घटना पश्चिमी दिल्ली में मुंडका औद्योगिक क्षेत्र में हुई, जहां शुक्रवार दोपहर एक फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान तीन मज़दूरों की मौत हो गई. मृतकों के परिजनों का कहना है कि उन्हें टैंक के अंदर जाने के लिए काम पर नहीं रखा गया था, बल्कि सीवेज निकालने की पंप वाली मशीन चलाने का काम दिया गया था. उनका आरोप है कि बाद में इन लोगों को बिना सुरक्षा उपकरण आदि के टैंक में उतार दिया गया.

नई दिल्ली: पश्चिमी दिल्ली के मुंडका औद्योगिक क्षेत्र स्थित एक फैक्ट्री में शुक्रवार (26 जून) दोपहर सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन मजदूरों की मौत हो गई है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली अग्निशमन सेवा (डीएफएस) की टीम ने मौके पर पहुंच कर तीनों मजदूरों को मृत अवस्था में बाहर निकाला.
इस संंबंध में पुलिस ने बताया कि एक-दूसरे को बचाने की कोशिश में ये कर्मचारी एक के बाद एक टैंक के अंदर गए थे. मृतकों में चांद (42), अरुण (38) और संदीप (32) शामिल हैं, जो सुल्तानपुरी के इंदिरा झील इलाके के रहने वाले थे.
मृतकों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी सुरक्षा उपकरण के अंदर भेजा गया था. पुलिस ने फैक्ट्री के मालिक सूरज मारवाह (50), फैक्ट्री में काम करने वाले जयंत (61) और पंपिंग गाड़ी के मालिक व कॉन्ट्रैक्टर नीरज (25) को गिरफ़्तार कर लिया है.
पुलिस ने तीनों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 106 (लापरवाही से मौत) और 3(5) (साझा इरादा), हाथ से मैला ढोने पर रोक लगाने वाले कानून की धारा 9 और एससी/एसटी एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है.
पुलिस ने बताया कि मुंडका थाने में दोपहर 12:09 बजे एक पीसीआर कॉल आई थी, जिसमें कहा गया था कि ‘टैंक की सफाई के लिए अंदर गए तीन लोग उसमें गिर गए हैं.’
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पुलिस को पता चला कि मारवाह प्रिंटर्स ने मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया की गली नंबर एक में मौजूद सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए नांगलोई के रहने वाले नीरज को काम पर रखा था. घटना के समय नीरज भी सफाई के काम में लगा हुआ था.
पीड़ितों के परिवारों के अनुसार, जब पंप टैंक की तली में जमा बाकी कचरा नहीं निकाल पाए, तो सबसे पहले चांद को टैंक के अंदर भेजा गया था. जब उसने कोई जवाब नहीं दिया, तो अरुण उसे बाहर निकालने के लिए अंदर गया.
कुछ ही देर बाद अरुण ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इसके बाद संदीप दोनों को बचाने के लिए टैंक में उतरा, लेकिन ज़हरीली गैस की चपेट में आने से वह भी गिर पड़ा. इसके बाद बाहर मौजूद नीरज ने फैक्ट्री प्रबंधन को सूचना दी और अलार्म बजाया.
दिल्ली अग्निशमन सेवा ने बताया कि दमकलकर्मी फैक्टरी पहुंचे और मजदूरों को टैंक से बाहर निकाला गया. हालांकि, तीनों की मौत हो चुकी थी. उनके शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए मंगोलपुरी के संजय गांधी मेमोरियल हॉस्पिटल ले जाया गया.
‘यह उनका काम नहीं था’
मज़दूरों के परिवारों का कहना है कि उन्हें सेप्टिक टैंक के अंदर जाने के लिए काम पर नहीं रखा गया था, बल्कि उन्हें सीवेज निकालने के लिए पंप वाली मशीन चलाने का काम दिया गया था; बाद में कुछ अतिरिक्त पैसे का लालच देकर उन्हें टैंक के अंदर उतरने के लिए कहा गया.
परिवारों का यह भी आरोप है कि उन तीनों लोगों को कोई सुरक्षा उपकरण, ऑक्सीजन सपोर्ट या सेफ्टी हार्नेस नहीं दिया गया था.
उन्होंने दावा किया कि न तो मज़दूरों को हाथ से सेप्टिक टैंक की सफ़ाई करने की ट्रेनिंग दी गई थी और न ही उन्हें तंग जगह में जाने से जुड़े खतरों के बारे में बताया गया था.
अखबार के अनुसार, हादसे वाले इलाके में इंडस्ट्रियल यूनिट्स के बाहर बिजली के खंभों पर सेप्टिक टैंक साफ़ करने की सेवाओं के विज्ञापन खुलेआम लगे हुए थे.
वहां रहने वाले एक व्यक्ति ने कहा, ‘इस इलाके की हर फैक्ट्री में सेप्टिक टैंक हैं और आम तौर पर उन्हें मशीनों से साफ़ किया जाता है. लेकिन सब जानते हैं कि थोड़े से ज़्यादा पैसे के लिए अक्सर मज़दूरों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम पूरा करने के लिए टैंक के अंदर भेज दिया जाता है.’
अमर उजाला की ख़बर के मुताबिक, हादसे में जान गंवाने वाले चांद के परिवार में उनकी पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं. उनके भतीजे वासु ने बताया कि चाचा रोज सुबह काम पर निकलते थे और शाम को मोमोज-फिंगर की रेहड़ी लगाते थे. पूरा परिवार किराए के मकान में बड़ी मुश्किल से जीवन गुजर बसर करता है.
वहीं, संदीप के परिजनों ने बताया कि वह बेहद गरीब परिवार से थे और सुल्तानपुरी में किराए के घर में रहते थे. वह महीने में बमुश्किल 12 से 13 हजार रुपये कमा पाते थे. जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन घर का चूल्हा जलना मुश्किल होता था इसलिए वह घर पर खाली नहीं बैठते थे.
संदीप के मौसा सुरेंद्र बताते हैं कि संदीप के परिवार में बूढ़े माता-पिता, एक छोटा भाई, पत्नी और एक 12 साल की बेटी है.
इस हादसे के बाद एक बार फिर सीवर और सेप्टिक टैंक की मैनुअल सफाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं. पिछले दिनों संसद में केंद्र सरकार ने भी स्वीकारा है कि 2017 से 17 मार्च 2026 तक देश में 622 मजदूरों और दिल्ली में 62 मजदूर ऐसे ही हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं.
गौरतलब है कि देश में हाथ से मैला उठाने पर रोक लगाने के लिए 2013 में कानून बनाया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 और फिर 2023 में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई पूरी तरह सुरक्षित और अधिकतम मशीनीकृत तरीके से होनी चाहिए लेकिन सरकार के आंकड़े खुद इस निर्देश के पालन नहीं होने की गवाही देते हैं.