चढ़ावा चोरी के बहाने ‘चोरों’ की कहानियां

चढ़ावा चोरी के प्रसंग में उपज आए ज्ञानीजन बताते हैं कि उनके शास्त्र में चोरी को चोरी की तरह न कर पाने और हेराफेरी या सीनाज़ोरी पर उतर आने वाले चोरों को कतई ‘कलाकार’ नहीं माना जाता. तब माना जाता है, जब वे देखते-देखते अपने शिकार की आंखों से काजल निकाल लें और आंखवाले को भनक तक न लगे. कहते हैं कि चढ़ावा चोरों ने भी कुछ ऐसा ही चमत्कार करने की सोची थी, मगर विफल रह गए.

अयोध्या की अपने वक्त की गिनी-चुनी बहुमुखी प्रतिभाओं और शख्सियतों में शुमार लाला सीताराम (पूरा नाम: रायबहादुर लाला सीताराम बीए ‘भूप’, जन्म: 20 जनवरी, 1858 और निधन: 01 जनवरी, 1937) कुछ समय तक मुंशी नवल किशोर के उर्दू के ऐतिहासिक ‘अवध अखबार’ के संपादक, वाराणसी के प्रतिष्ठित क्वींस कॉलेज में अध्यापक, फिर ब्रिटिश नौकरशाही में असिस्टेंट इंस्पेक्टर व डिप्टी कलेक्टर रहे तो कवि व अनुवादक के रूप में अपनी अलग पहचान भी बनाई.

लेकिन अब उन्हें खासतौर पर 1932 में लिखी और तब से अब तक सबसे प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ के रूप में इस्तेमाल होती आ रही उनकी पुस्तक ‘अयोध्या का इतिहास‘ के लिए जाना जाता है.

इस पुस्तक के ‘नवाब वजीरों के शासन में अयोध्या’ शीर्षक चौदहवें अध्याय में उन्होंने ‘प्रसिद्ध’ बताकर एक ऐसे दोहे का जिक्र किया है, जो इधर अयोध्यावासियों की चेतना पर हावी राम मंदिर के चढ़ावे के गबन या चोरी (राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र के अनुसार डकैती) के सिलसिले में चर्चित हो रहा है. कई लोग यह जताने के लिए भी उसकी चर्चा कर रहे हैं कि ऐसी चोरियां अयोध्या के लिए कोई नई बात नहीं हैं और चोरों के ऐसे ‘कारनामे’ अरसे से उसकी छाती पर मूंग दलते आ रहे हैं.

बहरहाल, पहले इस पर गौर कर लेते हैं कि लाला सीताराम ने लिखा क्या है: ‘शुजाउद्दौला के मरने पर फै़ज़ाबाद (अयोध्या का जुड़वां शहर, जो उन दिनों अवध सूबे की राजधानी था) उनकी विधवा बहू बेगम की जागीर में रहा और उनके बेटे आसफ़उद्दौला ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाया… उस समय का एक दोहा प्रसिद्ध है: अवध बसन को मन चहै, पै बसिये केहि ओर? तीनि दुष्ट एहि मां रहैं, बानर, बेगम, चोर.‘

इस दोहे में जहां तक बेगमों की बात है, लाला का संकेत इतिहास-प्रसिद्ध बहू बेगम की ओर है, जो समय के साथ काल के गाल में समा चुकी हैं. लेकिन चूंकि बानर और चोर अयोध्यावासियों को आज तक सताते आ रहे हैं और अब इतने निरंकुश हो गए हैं कि अपनी परंपरा में नई कड़ियां जोड़ते हुए भगवान राम का घर भी नहीं छोड़ रहे, इसलिए लोग उनकी चर्चा भी खूब कर रहे हैं.

यह कहते हुए कि चढ़ावा चोरी तो अयोध्या में चोरियों की पुरानी परंपरा की नई कड़ी भर है और यह परंपरा कम से कम लाला सीताराम के वक्त जितनी पुरानी तो है ही.

