासन- जो एक सिंडिकेट की तरह काम करता है – इसे मैनेज कर रहा था. हम बिना सबूत के सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कह सकते थे, वरना वे (मंदिर प्रशासन) हमें पाकिस्तानी करार दे देते, क्योंकि हम कांग्रेस से जुड़े हैं.’
पिछले हफ़्ते अयोध्या में हुई दो प्रेस कॉन्फ्रेंस में ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ी ख़बरों और दस्तावेज़ों के आधार पर शुक्ला ने अब ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के ख़िलाफ़ ज़ोरदार अभियान शुरू कर दिया है. इससे पहले भी वह ट्रस्ट द्वारा ज़मीन अधिग्रहण के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जा चुके हैं.
शुक्ला ने कहा, ‘पिछले दो सालों से ट्रस्ट से जुड़ी ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई हैं. चूंकि ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार ने किया था, तो फिर केंद्र सरकार का कोई अकाउंटेंट या ऑडिटर क्यों नहीं है?’
मंदिर को हज़ारों करोड़ रुपये का दान मिला
उल्लेखनीय है कि ट्रस्ट से जुड़ी कुछ वित्तीय जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 21 जून 2022 तक राम मंदिर ट्रस्ट को निर्माण कार्य के लिए 3,400 करोड़ रुपये से ज़्यादा का दान मिला था. यह जानकारी विहिप की ओर से जारी ऑडिट रिपोर्ट में सामने आई थी.
फरवरी 2024 में आई पीटीआई की रिपोर्ट में कहा गया, राम मंदिर ट्रस्ट को प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के एक महीने बाद 25 करोड़ रुपये और 25 किलो सोना दान में मिला. इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और अमिताभ बच्चन, विकी कौशल, रणबीर कपूर और आलिया भट्ट जैसी हस्तियां शामिल हुई थीं.
सार्वजनिक रूप से मौजूद दूसरी वित्तीय जानकारियों के अलावा सितंबर 2025 में ट्रस्ट ने वित्त वर्ष 2024-25 में 327 करोड़ रुपये की सालाना आय दर्ज की, जिसमें 153 करोड़ रुपये का योगदान दान के ज़रिए आया था. हालांकि, नकद में मिले दान और गहनों या सोने-चांदी के सिक्कों के रूप में मिले चढ़ावे के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.
शुक्ला ने गुस्से भरे लहजे में कहा, ‘गोपाल राव कौन है? टिन्नू यादव का इतना दखल क्यों है? मंदिर परिसर में कौन अपनी गाड़ी कहां खड़ी करेगा, यह तय करने में उसका बहुत दबदबा हुआ करता था और वह वॉकी-टॉकी लेकर घूमता था.’
ट्रस्ट के पूर्व अकाउंटेंट महिपाल सिंह ने ‘दैनिक भास्कर’ को दिए इंटरव्यू में राव और टिन्नू (यानी रमाशंकर यादव) का नाम उन लोगों में शामिल बताया है, जिन पर कथित तौर पर फंड की हेराफेरी में शामिल होने का आरोप है.
‘अगर कोई भगवान के चढ़ावे की चोरी करता है, तो यह और भी बड़ा अपराध है’
दान की गिनती का तरीका यह था कि मंदिर परिसर में रखे दान-पात्रों से मिली रकम को अलग-अलग करने के लिए एक हॉल में ले जाया जाता था. फिर नोटों की कीमत (डिनॉमिनेशन) के हिसाब से कैश के बंडलों को छांटा जाता था.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मंदिर परिसर में करीब 35 दान-पात्र लगे हैं’ और रोज़ाना इकट्ठा होने वाली रकम ‘8 से 13 लाख रुपये के बीच होने का अनुमान है.’
