देश में एक बार फिर शनिवार को पेट्रोल और डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी हुई है. पेट्रोल 87 पैसे और डीज़ल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया है. सीएनजी की कीमत में भी एक रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि हुई है. बीते दस दिनों में लगातार तीसरी बार दाम बढ़ोतरी को लेकर विपक्ष ने सरकार पर हमला बोला है और इस मंहगाई के लिए केंद्र की नीतियों को जिम्मेदार बताया है.

नई दिल्ली: देश में एक बार फिर शनिवार (23 मई) को पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी हुई है. पेट्रोल 87 पैसे और डीज़ल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा हो गया है. इसके साथ ही सीनएजी के दाम भी 1 रुपये प्रति किलो बढ़ाए गए हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, दिल्ली में पेट्रोल के दाम 87 पैसे बढ़कर 99.51 रुपये प्रति लीटर हो गए हैं. डीज़ल के दाम 91 पैसे बढ़कर 92.49 रुपये प्रति लीटर हो गए हैं.
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पेट्रोल की कीमत 107.59 रुपये प्रति लीटर से 108.49 पर पहुंच गई है, जबकि डीजल 94.08 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 95.02 हो गया है.
वहीं, कोलकाता में पेट्रोल की कीमत 109.70 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 110.64 हो गई है. डीजल के दाम 96.07 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 97.02 पर चले गए हैं.
महानगर चेन्नई में पेट्रोल 104.49 रुपये प्रति लीटर से 105.31 पर पहुंच गया है, जबकि डीजल 96.11 रुपये से 96.98 प्रति लीटर हो गया है.
मालूम हो कि राज्यों में स्थानीय करों के अंतर के कारण ईंधन कीमतें अलग-अलग हैं.
उल्लेखनीय है कि 15 मई से अब तक यह लगातार तीसरी बार कीमतों में इज़ाफा किया गया है. ऐसे में पश्चिम एशिया तनाव के बीच सरकार भले ही बार-बार देश में पर्याप्त मात्रा में ईंधन की उपलब्धता वाला बयान दे रही हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस संकट के चलते आपूर्ति बाधित हुई है, जिसका असर लगातार आम जनता की जेब पर पड़ रहा है.
बता दें कि अभी हाल ही में 19 मई को पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा था कि पश्चिम एशिया युद्ध के 80 दिन बाद भी भारत में कच्चे तेल, एलपीजी और पीएनजी की कोई कमी नहीं है. उनका कहना था कि प्रधानमंत्री ने समय रहते फैसले लिए और स्थिति नियंत्रण में है.
ज्ञात हो कि इस महीने सबसे पहले 15 मई को पेट्रोल-डीज़ल के दाम तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ाए गए थे. इसके बाद 19 मई को करीब 90 पैसे की दूसरी बढ़ोतरी हुई.
विपक्ष ने केंद्र की मोदी सरकार की आलोचना
आम जनता पर लगातार बढ़ते महंगाई के बोझ को लेकर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की आलोचना की है.
कांग्रेस ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा कि ‘महंगाई मैन’ मोदी ने पेट्रोल-डीज़ल पर नौ दिन में पांच रुपये बढ़ा दिए हैं.
कांग्रेस ने आगे कहा, ‘मोदी को बस तेल कंपनियों के फ़ायदे की चिंता है. एक तरफ जहां दुनियाभर की सरकारें अपनी जनता को राहत दे रही हैं, मोदी सरकार जनता को ही लूटने में लगी है. कभी तो जनता के भले के बारे में सोच लो, कब तक पूंजीपतियों का फ़ायदा कराते रहोगे?’
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने कहा है कि महंगाई आसमान छू रही है और ये भाजपा सरकार की ‘गलत आर्थिक और विदेश नीतियों’ का नतीजा है.
समाजवादी पार्टी के मीडिया सेल ने एक्स पर लिखा, ’15 दिन में तीसरी बार पेट्रोल डीज़ल के दाम इस भाजपा सरकार ने बढ़ा दिए. सीएनजी की कीमतें भी बढ़ा दी गईं. महंगाई आसमान छू रही है, भाजपा सरकार की ग़लत आर्थिक और विदेश नीतियों का ये दुष्परिणाम है, पहले से मंदी की मार झेल रही जनता पर ये दोहरा तिहरा भाजपाई प्रहार है. महंगाई और बढ़ने वाली है, अराजकता अपराध और बर्बादी का दौर आने वाला है और इसकी ज़िम्मेदार ये भाजपा की सरकार होगी.’
वहीं, तृणमूल सांसद सांसद साकेत गोखले ने कहा कि 10 दिनों में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में तीसरी बार बढ़ोतरी की गई है. हर 3 दिन में ईंधन की कीमतें लगभग 1 रुपये बढ़ जाती हैं.
उन्होंने आगे कहा कि सरकार गिरते रुपये को संभालने में नाकाम है, इसलिए इसकी उम्मीद है कि जुलाई तक हर कुछ दिनों में कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहेगी.
साकेत गोखले के अनुसार, ‘हमें पीएम और मंत्रियों के ‘खर्च में कटौती’ वाले दिखावे की ज़रूरत नहीं है, जो वे सिर्फ़ कैमरों के लिए करते हैं. हमें ऐसी सरकार चाहिए जो अर्थव्यवस्था चलाने के बुनियादी सिद्धांतों को समझती हो, और जिसका ध्यान शासन-प्रशासन पर हो, न कि सिर्फ़ पीआर पर.’
इस संबंध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता एलामराम करीम ने कहा, ‘भारत सरकार ने पेट्रोल की कीमतें तीन बार बढ़ाकर इस देश की जनता पर एक बड़ा प्रहार किया है. पश्चिम एशियाई संकट के कारण हमें ऐसे बोझ की उम्मीद थी, क्योंकि हमारे तेल आयात पर बुरा असर पड़ा था, लेकिन सरकार इस संकट को पैदा करने के लिए अमेरिका की आलोचना नहीं कर रही है… वे अमेरिका के साथ है.’
उन्होंने सरकार के दाम बढ़ाने के फैसले का कड़ा विरोध करते हुए कहा बताया कि इस बढ़ोतरी का बोझ आम जनता, गरीब लोगों और विशेष रूप से सड़क परिवहन कर्मचारियों, स्वरोज़गार करने वाले ऑटो-रिक्शा चालकों, टैक्सी चालकों और श्रमिकों के अन्य वर्गों पर पड़ता है, जो रोज़ाना पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं.
गौरतलब है कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रिपरिषद की बैठक में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम करने और एलपीजी के विकल्प के रूप में बायोगैस को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया.
इसी दौरान उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) ने पेट्रोकेमिकल उद्योग से 200 से अधिक अत्यधिक आयात-निर्भर उत्पादों के घरेलू उत्पादन की संभावनाओं पर तत्काल जवाब मांगा है.
इन घटनाओं को साथ रखकर देखें तो मामला सिर्फ ईंधन आपूर्ति का नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक और औद्योगिक संरचना की गहरी आयात-निर्भरता का है. संकट फिलहाल केवल गैस सिलेंडरों की कतारों या तेल की कीमतों तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि उस पूरे आर्थिक ढांचे पर सवाल खड़ा करता है जिसकी बुनियाद बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर टिकी हुई है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, तो सरकार के भीतर ऊर्जा विकल्पों पर इस स्तर की तात्कालिकता क्यों दिखाई दे रही है? यही वह विरोधाभास है जो मौजूदा स्थिति को गंभीर बनाता है.