इस बीच चढ़ावा चोरी के चौतरफा शोर में मौका ताड़कर यह बताने वाले कई ‘ज्ञानी’ (जिनके बारे में आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिख गए हैं कि वे देश-काल और उसकी ‘आवश्यकता’ के अनुसार ‘ज्ञान का उत्पादन’ करते रहते हैं) भी सामने आ गए हैं कि जैसे किसी समाज में घटित होने वाली हर घटना का एक समाजशास्त्र भी होता है और अर्थशास्त्र भी, वैसे ही चोरियों का भी. क्योंकि चोरियां भी अंततः घटनाएं ही होती हैं-दुर्घटनाओं के रूप में ही सही. अयोध्या की चोरियों के साथ भी कुछ ऐसा ही है.

खीरे की चोरी बनाम हीरे की चोरी

आम लोग आम तौर पर इन ‘ज्ञानियों’ के कहे का प्रतिवाद नहीं करते. अकारण कौन कहे, सकारण भी उनसे उलझने से परहेज़ बरतते हैं. लेकिन कभी-कभी कोई आफत या किस्मत का मारा ‘फंस’ जाता है तो ‘ज्ञानी’ उससे पूछने लगते हैं कि चोरियां शास्त्र सम्मत नहीं होतीं क्या? और उनका शास्त्र नहीं होता क्या?

फिर खुद ही बताते हैं कि होता है भाई. नहीं होता तो कभी माखन और कभी दिल चुराने वाले हमारे इतनी अजीज क्यों होते? यह विवेक कहां से आता कि ककड़ी के चोर को तलवार से नहीं मारते या किसी खेत से चोरी से खीरे तोड़ लेने और किसी तिजोरी को तोड़कर हीरे चुरा लेने की सजा एक नहीं हो सकती?

ऐसे ही एक ‘ज्ञानी’ ने कई दिन पहले मुझे बताया कि एक समय चोरियों को चौंसठ कलाओं में शामिल किया जाता था और उनकी बड़ी मान्यता थी, तो मैंने न उसके दावे का प्रतिवाद किया, न उसकी जांच-पड़ताल ही की. सच कहूं तो इसलिए नहीं की कि अब ऐसा कुछ करके ‘आ बैल मुझे मार’ करने की हिम्मत ही नहीं बची है.
फिर भी बचपन में सुल्ताना जैसे डाकुओं की सामाजिक मान्यता की बाबत बड़े-बूढ़ों से जो कुछ सुन रखा है, उसे भूल नहीं पा रहा. तब बड़े-बुजुर्ग बताते थे कि सुल्ताना बड़ा ‘दयालु’ व ‘धर्मात्मा’ डाकू था. वह अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता था. पारसी थियेटर के दौर में नौटंकी कंपनियां ऐसे ही उसे अपने ‘संगीत’ का नायक थोड़े ही बनाती थीं.

हां, बताना रह गया कि उस दिन मैंने प्रतिवाद नहीं किया तो उक्त ‘ज्ञानी’ मुझसे बहुत खुश हुआ था और बोनस के तौर पर यह ‘ज्ञान’ भी दे डाला था कि: चोरी-डकैती में फर्क की तमीज अयोध्या के उस सामाजिक विवेक का हिस्सा है, जिसके तहत अयोध्यावासी किसी को सड़क पर पड़े केले के छिलके से फिसलकर गिरते देखकर तो हंसते हैं, लेकिन कोई ऐसा गिरे कि उठ ही न पाए तो उस पर नहीं हंसते. (चढ़ावा चोरी पर भी वे नहीं ही हंस रहे हैं.)

इस बोनस ज्ञान की व्याख्या करें तो इसीलिए अयोध्या में डकैती कभी भी चोरी जैसी ‘कला’ नहीं बन पाई क्योंकि डकैती किसी को केले के छिलके की तरह नहीं फिसलाती, कि वह थोड़ी चोट खाकर उठे और लंगड़ाते-लड़खड़ाते अपने घर चले जाने में सफल हो जाए, ऐसे गिराती है बेदर्द कि उठा ही न जाए!

वैसे भी चोरी और डकैती का भला क्या मुकाबला? कोई डकैत क्या खाकर उस चोर जैसी दरियादिली दिखा सकता है कि गृहस्वामी प्रतिरोध करने लगे तो उस पर गोलियां चलाने के बजाय उसे चकमा देकर भाग जाए! चोरी के सेब यों ही ज्यादा मीठे नहीं लगते. आदम और हव्वा ने वर्जित फल ऐसे ही नहीं खा लिए थे भाई!