मार्च 2020 में अयोध्या में भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नाम से एक आधिकारिक बैंक खाता खोला गया था.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘चढ़ावे में मिली रकम की गिनती के मामले में अब तक इकट्ठा हुई रकम को खाते में जमा करने से पहले ट्रस्टियों और एसबीआई अधिकारियों की मौजूदगी में गिना जाता है. पहले, रकम की गिनती ड्यूटी मजिस्ट्रेट, राजस्व अधिकारियों और ट्रेज़री के सहायक अकाउंट अधिकारी की मौजूदगी में की जाती थी.’
ट्रस्ट ने एसबीआई के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे. पीटीआई की एक रिपोर्ट में मंदिर के एक आधिकारिक ट्रस्टी के हवाले से कहा गया है कि ‘राम लला को उपहार में मिले सोने और चांदी के गहनों की कीमत का पता लगाने, उन्हें पिघलाने और उनके रखरखाव का काम भारत सरकार की टकसाल को सौंपा गया था.’
ऐसी चार टकसालें मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और नोएडा में हैं, जो रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को सिक्के सप्लाई करती हैं और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आती हैं.
शुक्ला ने आगे बताया, ‘बैंक की ओर से कुछ कर्मचारियों को भी नियुक्त किया गया था, जिनका काम कैश बंडलों का हिसाब रखना और उन्हें एसबीआई की नया घाट शाखा में जमा करना था. शक है कि उनमें से कुछ लोग भी इसमें शामिल हो सकते हैं; उनका तरीका यह था कि वे कैश बंडलों की सही संख्या नहीं बताते थे – जैसे, अगर पैसे 12 बंडलों के बराबर होते, तो वे सिर्फ़ 10 बताते थे. इस तरह से यह सुनियोजित लूट हुई.’
इससे पहले उसी दिन स्थानीय अखबारों में यूपी के सूचना और जनसंपर्क विभाग की ओर से एक विज्ञापन छपा था. इस विज्ञापन की टैगलाइन कुछ इस तरह थी – ‘विकास की गति अपार, डबल इंजन सरकार’ -जिसमें पीएम मोदी के साथ आदित्यनाथ की तस्वीरें थीं. विज्ञापन में पाठकों को यह भी बताया गया कि ‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की पवित्र भूमि पर… मुख्यमंत्री द्वारा 378 करोड़ रुपये की लागत वाली 126 विकास परियोजनाओं का उद्घाटन/शिलान्यास किया जाएगा.’
राम मंदिर भाजपा की राजनीति का अहम हिस्सा रहा है और नवंबर 1989 से ही पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में इसे लगातार शामिल किया जाता रहा है. 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया था; यह काम लगभग 1,50,000 लोगों की भीड़ ने किया था, जिन्होंने मस्जिद पर धावा बोल दिया और भाजपा व विहिप नेताओं के भाषणों के बीच उसका गुंबद गिरा दिया.
भाजपा की राजनीति में राम मंदिर की अहम भूमिका होने के बावजूद मंदिर के फंड में कथित चोरी से जुड़े विवाद के सामने आने के लगभग 15 दिन बाद भी राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
एक तरफ ट्रस्ट के सदस्य महंत दिनेंद्र दास ने एक न्यूज़ रिपोर्ट में कहा कि ‘अगर किसी ने कोई गलत काम किया है, तो भगवान राम खुद उस व्यक्ति को सज़ा देंगे’, वहीं दूसरी तरफ़ ‘द प्रिंट’ को दिए एक इंटरव्यू में राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन और ट्रस्टी नृपेंद्र मिश्रा ने सुझाव दिया कि ‘मंदिर का प्रबंधन ऐसे मुख्य कार्यकारी अधिकारी के हाथों में होना चाहिए जो उत्तर प्रदेश को अच्छी तरह जानता हो.’
19 जून 2026 तक, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की वेबसाइट के अनुसार, इस संस्था में 15 सदस्य हैं, जिनमें से 12 को भारत सरकार ने नॉमिनेट किया था और तीन को चुना गया था.
दिलचस्प बात यह है कि वेबसाइट पर लिखी जानकारी में तो ट्रस्ट के 15 सदस्यों का ज़िक्र है, लेकिन नीचे दिए गए सदस्यों की फोटो लिस्ट में सिर्फ़ 14 सदस्य ही दिखाए गए हैं. इनमें महासचिव चंपत राय और सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा भी शामिल हैं, जिनके नाम का ज़िक्र पूर्व कार सेवक संतोष दुबे की शिकायत में किया गया है.