तिस पर न डकैतियों का इतिहास चोरियों जितना पुराना या समृद्ध है, न ही परंपरा या अनुशासन. जहां तक चोरियों की बात है, ज्ञानीजन बताते हैं कि उनके शास्त्र में चोरी को चोरी की तरह न कर पाने और हेराफेरी या सीनाजोरी पर उतर आने वाले चोरों को कतई ‘कलाकार’ नहीं माना जाता. तब माना जाता है, जब वे देखते-देखते अपने शिकार की आंखों से काजल निकाल लें और जिनकी आंख से निकालें, उन्हें भनक तक न लगे.

कहते हैं कि चढ़ावा चोरों ने भी कुछ ऐसा ही चमत्कार करने की सोची थी, मगर विफल रहे और उनकी पोल खु‍लने लग गई.

गुणी कलाकार!

बहरहाल, चोरी के दो गुणी ‘कलाकारों’ के किस्से आजकल अयोध्या में आम हो गए हैं और ‘ज्ञानियों’ द्वारा लोगों को फिर फिर सुनाए जा रहे हैं. भले ही सुनने वालों को समझ नहीं आ रहा कि यह ज्ञानियों के ज्ञान की जीत है या चोरों की कला की. लीजिए, ये किस्से आप भी पढ़ लीजिए और इनके निहितार्थ समझ सकते हों तो समझ लीजिए:

जाड़े की एक रात दो चोरों को एक घर में अन्य वस्तुओं के साथ चांदी की एक अद्भुत तश्तरी हाथ लगी. माल बंटा तो जिसे तश्तरी नहीं मिली, काफी मन मसोसने के बाद उसने तय किया कि जिसे वह मिली है, अगली रात उसे उसके घर से भी उड़ा लाएगा. लेकिन साथी उसकी बदनीयत को ताड़ गया! अगली रात सोने से पहले उसने तश्तरी को अपनी चारपाई के ऊपर ‘सिकहर’ पर रखा और लबालब पानी से भर दिया. ताकि कोई उसे जरा भी हिलाए तो पानी छलककर उसके बदन पर गिरे, वह जागकर हिलाने वाले को दबोच ले और तश्तरी चोरी होने से बच जाए.

शायद उसको मालूम था कि उसके सोते ही बदनीयत साथी दबे पांव उसके घर में तश्तरी चुराने घुस आएगा और वास्तव में ऐसा ही हुआ. साथी माहिर था, सो तश्तरी को पानी से भरी देख दिमाग दौड़ाया. पास ही बुझे पड़े अलाव से कंडे की राख उठायी और उसके पानी में छुआ दी. राख ने पानी सोख लिया, तो मजे से तश्तरी उतारी और लेकर चलता बना. सोने वाला जागा तो पाया कि ‘खेल’ हो चुका है. वह तुरंत बदनीयत साथी के घर भागा, तो वह अपने घर के बाहर इत्मीनान से अलाव तापता मिल गया.

पूछा- कैसे आए, तो जवाब देने के बजाय ठंड का अंदाजा लगाने के बहाने उसके हाथ-पैर छुए और इधर-उधर की बात करता रहा. वापसी में गांव के उत्तर तरफ के तालाब में निश्चित गहराई तक घुसकर थोड़ी देर तलाशने के बाद तश्तरी पा ली.
दरअसल, उसने अलाव के पास बैठे साथी के पैरों को छुआ तो वे एक खास ऊंचाई तक कुछ ज्यादा ही ठंडे लगे और उसने समझ लिया कि वह तश्तरी घर नहीं ले आया. जितनी ऊंचाई तक उसके पैर ठंडे हैं, कहीं उतने ही गहरे पानी में घुसकर ‘दबा’ आया है. फिर तो उसकी पहुंच वाले तालाब का अंदाजा लगाकर तश्तरी ढूंढ़ लेना कोई कठिन काम न था.

एक और रात दोनों अभियान पर निकले ही थे कि सावधान ग्रामीणों ने उन्हें खदेड़ लिया. भागते-भागते उनमें से एक कुएं में जा गिरा, लेकिन ग्रामीणों ने कुएं में रस्सी लटकाई तो उसे पकड़कर बाहर निकल आने को कहा तो साफ मना कर दिया. अंदेशा जताया कि वे आधी ऊंचाई तक उठाएंगे, फिर रस्सी छोड़कर गिरा देंगे और उसकी कुछ ‘और’ दुर्गति हो जाएगी. निकाल भी लेंगे तो मार-पीटकर अधमरा कर नानी याद दिला देंगे.

तभी भाग जाने में सफल रहा उसका साथी वेष बदल कर ग्रामीणों में आ शामिल हुआ और यह कहकर ग्रामीणों को कुएं में लटकाई गई रस्सी उसकी ‘धरन’ से बांध देने को राजी कर लिया कि उनके पास चोर को निकालने का कोई और तरीका है ही नहीं. रस्सी बंध गई तो दोनों साथियों ने आंखों-आंखों में बात की. फिर ग्रामीणों में शामिल साथी एक महिला की नाक से सोने की नथ नोंचकर भागा.

ग्रामीणों ने आव देखा न ताव, सबके सब उसके ही पीछे दौड़ पड़े. लेकिन साथी था कि हवा से बातें करता हुआ भाग निकला. ग्रामीण उसको पकड़ने में नाकाम होकर लौटे तो कुएं में गिरा चोर भी ‘धरन’ से बंधी रस्सी के सहारे निकल भागा था.

‘सिंहासन बत्तीसी’ की कथा

लेकिन ‘ज्ञानी’ बताते हैं कि अब वक्त इतना बदल गया है कि इतनी कलात्मक चोरियां नहीं होतीं और चोर अपनी कला का ऐसा प्रदर्शन नहीं करते. करें भी क्यों? जब किसी को रिवॉल्वर की नोक पर लेने या उसका घोड़ा दबाने को धमकाने भर से चंद पलों में लाखों के वारे-न्यारे किए जा सकते हों तो ठिठुराकर रख देने वाले जाड़े में रात-रात भर जागकर चोरी की कला के प्रदर्शन की क्या जरूरत?

लेकिन एक समय था, जब इस प्रदर्शन की खूब जरूरत पड़ती थी और उसकी कथाएं भी खूब कही व सुनी जाती थीं.

वरिष्ठ संपादक और पत्रकार मधुकर उपाध्याय प्रसिद्ध ‘सिंहासन बत्तीसी’ की सत्ताईसवीं पुतली मानवती के हवाले से यूट्यूब पर ‘अवध पंच’ शीर्षक अपनी लोकप्रिय वीडियो श्रृंखला के एक वीडियो में उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य (जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उजड़ी हुई अयोध्या को फिर से बसाया) की एक कथा सुनाते हैं.

एक चोरी के रहस्योद्घाटन के सिलसिले में विक्रमादित्य भेष बदलकर निर्जन जंगल में पहुंचे तो एक जगह चार लोगों को बैठे देखा. वे समझ गए कि चारों चोर हैं. उनके पास गए तो चारों ने उनको कोई गुप्तचर समझा, लेकिन विश्वास में लेकर उनको बताया कि उनकी ही तरह वे भी चोर हैं और उनके गिरोह में शामिल होना चाहते हैं, तो चारों खुलकर अपनी-अपनी खूबियां बताने लगे.

एक ने बताया कि वह चोरी का शुभ मुहूर्त निकालता है, दूसरे ने बताया कि वह परिंदों व जानवरों की भाषा समझ लेता है, तीसरे ने बताया कि वह अदृश्य होने की कला जानता है और चौथे ने बताया कि वह भयानक से भयानक यातना पाकर भी उफ़ तक नहीं करता.