सीईसी ज्ञानेश कुमार भी ट्रस्ट के सदस्य हैं
18 जून, 2026 को ट्रस्ट की वेबसाइट के होमपेज पर एक फोटो स्लाइडर में तीन सदस्यों – अयोध्या के डीएम (पदेन सदस्य), ज्ञानेश कुमार, आईएएस (केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव से ऊपर के पद पर और पदेन सदस्य), और अवनीश अवस्थी, आईएएस (राज्य सरकार में सचिव और उससे ऊपर के पद पर और पदेन सदस्य) – से जुड़ा फोटो पैनल खाली दिखाई दिया, जिसमें कोई तस्वीर नहीं थी.
गौरतलब है कि ज्ञानेश कुमार भारत के मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) हैं.
19 जून 2026 तक, ऐसा लगा कि उसी फोटो स्लाइडर को नए सिरे से तैयार किया गया था और अब होम पेज पर तीन नई चीज़ें दिख रही थीं – अयोध्या के डीएम शशांक त्रिपाठी; संजय प्रसाद, आईएएस (उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि और पदेन सदस्य); और प्रशांत लोखंडे, आईएएस (केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और पदेन सदस्य).
इस बीच, टिन्नू यादव ने एक वीडियो बयान जारी करके दावा किया कि उनकी कमाई के ज़रिया में एल एंड टी जियोस्ट्रक्चर को किराए पर दिए गए फ़्लैट और ऑटो-रिक्शा चलाने का एक साइड बिज़नेस शामिल था.
इस रिपोर्टर ने टिन्नू यादव और डॉ. अनिल मिश्रा को फोन करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया.
द वायर ने अयोध्या में ट्रस्ट के आधिकारिक फोन नंबर पर भी संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. ‘द वायर’ ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की आधिकारिक ईमेल आईडी पर सवाल भेजे हैं और जवाब मिलने पर इस स्टोरी को अपडेट किया जाएगा.
ज़मीन के सौदों पर सवाल
इस मौजूदा विवाद ने मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय से जुड़े ज़मीन के कुछ सौदों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
18 जून, 2026 को आप नेता संजय सिंह तीसरे ऐसे शिकायतकर्ता बने जिन्होंने राम जन्मभूमि पुलिस स्टेशन को औपचारिक रूप से पत्र भेजा.
आप नेता सिंह ने अपने शिकायत पत्र, जिसकी एक कॉपी द वायर ने देखी है- में लिखा है, ‘कोट रामचंद्र गांव में, महंत मुरली दास ने प्लॉट नंबर 247 ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को बेचा. ज़मीन की कीमत का अनुमान 2,92,86,000 रुपये (लगभग 3 करोड़ रुपये) है, लेकिन इसे चंपत राय ने 23 करोड़ 61 लाख रुपये में खरीदा. मुख्य रूप से यह मामला 21 करोड़ रुपये के फंड के गबन से जुड़ा है.’
सिंह ने अपने पत्र में राय और अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग करते हुए कहा, ‘एक तरफ, ऐसी घटनाएं करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुंचाती हैं, वहीं दूसरी तरफ भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होना भी कई सवाल खड़े करता है. क्या इसका कारण यह है कि ज्ञानेश कुमार और कई प्रभावशाली लोग ट्रस्ट के सदस्यों में शामिल हैं?’
आप नेता जिस ज़मीन के सौदे की बात कर रहे थे, वह 2 अप्रैल 2024 को महंत मुरली दास और राय के ज़रिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के बीच हुआ था. सेल डीड- जो राज्य पंजीकरण विभाग के सब-रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित एक दस्तावेज़ है, दोनों पक्षों के बीच 6,450 वर्ग मीटर क्षेत्र वाली ज़मीन के सौदे को दिखाती है.
इस सेल डीड पर महंत मुरली दास और चंपत राय दोनों के हस्ताक्षर और तस्वीरें मौजूद हैं. राज्य सरकार द्वारा तय सर्कल रेट के अनुसार, इस ज़मीन की अनुमानित कीमत 2,92,86,000 रुपये (दो करोड़ बानवे लाख छियासी हज़ार रुपये) थी. हालांकि, उसी दस्तावेज़ में यह भी बताया गया है कि यह प्रॉपर्टी 23,61,00,000 रुपये (तेईस करोड़ इकसठ लाख रुपये) में खरीदी गई थी.
सिंह ने सत्ताधारी भाजपा पर निशाना साधते हुए एक्स पर कहा, ‘यह एक बहुत बड़ा घोटाला है. चंपत राय ने 3 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाली नज़ूल ज़मीन (नज़ूल ज़मीन का मतलब है ऐसी ज़मीन जो निजी नहीं है, बल्कि सरकार की है) को 24 करोड़ रुपये में खरीदा- यानी 800% की लूट. ईडी ने ऐसे चोरों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया?’
सिंह के दावों के मुताबिक, इस ज़मीन की खरीद से जुड़ा एक अहम सबूत 30 जून 2023 का एक दस्तावेज़ है. इस पर लेखपाल (राज्य के राजस्व विभाग में अकाउंटेंट) के हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने प्लॉट नंबर 247 की असल स्थिति के बारे में स्पष्टीकरण दिया है.
एसडीएम के आदेश में कहा गया है, ‘इस मामले में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की अदालत ने आदेश जारी किया है कि 6,450 वर्ग मीटर की यह ज़मीन 1426-1429 के सालों से नज़ूल ज़मीन रही है, इसलिए महंत मुरली दास का नाम हटा दिया गया है.’
द वायर ने इस आदेश की एक कॉपी देखी है.
‘महंत मुरली दास को यह प्रॉपर्टी बेचने का अधिकार नहीं था’
इस मामले में हुई गड़बड़ी को समझने के लिए इस रिपोर्टर ने दो कानूनी विशेषज्ञों से बात की.
प्रयागराज की सिविल कोर्ट में राजस्व से जुड़े मामलों के जानकार एक सीनियर वकील ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘जून 2023 का एसडीएम का यह आदेश असल में रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 31 और 32 के तहत मालिकाना हक में सुधार के मामले से जुड़ा है. इसमें कहा गया है कि यह ज़मीन 1426-1429 से नज़ूल ज़मीन के तौर पर दर्ज है, इसलिए महंत मुरली दास का नाम हटा दिया गया है और यह प्रॉपर्टी सरकार की नज़ूल ज़मीन के तौर पर दर्ज की गई है. यह दस्तावेज़ साबित करता है कि महंत मुरली दास ने इस ज़मीन पर मालिकाना हक का झूठा दावा किया था.’
मार्च 2024 में यूपी सरकार द्वारा लाए गए नए कानून, ‘उत्तर प्रदेश नज़ूल प्रॉपर्टीज़ (मैनेजमेंट एंड यूटिलाइज़ेशन फॉर पब्लिक पर्पज़ेज़) बिल’ के मुताबिक, ‘इस एक्ट के लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में मौजूद नज़ूल ज़मीन को किसी प्राइवेट व्यक्ति या प्राइवेट संस्था के पक्ष में फ्रीहोल्ड में नहीं बदला जाएगा.’
सीनियर वकील ने आगे कहा, ‘महंत मुरली दास को यह प्रॉपर्टी बेचने का अधिकार नहीं था, इसलिए (दास और चंपत राय के बीच) हुई सेल डीड को असल में अमान्य माना जाएगा. और मुरली दास, जिन्होंने 2023 में ज़मीन के रिकॉर्ड में फ़र्ज़ी एंट्री करवाई थी, उन्होंने ही 2024 में वही ज़मीन बेच दी; इसका मतलब है कि सेल डीड ऐसे व्यक्ति के साथ साइन की गई थी जिसके पास ज़मीन का कानूनी मालिकाना हक नहीं था.’
बहुत ज़्यादा कीमत वाली ज़मीन की डील के मामले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले और ‘ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन’ के महासचिव एडवोकेट आशुतोष कुमार तिवारी ने द वायर को बताया, ‘इस प्रॉपर्टी के खरीदार राम जन्मभूमि ट्रस्ट हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि इस लेन-देन से ट्रस्ट को नुकसान हुआ है. आमतौर पर मार्केट रेट भी सर्कल रेट की तुलना में इतने ज़्यादा नहीं होते, इसलिए इस डील में भ्रष्टाचार के तत्व नज़र आते हैं.’
एडवोकेट तिवारी ने इस रिपोर्टर को आगे बताया, ‘इतनी ज़्यादा और अनुचित कीमत वाले इस लेन-देन के मामले में, इंडियन ट्रस्ट्स एक्ट, 1882 की धारा 92 के तहत कार्रवाई हो सकती है, क्योंकि एक पब्लिक धार्मिक ट्रस्ट से पैसा गया है जिससे नुकसान हुआ है.’
यह मंदिर ट्रस्ट पर ज़मीन से जुड़ी गड़बड़ी का आरोप लगने का पहला मामला नहीं है. 2021 में आप के संजय सिंह और समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडे ने आरोप लगाया था- जिसकी पुष्टि कई मीडिया रिपोर्ट्स ने भी की थी- कि अयोध्या में ज़मीन का एक टुकड़ा कुछ लोगों ने 2 करोड़ रुपये में खरीदा और फिर सिर्फ़ 5 से 10 मिनट बाद उसे राम मंदिर ट्रस्ट को 18.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम कीमत पर बेच दिया.
‘ट्रस्ट को सफ़ाई देनी चाहिए’
फंड की हेराफेरी के मामले में दूसरे शिकायतकर्ता भारतीय युवा कांग्रेस के उपाध्यक्ष शरद शुक्ला ने भी अयोध्या के माझा शाहनवाज़पुर गांव में ज़मीन के एक और ऐसे ही सौदे को लेकर सवाल उठाए हैं.
16 नवंबर 2023 की एक सेल डीड के अनुसार, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (जिसका प्रतिनिधित्व चंपत राय और तन्वी बंसल कर रहे थे) के बीच 7,880 वर्ग मीटर के प्लॉट नंबर 25 की बिक्री को लेकर एक सौदा हुआ. सेल डीड में सर्कल रेट के हिसाब से प्रॉपर्टी की अनुमानित कीमत 1,73,13,000 रुपये (एक करोड़ तिहत्तर लाख तेरह हज़ार रुपये) बताई गई थी, लेकिन ट्रस्ट ने यह ज़मीन 29,67,60,800 रुपये (उनतीस करोड़ सड़सठ लाख साठ हज़ार आठ सौ रुपये) में खरीदी.
शुक्ला ने द वायर से कहा, ‘ट्रस्ट को यह साफ़ करना चाहिए कि इतनी ज़्यादा कीमत पर यह ज़मीन क्यों खरीदी गई. जब सरकार ज़मीन का अधिग्रहण करती है, तब भी सर्कल रेट के हिसाब से अनुमानित कीमत का 3-4 गुना मुआवज़ा दिया जाता है, लेकिन यहां तो कीमत 900% तक पहुंच रही है, जिससे शक पैदा होता है.’
शुक्ला ने आगे कहा, ‘क्या मंदिर ट्रस्ट को यह एहसास है कि ऐसे लेन-देन में जो पैसा खर्च हो रहा है, वह किसी निजी व्यक्ति की संपत्ति नहीं है? यह पैसा राम भक्तों का है. और अगर यह पैसा किसी अस्पताल या कॉलेज के निर्माण में लगा होता, तो ठीक रहता. क्या मंदिर की 15-सदस्यीय ट्रस्ट कमेटी में ज़मीन के ऐसे सौदों पर कोई चर्चा नहीं होती?’