इस पर विक्रमादित्य ने उनका और विश्वास जीतने के लिए कह दिया कि वे कहीं भी छिपाया धन देख सकते हैं, तो चोरों ने खुशी-खुशी उनको अपने गिरोह में शामिल कर लिया. फिर सबने मिलकर विक्रमादित्य के महल के एक हिस्से में ही चोरी की योजना बनाई.
दरअसल, विक्रमादित्य ने यह कहकर उनको वहां खूब माल-असबाब मिलने का भरोसा दिला दिया था कि वे साफ देख रहे हैं कि महल में शाही खज़ाने का ढेर सारा माल छिपा है. चोरों ने वहां जाकर माल देखा तो बड़े ही खुश हुए, खुशी-खुशी सारा माल झोली में डाला और महल से बाहर निकलने लगे. लेकिन तभी चौकस प्रहरियों ने उन्हें पकड़ लिया और सुबह होते ही राज दरबार में पेश किया.

वहां अपने ‘पांचवें साथी’ को ही सिंहासन पर बैठे देख चारों चोर गुमसुम होकर दंड की प्रतीक्षा करने लगे. मगर विक्रमादित्य ने उन्हें कोई दंड नहीं दिया. बस, उनसे आगे ऐसा कोई अपराध न करने का वचन लिया, अपनी खूबियां लोगों की भलाई के लिए इस्तेमाल करने को कहा और जीवनयापन के लिए सेना में नौकरी दे दी.

चोरी में ईमानदारी

इस वीडियो में मधुकर उपाध्याय आगे बताते हैं कि लोककथाओं के संग्राहक राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी ने अपने एक संग्रह में इस कथा को ‘चोरी में ईमानदारी’ की बदली हुई लोककथा के रूप में दिया है. अब यह तो हम जानते ही हैं कि लोककथाएं समय के साथ रूप बदलती रहती हैं.

इस बदली हुई लोककथा के अनुसार, एक राजा भेष बदलकर जंगल में गया तो वहां उसे चार नहीं, बल्कि तीन चोर मिले. राजा ने उनका विश्वास जीता तो एक ने उसे बताया कि वह किसी ताले को देख भर ले तो वह खुल जाता है. इसके अलावा भी उसके लिए कुछ भी करना असंभव नहीं है. दूसरे ने बताया कि उसे कहीं भी छिपाए गए धन का पता लगाने में महारत हासिल है. तीसरे ने बताया कि वह किसी को एक बार उड़ती नजर से भी देख ले तो सौ साल बाद भी उसे पहचान सकता है.

इस पर राजा ने उन्हें बताया कि उसके पास ऐसी शक्ति है कि वह अपने सिर को एक बार दाहिने से बांयें और बांयें से दाहिने कर दे तो जो कुछ भी घटित हो रहा होता है, वह पूरी तरह बदल जाता है.

फिर तीनों चोरों ने राजा को इस शर्त पर अपना साथी बना लिया कि वे जब भी चोरी करेंगे, उनके बीच ईमानदारी सबसे बड़ा मूल्य हुआ करेगी.
लेकिन राजा को तो अंततः उन्हें पकड़वाना था. एक रात चोरी के दौरान प्रहरियों ने तीनों को पकड़कर सुबह दरबार में पेश किया तो जिस चोर में किसी व्यक्ति को सौ साल बाद भी पहचान लेने की खूबी थी, उसने सिंहासन पर बैठे राजा को पहचान लिया.

सुनवाई शुरू हुई तो उसने ढिठाई से राजा से कह दिया कि वह उन्हें जो में दंड चाहे दे दे, लेकिन पहले वह याद कर ले कि हमारे बीच तय हुआ था कि चोरी में ईमानदारी सबसे बड़ा मूल्य होगी और इस वक्त ईमानदारी इसमें है कि वह अपना सिर दाहिने बांयें करके जो कुछ हो रहा है, उसे बदल दे.

सुनकर राजा ने ईमानदारी निभाते हुए अपना सिर दाहिने बांयें किया तो बंदी चोर आजाद हो गए. लेकिन जंगल की ओर जाने से पहले उन्होंने भी ईमानदारी बरती. चोरी के माल में राजा का हिस्सा वहीं छोड़ गए.

चलिए, हम भी आपको यहीं आपके बोध के साथ छोड़ यह सोचने के लिए छोड़ जाते हैं कि आपको राम मंदिर की चढ़ावा-चोरी इनमें से किस चोरी के ज्यादा निकट लगती है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .)